Followers

Tuesday, June 27, 2017

नई फ्रॉक





‘अम्मी चल ना बाहर ! देख कितनी सुन्दर, चमकीली, सोने चाँदी के तारों से कढ़ी फराकें ले के आया है फेरी वाला ! मुझे भी दिला दे न एक ! मामू की शादी में मैं भी नई फराक पहनूँगी !’ 
छ: बरस की करीना की आँखों में हसरत भी थी और चमक भी ! फेरी वाले की छड़ी पर टँगी रंग बिरंगी फ्रॉकें उसकी नज़रों के सामने से हट ही नहीं रही थीं ! बर्तन माँज कर हाथ धोती बानो की पीठ पर वह झूल गयी ! बानो का दिल मसोस उठा ! जानती थी खूब मोल भाव करने के बाद भी फ्रॉक अस्सी नब्बे से कम में न आयेगी और उसके डिब्बे में इस वक्त सिर्फ तीस रूपए पड़े हैं और घर गृहस्थी की तमाम ज़रूरतें मुँह बाये सामने खड़ी हैं ! लेकिन साथ ही यह भी जानती थी मना कर देगी तो करीना रो रोकर घर सर पर उठा लेगी ! फिर कुछ देर को झूठा ही सही थोड़ा शगल तो हो ही जाएगा जब वह अपनी ज़मीनी हकीकत से ऊपर उठ कर एक खरीदार बन जायेगी और फेरीवाला हर तरह से उसको खुश करने की कोशिश में जुट जाएगा ! दुपट्टे से हाथ पोंछती वह उठ खड़ी हुई, “जा नूरी को बुला ला ! देखें कैसी फराकें लाया है फेरी वाला !”
करीना की फरमाइश पर कोई ध्यान दिए बिना उसके दोनों भाई अजलू फजलू अभी तक मज़े से कंचों से खेल रहे थे ! बहन का रोना धोना जिद करना तो रोज़ का तमाशा है ! अभी कस के अम्मी की डाँट पड़ेगी तो या तो थोड़ी देर रिरिया कर सो जायेगी या झुग्गी के बाहर जाकर मोहल्ले की लड़कियों के संग इक्कड़ दुक्कड़ खेलने में रम जायेगी ! लेकिन अम्मी को खरीदारी के मूड में देख दोनों चौकन्ने हो गए ! यह क्या बात हुई ! करीना की फराक आयेगी तो उनको भी तो नयी कमीज़ चाहिए ! शादी तो उनके मामू की भी है ! दोनों चुप थे ! जानते थे कि ज़रा भी मुँह खोला तो अम्मी की आवाज़ बाद में निकलेगी और तमाचों से गाल पहले लाल हो जायेंगे ! दोनों भाई करीना के साथ बाहर निकल गए ! मन में उम्मीद भी थी कि हो सकता है फेरी वाले के पास कमीजें भी हों ! 
करीना दौड़ के नूरी को बुला लाई ! फेरी वाला झुग्गी के बाहर ही खड़ा आवाज़ लगा रहा था ! शहर की सीमा से लगी सैकड़ों झुग्गियों की इस बस्ती में हसरत भरी निगाहों से देखने वाले तो बहुत मानुस थे लेकिन खरीदार कोई नहीं था ! बानो और नूरी को आता देख फेरी वाले की आँखों में चमक आ गयी ! करीना जिस तरह सुन्दर फ्रॉक देख लालसा से भरी अन्दर भागी थी उसे उम्मीद हो गयी थी कि आज उसकी बोहनी ज़रूर हो जायेगी ! फेरी वाले की छड़ी में फ्रॉक्स के अलावा लहँगे, सलवार सूट, स्कर्ट टॉप और भी कई ड्रेसेज थीं ! बानो और नूरी का चेहरा भी उन्हें देख कर चमकने लगा ! मन कर रहा था अपने लिए भी एक दो सूट खरीद लें ! लेकिन पर्स की जमा पूँजी का ख्याल आते ही वह धरातल पर आ गयी ! चहरे पर रूखाई और आवाज़ में खुरदुराहट लाकर उसने फेरी वाले से कहा, 
“दिखाओ ज़रा कैसी फराके हैं ! हम भी तो देखें ! कैसी दी हैं ? ठीक दाम बताना !” 
“मैं कभी ग़लत बताता हूँ जो आज बताउँगा ! आप पसंद तो कर लो पहले ! दाम भी ठीक ही लगा दूँगा !” फेरी वाला पक्का सौदेबाज़ था ! बानो ने एक फ्रॉक निकलवाई ! क्रीम कलर की नेट का घेर था और काले रंग की जैकेट पर बड़े सुन्दर सुनहरी फूल कढ़े थे ! करीना के कन्धों से लगा साइज़ नापते हुए बानो ने पूछा. 
“यह कितने की है ?” पिंडलियों से भी लम्बी मैली कुचैली फ्रॉक से लगी वह खूबसूरत नयी फ्रॉक टाट में मखमल के पैबंद का आभास दे रही थी ! 
“यह है तो दो सौ रुपये की लेकिन सुबह का वक्त है ! बोहनी का टाइम है आप दस पंद्रह रुपये कम दे देना !” 
“पागल समझ रखा है क्या हमें !” बानो के चहरे पर एक पक्के खरीदार वाला रुआब आ गया ! फ्रॉक फेरी वाले को पकड़ाते हुए वह तुनक कर बोली, “ऐसा तो घटिया कपड़ा लगाया है कि एक ही धुलाई में छेद हो जायेंगे और कढाई भी कैसी खराब है ! इससे अच्छी तो हम घर में काढ लें ! उस पर ऐसे अनाप शनाप दाम बता रहे हो ! रहने दो तुम !” इस दमदार तक़रीर के बाद अपनी बात के समर्थन के लिए उसने नूरी की ओर देखा ! 
नूरी फेरी वाले की छड़ी से उतार-उतार कर अपने नाप का सूट देख रही थी ! 
“देखना बानो यह कैसा लग रहा है ?” फिर बानो की बात का समर्थन करते हुए उसकी ओर देखे बिना ही दूसरा सूट छडी से उतारते हुए बोली, “और क्या सही तो कह रही हो ! शहर की दूकान पर देखी थीं मैंने ! वहाँ ऐसी फराकें सौ सौ की मिल रही थीं !” बानो ने कस के उसका हाथ दबाया ! मन ही मन डर गयी थी कि अगर सौ रुपये में राजी हो गया तो कहाँ से लायेगी सौ रुपये वह ! नूरी की बात पलटते हुए वह बोली, 
“वह तो इनके मुकाबले में बहुत बढ़िया थीं ! इनका तो कपड़ा भी हल्का है ! रंग भी कच्चे लगते हैं ! एक ही धुलाई में उतर जायेंगे तो सारे पैसे बेकार हो जायेंगे ! रहने भैया तुम जाओ हमें नहीं लेना !”
“कैसी बात कर रही हो बहन ! सारे बाज़ार में ऐसा माल कहीं नहीं मिलेगा ! यही फराक बड़ी दूकान पर कोई चार सौ से कम में दे दे तो अल्ला कसम यह काम छोड़ दूँगा ! बोहनी का टाइम है इसलिए मैंने अपना नफ़ा भी छोड़ दिया है ! चलो न आपकी न मेरी आप एक सौ पचत्तर दे देना ! अब तो ठीक है ?”
बानो और नूरी के चहरे पर जीत की चमक दिखी ! अजलू फजलू का चेहरा आवेश से तमतमाने लगा ! फेरी वाले के पास केवल लड़कियों के कपडे थे ! लड़को के नहीं ! बानो ने दूसरी लाल फ्रॉक छड़ी से उतार कर करीना के कंधे से नापी ! अपने साइज़ से बहुत बड़ी मैली कुचैली सी एक नीली फ्रॉक बदन पर चढ़ाए हर वक्त घूमने की आदी करीना ने जब इतनी सुन्दर लाल फ्रॉक देखी तो उसकी आँखें उम्मीद और उल्लास से चमकने लगीं ! दोनों भाई रुआँसे हो गए ! 
“इसका क्या दाम है ?” बानो ने इशारों इशारों में नूरी की राय पूछी ! नूरी ने भी अपनी सहमति जताई ! 
“आप इसके एक सौ साठ दे देना ! है तो यह भी दो सौ की ही ! बस बात यह है कि जैसी आपकी बेटी वैसी मेरी बेटी ! इसीलिये आपको बिलकुल घर के दाम बता रहा हूँ !” 
“चलो रहने दो ! हमीं मिले हैं बेवकूफ बनाने के लिए क्या ! जितने दाम तुम बोल रहे हो इतने में तो ऐसी चार फराकें आ जायेंगी ! तुम जाओ ! हमको नहीं लेना है !” बानो ने फ्रॉक लौटाते हुए कहा ! लेकिन जो लफ्ज़ उसके मुँह से निकल रहे थे दिल उनका साथ नहीं दे रहा था ! छड़ी से उतार-उतार कर वह हर ड्रेस करीना के कन्धों से लगा कर नाप रही थी ! और करीना को इस वक्त जो खुशी मिल रही थी उसका अहसास इतने वर्षों में उसने पहले कभी नहीं किया था ! उसे भरोसा हो चला था कि इतने सारे कपड़ों में से कोई न कोई फराक तो अम्मी उसे दिला ही देगी ! 
“अरे कैसी बात कर रही हो बहन ! आप बताओ तो क्या दोगी ! बच्ची का दिल टूट जाएगा !” घाघ फेरी वाले ने अब करीना को हथियार बनाया, “बोल बेटा कौन सी फराक पसंद है तुझे लाल कि पीली ?”
करीना ने लाल फ्रॉक ले ली और सर में डालने लगी ! बानो ने झट से उसके हाथ से फ्रॉक खींचते हुए कहा, 
“मैं तो पचास से ज्यादह नहीं दूँगी ! तुम्हें देना है तो दे जाओ ! नहीं तो तुम्हारे जैसे बीसियों फेरी वाले रोज़ आते हैं !” मन ही मन वह घबरा भी रही थी कि फेरी वाला कहीं मान ही न जाए ! उसके डिब्बे में तो पचास रुपये भी नहीं हैं ! 
“अब ऐसे तो न बोलो बहन ! पचास रुपये में तो आजकल एक रूमाल भी नहीं आता है बड़े शहरों में ! बोहनी का टाइम है ! चलो पहली फराक घाटे में ही सही ! बहन सौ बात की एक बात है आख़िरी दाम लगा रहा हूँ आप एक सौ बीस रुपये दे देना !“ फेरी वाले ने फ्रॉक करीना के हाथों में पकडा दी ! 
करीना खुशी से उछल रही थी ! अजलू फजलू की आँखों में आँसू आ गए थे ! बानो और नूरी सकते में थीं ! खरीदारी का सारा जोश ठंडा हो गया था ! इस चक्रव्यूह से कैसे निकलें रास्ता नहीं मिल रहा था ! 
बानो जोर से चिल्लाई, “ अरे तुम तो सिर पर ही चढ़े जा रहे हो ! कह दिया ना पचास से ज्यादह नहीं देंगे ! देना हो तो दे दो नहीं तो अपना रास्ता नापो ! फालतू बखत नहीं है हमारे पास ! और भी बहुत सारे काम पड़े हैं करने को !” 
बानो के बदले सुर ने फेरी वाले को नाउम्मीद कर दिया ! करीना के हाथ से फ्रॉक ले उसने हैंगर में लगा छड़ी पर टाँग दी, “जब लेना ही नहीं था तो हमारा टाइम क्यों खोटी किया इतना !” चेहरे पर खीज उतर आई थी और आवाज़ में गुस्सा साफ़ झलक रहा था ! थोड़ी देर पहले की व्यवहार की आत्मीयता और वाणी की कोमलता अब तिरोहित हो चुकी थी ! छड़ी से उतारे गए कपड़ों को वह जल्दी-जल्दी करीने से हैंगर में लगाता जा रहा था ! उसके मन का आक्रोश अब जुबाँ से भी फूट रहा था, “इतनी देर मोल भाव किया और कुछ भी नहीं लिया ! किसी दूसरे मोहल्ले में जाता तो अभी तक तो आधे कपड़े बिक गए होते मेरे !” झल्लाते हुए वह आगे को चल दिया ! नूरी भी मन मसोसते हुए अपने घर को चल दी ! 
करीना की आँखों से आँसू बह रहे थे ! अजलू फजलू के चहरे पर संतोष का भाव था और बानो का कलेजा दुःख से फटा जा रहा था ! आँखों के सामने से वो सुन्दर फ्रॉकें हट ही नहीं रही थीं ! अपने ज़रा से शगल के लिए उसने बच्चों का दिल दुखाया इसका भी पछतावा था ! करीना अपने जिस्म पर उन सुनहरी रुपहली नयी-नयी फ्रॉक्स के स्पर्श को याद कर देर तक सुबकती रही ! लेकिन मन में कहीं हल्की सी खुशी भी थी कि नई फ्रॉक न मिली तो न सही इतने अच्छे नए-नए कपड़े कम से कम उसके जिस्म से छुले तो सही वरना तो उसे हमेशा उतरन में मिली औरों की फटी पुरानी घिसी पिटी फ्रॉकें ही अब तक पहनने को मिलती रही हैं जो या तो साइज़ में बहुत बड़ी होती हैं या बहुत छोटी !
साधना वैद

Thursday, June 22, 2017

जीवन की जंग



जीतनी तो थी जीवन की जंग 
तैयारियाँ भी बहुत की थीं इसके लिए 
कितनी तलवारें भांजीं 
कितने हथियारों पर सान चढ़ाई
कितने तीर पैने किये
कितने चाकुओं पर धार लगाई
लेकिन एक दिन सब निष्फल हो गया 
जीवन के इस मुकाम पर आकर 
इतनी ताकत ही कहाँ रही हाथों में
कि कोई भी अस्त्र उठा सकूँ ।
कभी सुना था कि जीवन की जंग 
अस्त्र शस्त्रों से नहीं
खूबसूरत सुरभित फूलों से 
जीती जाती है ।
युद्ध की गगनभेदी रणभेरी से नहीं
सुमधुर स्वर्गिक दिव्य संगीत से
जीती जाती है ।
नहीं जानती इस जंग का 
क्या हश्र होगा लेकिन 
यह तय है कि अब ये हाथ
इतने अशक्त हो उठे हैं कि
इनसे एक फूल भी पकड़ना 
नामुमकिन हो गया है ।
और कानों में दिव्य स्वर्गिक 
जीवन संगीत के स्थान पर 
सिर्फ और सिर्फ तलवारों की 
खनखनाहट ही गूँजती रहती है ।
कोई तो बताये मैं क्या करूँ ।



साधना वैद

Saturday, June 17, 2017

परिवार और रिश्ते


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है । समाज है तो परिवार है, परिवार है तो रिश्ते हैं, रिश्ते हैं तो हर रिश्ते की एक मर्यादा है एक ज़रुरत है । परिवार में हर सदस्य का एक सुनिश्चित स्थान है और अपने स्थान के अनुरूप वह हर दूसरे रिश्ते से मान सम्मान, प्यार दुलार पाने व देने का अधिकारी है ।
जब तक जीवन है इंसान इन रिश्तों से बँधा है । साथ ही इन रिश्तों से जुड़ी ज़िम्मेदारियों से भी बँधा है । जैसे जन्म से जुड़े रिश्ते कभी ख़त्म नहीं होते उनसे जुड़ी ज़िम्मेदारियाँ भी कभी ख़त्म नहीं होतीं । जीवन को सफलतापूर्वक और सुख पूर्वक जीना है तो इन ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए और इन रिश्तों को यथोचित सम्मान देते हुए ही जीना होगा ।
ऐसा तो कभी हो ही नहीं सकता कि आपके पास ज़िम्मेदारियाँ सिफर हो जाएं । इंसान एक ही जीवन में अनेक रिश्तों से जुड़ी अनेक भूमिकाएं निभाता है । किसी एक भूमिका का अंत हो सकता है लेकिन दूसरी भूमिका से जुड़े दायित्व सदैव सामने रहेंगे । यह आपकी सोच और परिपक्वता पर निर्भर करता है कि आप किस रिश्ते और किस भूमिका को अधिक महत्त्व देते हैं और किस रिश्ते को बोझ समझ कर उतार फेंकना चाहते हैं ।
परिवार में जन्म के साथ ही व्यक्ति पुत्र की भूमिका में आ जाता है । इसके साथ ही जीवन के इस सफर में वह भाई, पति व पिता की भूमिका का निर्वाह भी करता है । सारे जीवन इन विभिन्न रूपों को जीना निभाना और हर रिश्ते की कसौटी पर खरा उतरना बहुत ही चुनौती भरा कार्य है इसमें कोई दो राय नहीं हैं । अक्सर किसी एक भूमिका के निर्वाह में ज़रा सी भी कमी आ जाने से कटु आलोचना और घोर मानसिक अनुताप भी झेलना पड़ सकता है । यह समय ही परीक्षा का समय होता है जिसमें आपको विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण होना आवश्यक हो जाता है । आपकी व्यवहार कुशलता, सूझ बूझ और समझदारी का यहाँ कडा इम्तहान ले लिया जाता है । पास या फेल होना आपके हाथ में है ।
रिश्तों का निर्वाह करते समय आपको यह नहीं भूलना चाहिए कि आज आप जिस स्थान पर दुविधाग्रस्त खड़े हैं कल आपके बच्चे भी उसी जगह पर खड़े होँगे क्योंकि वृद्धावस्था के आगमन के साथ आप उस स्थान पर होंगे जहां आज आपके माता पिता हैं ।
यह सत्य है कि नए रिश्तों में बंधने के साथ ही पुराने रिश्तों की चमक फीकी पड़ने लगती है और उनका गौण हो जाना लाज़िमी हो जाता है लेकिन उनका महत्त्व और उपयोगिता समाप्त हो चुकी है ऐसा समझने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए । जीवन में किसी व्यक्ति की ज़रुरत भले ही शून्य हो जाये उससे जुड़ी भावनायें, प्रेम और आत्मीयता की प्रतीति कभी कम नहीं हो सकती ।
हर रिश्ते और हर भूमिका का जीवन में सामान रूप से महत्त्व होता है । होना तो यह चाहिए कि किसी भी भूमिका के निर्वाह में किसी भी अन्य रिश्ते का निरादर और अवमानना न हो । ना ही कोई व्यक्ति स्वयं को उपेक्षित, प्रताड़ित या अपमानित अनुभव करे । कहने सुनने में यह मुश्किल ज़रूर लगता है लेकिन असंभव तो बिलकुल भी नहीं । बस हर रिश्ते को पूरी ईमानदारी से निभाने की दृढ इच्छाशक्ति होनी चाहिए । रिश्तों को निभाने की प्रतिबद्धता का जज़्बा किसी एक में ही नहीं परिवार के हर सदस्य में होना चाहिए तब ही रिश्तों की गरिमा को संजोया जा सकता है ।

साधना वैद

Tuesday, June 13, 2017

प्रतिदान




देखा तुमने 
तुमने तो अपने तरकश से
केवल एक ही तीर फेंका था

लेकिन उस एक तीर ने 
असुरक्षा और आतंक की 
कैसी ज़मीन 
तैयार कर दी है ।
अब देखो आत्मरक्षा के लिए 
सबके हाथों में कितने पैने
और नुकीले तीर सज गए हैं ।
चेहरे पर भय है,
वाणी में ज़हर उतर आया है ,
आँखों में नफ़रत है और 
हृदय में बदले की आग 
इतनी तीव्रता से धधक उठी है कि
प्रतिघात करने में 
ज़रा भी देर नहीं लगती ।
हल्की सी सरसराहट से भी
चौकन्ने हो सब तुरंत ही 
अपने अस्त्र शस्त्रों से लैस हो जाते हैं 
और मोर्चा सम्हाल लेते हैं ।
फिर एक पल भी यह सोचने में 
गँवाये बिना कि आगंतुक 
दोस्त है या दुश्मन 
अपनी पूरी ताक़त से उस पर
टूट पड़ते हैं ।
काश तुमने उस वक्त
तीर की जगह एक फूल 
फेंका होता तो तुम्हारे चारों ऒर
खूबसूरत और सुगन्धित फूलों से सजा
एक मधुबन खिल उठा होता । 
लोगों के चेहरे पर मुस्कान होती,
वाणी से अमृत छलकता,
आँखों में प्यार होता और 
अंतस्तल में आत्मीयता का 
सागर हिलोरें ले रहा होता । 
काश .............



साधना वैद

Thursday, June 1, 2017

कमाई



कमाई
जीवन के स्क्वाश कोर्ट में खड़ी हूँ
सोच में डूबी
सारे जीवन गेंद को पूरी ताकत से 
दीवार पर मारती रही ।
तब ताक़त थी न बहुत 
कभी सोचा ही नहीं 
बीच में आने वाला हर व्यक्ति 
इन तीव्र गेंदों के वेग से 
घायल हो रहा है ।
विषैले व्यंग, कटाक्ष, घृणा और धिक्कार 
अपमान, अवमानना, तिरस्कार और उपहास के ज़बरदस्त 
बाउंसर पे बाउंसर मैं फेंकती रही 
और घायल करती रही 
बिन देखे ही कि 
जो घायल हो रहे हैं 
वो मेरे अपने ही हैं । 
आज रिबाउंड होकर वही गेंदें
दुगुने वेग से मेरे पास लौट रही हैं 
मुझे चोटें पहुंचाती 
मुझे घायल करतीं और 
बिलकुल निसंग और एकाकी करतीं ।
क्या कहूँ ! 
जो चोटें आज मुझे मिल रही हैं 
उनसे भी गहरी चोटें 
शायद वो चोटें हैं 
जो अतीत में मैंने 
उन्हें दी थीं । 
उस वक्त जब रिश्तों का पन्ना 
बिलकुल कोरा था 
एक बहुत ही खूबसूरत 
इबारत लिखने के लिए 
मैंने अहंकार और अभिमानवश 
जो कुछ उस पर लिख दिया था 
उसका यही सिला मुझे मिलना 
लाज़िमी था । 
अब गिला कैसा !
यही है मेरे जीवन भर की कमाई ।



साधना वैद

Sunday, May 28, 2017

नसीब की बात



आँसुओं से सींच कर
दिल की पथरीली ज़मीन पर
मैंने कुछ शब्द बोये थे
ख़्वाबों खयालों और
दर्द भरे अहसासों का
खूब सारा खाद भी डाला था
उम्मीद तो कम थी लेकिन
एक दिन मुझे हैरान करतीं
मेरे दिल की क्यारी में
कुछ बेहद मुलायम बेहद खूबसूरत
नर्मो नाज़ुक सी कोंपलें फूट आईं
जिनमें चन्द नज़्में, चंद गज़लें,
चंद कवितायें और चंद गीत
खिल उठे थे ।
मेरा फौलादी बंजर सा मन
अनायास ही मद भरे गुलशन में
तब्दील हो गया ।
ऐसा लगा मैं खुद भी
फूल सी हल्की हो गयी हूँ
और जहान भर की खुशियाँ
मेरे दामन में समा गयी हैं ।
उन रचनाओं की खूबसूरती
उनकी खुशबू और उनकी
नशीली अक्सरियत को मैं
भरपूर जी भी न पाई थी कि
वक्त का हैवान एक दिन
बड़े बड़े डग भरता आया और
बड़ी बेदर्दी से उन कलियों को
रौंदता हुआ निकल गया ।
नसीब अपना अपना !
अब वहाँ वही चंद कुचली हुई
नज़्में, ग़ज़लें, कवितायें और गीत
बिखरे पड़े हैं जिन्हें बटोर कर
सहेजना मेरे लिए
नामुमकिन हो गया है ।

साधना वैद

Sunday, May 21, 2017

भाग्यशाली



तुम्हें शायद नहीं पता
तुम्हारी आँखों का दुराव
तुम्हारी बातों का अलगाव
तुम्हारे व्यवहार का भटकाव
तुम लाख मुझसे छिपाने की
कोशिश कर लो
मेरी समझ में आ ही जाता है !
तुम्हारा बेवजह मुझसे नज़रें चुराना,
मुँह फेर व्यस्तता का दिखावा कर
हूँ हाँ वाले रूखे फीके जवाब देना,
चहरे पर अनायास उग आये
कँटीले तारों के जाल में उलझे रहना   
तुम्हें क्या लगता है ये सब
मेरी नज़र से छिपे रहते हैं ?
सच मानो ये मेरे दिल पर भी
उतनी ही तीव्रता से आघात करते हैं
जितनी गहराई से शायद
तुम्हें चोट पहुँचाते हैं !  
तुम्हारी आवाज़ के हर उतार चढ़ाव से
उसमें मुखर होती हर ऊब,
खीझ और उकताहट से
उसकी हर लरज़, हर कम्पन से
खूब परिचित हूँ मैं भी !
उस वक्त भी जब उसमें मेरे लिए
स्वागत और सम्मान होता है
चिंता और व्यग्रता होती है
प्रेम और निष्ठा निहित होती है
और तब भी जब उसमें मेरे लिए
अलगाव और अनादर होता है
व्यंग और कटाक्ष होता है
उपेक्षा और उपहास होता है !  
अक्सर यह विचार मन में आता है
जो देख नहीं सकते
जो सुन नहीं सकते
वो कितने भाग्यशाली हैं
जीवन की कितनी बड़ी कुरूपता के
अभिशाप से वे बचे हुए हैं !
जीवन के कितने पावन, कितने निर्मल,
कितने शुद्ध सौन्दर्य का
रसपान वे कर पाते हैं !
न कुछ बुरा देखते हैं
न ही सुनते हैं
शायद इसीलिये उनके मन में
अजस्त्र प्रेम की एक निर्मल धारा
सदैव प्रवाहित होती रहती है !
आज इसी बात का अफ़सोस है कि
हम देख सुन क्यों पाते हैं !
जो देख सुन न पाते तो
शायद हम भी उतने ही सुखी होते !

साधना वैद  



Sunday, May 14, 2017

रचना हूँ मैं तेरी माँ

मातृ दिवस पर विशेष 



मिट्टी से हूँ गढ़ी हुई

चौखट में हूँ जड़ी हुई

छाया हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


काँटों के संग उगी हुई

तीक्ष्ण धूप में पगी हुई

कलिका हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


युद्ध भूमि में डटी हुई

सुख सुविधा से कटी हुई

सेना हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


संघर्षों से दपी हुई

कुंदन जैसी तपी हुई

मूरत हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


अंतर्मन पर खुदी हुई

रोम रोम पर रची हुई

कविता हूँ मैं तेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


सात सुरों से सधी हुई

मीठी धुन में बंधी हुई

  विनती हूँ मैं तेरी माँ !  

रचना हूँ मैं तेरी माँ !


हर पल मेरे पास है तू

हर पल मेरे साथ है तू

धड़कन है तू मेरी माँ !

रचना हूँ मैं तेरी माँ !

साधना वैद




Tuesday, May 9, 2017

गूँज अनुगूँज



यह न समझना कि
देश की सर्वोच्च अदालत से
अपराधियों को कठोरतम दंड दिलवाकर 
उसके साथ हुए जघन्यतम अपराध की
तनिक भी भरपाई की जा सकेगी,
चंद हैवानों को फाँसी पर लटका कर
उस घायल रूह के टीसते ज़ख्मों की
ज़रा सी भी मरहम पट्टी की जा सकेगी !
कोई भी न्याय, कोई भी दंड, कोई भी फैसला
उस काल खंड में घटित हुए
उस बर्बर कृत्य को धो पोंछ कर
मिटा नहीं सकता, 
और अपार संभावनाओं से भरे
एक हँसते खेलते, विकसित होते
अनमोल जीवन का यूँ पाशविकता की
भेंट चढ़ जाने के दुर्भाग्य को
घटा नहीं सकता !
मर्मान्तक पीड़ा से उपजी
उस मासूम की मर्मभेदी चीखें,
सहायता के लिए याचना करती
उसकी अवश करुण पुकार,
क्रोध, क्षोभ, ग्लानि, घृणा,
हताशा और वेदना से
चरम पर पहुँचा उसका
गगनभेदी आर्तनाद
हमारे आसपास की फिज़ाओं में  
आज भी उसी तरह गूँज रहा है,
यह समाज जो शायद तब भी
हर अनाचार से आँखें मूँदे
इसी प्रकार निस्पृह था
अपराधियों को बचाने के लिए  
निरर्थक दलीलें दे इस
भयावह कटु सत्य से आज भी
आँखें मूँद रहा है !
उस निर्दोष आत्मा का प्रेत   
अनंत काल तक इन हवाओं में
इसी तरह घूमता रहेगा,
और जब तक उसकी चीखों से
हमारे कान इतने बहरे न हो जाएँ
कि उन चीखों के अलावा हमें
और कुछ सुनाई ही न दे,
यह चीत्कार इसी तरह गूँजता रहेगा !
चंद अमानुषों की
पाशविकता की शिकार
उस निर्दोष युवती की
दिल दहला देने वाली
आर्त पुकार का शायद तब कुछ असर हो
जब समाज का हर पुरुष
एक नारी के जीवन का
मोल समझना सीख जाए,  
और उसकी क्षत विक्षत रूह को  
शायद तब कुछ इन्साफ मिले
जब हर अमानुष नारी को समुचित
सम्मान देना सीख जाए !  

साधना वैद !




Saturday, May 6, 2017