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Wednesday, November 10, 2010

अबूझे सवाल

तुमने ही पुकारा था तब सौ बार हमें,
जब प्यार नहीं था तो जताया क्यों था !

रहने को ठिकाने थे बहुत मेरे लिये,
आँखों में बसा कर के गिराया क्यों था !

हमसे तो वफ़ा की बहुत तकरीरें कीं,
जो खुद नहीं सीखे वो सिखाया क्यों था !

मुझको तो ज़मीं से भी बहुत निस्बत थी,
फिर ऊँचे फलक पर यूँ बिठाया क्यों था !

जब वक्त की आँधी से बचाना ही न था,
बुझने के लिये दीप जलाया क्यों था !

जो इश्क इबादत सा कभी लगता था,
उस इश्क की कसमों को भुलाया क्यों था !

जिस नाम की कीमत बहुत थी नज़रों में,
दिल पर उसे लिख कर के मिटाया क्यों था !

तुम थे ही नहीं प्यार के काबिल फिर भी,
हर रस्म को इस दिल ने निभाया क्यों था !

साधना वैद