फूलों की चाह है तो काँटों को चुनना होगा
उड़ने की चाह है तो पंखों को खुलना होगा
ऐसे ही नहीं होती हर चाहत किसी की पूरी
कुछ बनने की चाह है तो सपनों को बुनना होगा !
साधना वैद
फूलों की चाह है तो काँटों को चुनना होगा
उड़ने की चाह है तो पंखों को खुलना होगा
ऐसे ही नहीं होती हर चाहत किसी की पूरी
कुछ बनने की चाह है तो सपनों को बुनना होगा !
साधना वैद
प्यारी बिटिया
कितनी मोहक
कितनी आकर्षक है
तुम्हारे अधरों पर
ठिठकी यह मुस्कान !
कितना लुभा रहे हैं
तुम्हारे खुले बिखरे ये बाल !
लगता है दो तीन दिन से
कंघी ने स्पर्श नहीं किया है इन्हें,
लेकिन फिर भी कितना
खिल रहा है तुम्हारा चेहरा
इस बिखरी केशराशि से घिरा !
आँखों में कितना निश्छल सा आग्रह है
कितना निष्पाप सा आमंत्रण है
अपना अधखाया हुआ
जूठा सैंडविच साझा करने का !
कैसे न बलिहारी जाऊँ
तुम्हारी मासूमियत पर
मेरी प्यारी सी गुड़िया रानी !
माँ हूँ न तुम्हारी !
सौ सौ जान कुर्बान जाती हूँ
तुम्हारी इस दरियादिली पर
तुम्हारी लाड़ भरी मनुहार पर !
किसीकी नज़र ना लगे
मेरी राजकुमारी को
बस यही दुआ है
नसीबों वाली इस माँ की !
साधना वैद
गहरा सागर
उत्ताल तरंगें
कम्पित बदन
कूल न किनारा
घना अँधियारा
व्याकुल है मन !
लम्बी पगडंडी
दूर है मंज़िल
थके हुए पाँव
मुश्किल है जाना
ठौर न ठिकाना
ले चल तू गाँव !
विहँसती हवा
मुस्काता गगन
खिलते सुमन
कहते कान में
दिन क्यों ख़ास है
तू आसपास है !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
आ ही गयी
ग्रीष्म ऋतु भी
ज्येष्ठ मास की
भीषण गर्मी
और विकट गर्मी से
व्याकुल प्राण
स्वेद बिन्दुओं से सिक्त
बोझिल अंग
शिथिल शरीर और
कल्पनाएँ निष्प्राण
कोमल बदन को
भस्मसात करते
गर्म लू के थपेड़े और
सुलगती हवाएं
प्रचंड आँधी तूफानों से
थर-थर काँपते वृक्ष
और दरकती धराएं
बूँद-बूँद को तरसते
प्यासे पंछी और
गुमसुम कुम्हलाए फूल
खामोश भँवरे और
स्वेद में भीगे ललनाओं के
मुलायम दुकूल
इन गर्म हवाओं की छुअन
मुझे सदा ही
व्याकुल कर जाती है
ग्रीष्म ऋतु मुझे
सबसे कम भाती है !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
वटवृक्ष सा
हमारा परिवार
शीतल छाँव
मासूम बच्चे
करते कलरव
गूँजता घर
बाबा की सीख
दादी की कहानियाँ
हमारी नींव
चाचा का लाड़
चाचियों का दुलार
बुआ का प्यार
माँ अन्नपूर्णा
पिता शिव शंकर
दीदी लक्ष्मी सी
सारे अपने
सुर नर किन्नर
स्वर्ग सा घर
बचपन का
अनमोल खजाना
अमीर हम
मिली सुशिक्षा
संस्कार, सुविचार
परिवार में
है परिवार
प्रथम पाठशाला
सब बच्चों की
अनुशासन,
सभ्यता, शिष्टाचार
सीखते यहीं
जीवन मूल्य
सीखे हमने इसी
परिवार में
बने समाज
सशक्त औ’ सुदृढ़
परिवारों से
जो कुछ पाया
उपकार मानते
परिवार का
मान मर्दन
कभी होने न देंगे
इस प्यार का !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
सद्कर्मों का सद्परिणाम
धीरज से तुम लेना काम
रखना तुम खुद पर विश्वास
पूरी होगी हर इक आस !
मिहनत से होता है नाम
करना होगा तुमको काम
घबरा कर मत जाना बैठ
रखनी होगी गहरी पैठ !
रहना तुम हर पल तैयार
हर बाधा कर लोगे पार
श्रम से ही मिलता सम्मान
मिले तुम्हें प्रभु का वरदान !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
नमस्कार साथियो,
'चौपई' एक नई विधा है ! यह 'चौपाई' से भिन्न है !
इस पर मेरा एक प्रयास !
मुद्दत से दिल में थी प्यास
जाने कब पूरी हो आस
मिल कर जब बैठेंगे पास
बाटेंगे खुशियाँ तब ख़ास !
हो जाएंगे दुःख सब दूर
चिंता हो जाएगी चूर
मन्नत सबकी होगी पूर
चेहरों पर उतरेगा नूर !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
क्या इस बार भी
खूबसूरत आभासी गुलदस्ते,
तरह-तरह के आभासी केक
और वंचना भरे शुभकामना सन्देश
भेज कर मना लोगे तुम
‘मदर्स डे’,
और खुश हो जाओगे
अपनी दयानतदारी पर,
या अपनी व्यस्ततम दिनचर्या से
निकाल पाओगे
कुछ दिन, कुछ घंटे, कुछ पल
और कर दोगे उन्हें समर्पित
अपनी वास्तविक माँ के लिए
जो वर्षों से दूर देश के किसी
निर्जन एकांत में
तुम्हारी राह देखते-देखते हर क्षण
हताश होती जा रही है,
वृद्ध होती जा रही है,
दुर्बल होती जा रही है ?
तुम्हारी माँ की आँखें
अब पथरा गई हैं,
घुटनों के दर्द ने
चलना दुश्वार कर दिया है,
तुम्हारे लिए स्वादिष्ट पकवान
बनाने वाले अभ्यस्त हाथ
अब पानी से भरा
गिलास उठाने में भी
काँपने लगे हैं !
बिस्तर पर लेटे-लेटे वह
जोहती रहती है तुम्हारी बाट !
इससे पहले कि उसकी आँखें
इतनी धुँधला जाएं कि वह
तुम्हें पहचान ही न पाए
एक बार तो मना लो ‘मदर्स डे’
उसके साथ, उसके पास,
उसके सानिध्य में !
इससे बड़ा उपहार उसके लिए
शायद और कुछ न होगा !
एक बात याद रखना
दुनिया के सारे खूबसूरत मंज़र
सदियों बाद भी ऐसे ही
सुंदर बने रहेंगे लेकिन
माता-पिता की नश्वर देह
पल-पल छीजती जाती है,
शिथिल होती जाती है,
चुकती जाती है !
देर न हो जाए कहीं
देर न हो जाए !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
ग़रीब तो हैं
खुद्दार भी हैं हम
टूटते हैं तो
जानते है जुड़ना
गिर के खड़े होना !
मजदूर हैं
मजबूर नहीं हैं
रच डालेंगे
स्वेद की सियाही से
निज सौभाग्यनामा !
उठायें बोझ
सारे जग का हम
और हमारा ?
बोलो, कौन उठाये ?
सीने से चिपटाये ?
क्या दोगे तुम
किताब या कुदाल ?
खुशी या आँसू ?
खिलौने या फावड़ा?
जीवन या मरण ?
जाती बाहर
रोटी की जुगत में
माँ काम पर
मैं हूँ घर की रानी
करती चौका पानी !
हर चुनौती
आसान या मुश्किल
साध्य है मुझे !
नहीं स्वीकार अब
वर्चस्व पुरुषों का !
ओ मेरे मौला
माथे पे गहराती
चिंता की रेख
सोने की कलम से
लिख नया सुलेख !
तू है महान
धरा से नभ तक
हर दिशा में
गुंजित तेरा गान
ओ माँ तुझे सलाम !
बोझ उठाते
नये घर बनाते
न जाने कैसे
हम बेघर हुए
खुद पे बोझ हुए !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
मल्होत्रा जी अपनी चमचमाती हुई गाड़ी से उतरे और घर की ओर बढ़े ! दीनू भी उनके पीछे
चल दिया ! तभी दरबान की कड़कती हुई आवाज़ आई, “कहाँ घुसा
चला जा रहा है ! औकात है तेरी ऐसे फर्श पर पैर धरने की ! चल बाहर निकल ! मालिक को
बात करनी होगी तो बुला लेंगे तुझे !”
दीनू वहीं ठिठक गया ! उसकी आँखें भर आईं ! कैसे बताए कि तीन साल पहले इस भवन की हर
दीवार की एक-एक ईंट उसीकी ही लगाई हुई है और जिस फर्श पर पाँव धरने की आज उसकी
औकात नहीं आँकी जा रही उस फर्श की ऐसी चिकनी और सुन्दर सूरत उसीकी जी तोड़ मेहनत और
घिसाई के बाद ही निकल कर आई है ! विडम्बना देखिये आज उसीके बनाए फर्श पर पाँव धरने
के लायक उसकी औकात है या नहीं यह एक दरबान तय कर रहा है !
साधना वैद
कितनी फुर्सत से रचा, प्रभु ने यह उपहार
सजे हुए हैं खोल में, दाने सुंदर चार !
दाने सुंदर चार, ईश की लीला न्यारी
लगते कितने स्वाद, धरा पर कूड़ा भारी !
कहे साधना आज, बात तो है बस इतनी
प्रभु ने यह उपहार, रचा फुर्सत से कितनी !
बैठे महफिल में सभी, छेड़ रहे हों राग
मूँगफली हों सामने, खुल जायेंगे भाग !
खुल जायेंगे भाग, बड़ी गुणकारी मेवा
भर-भर बाँटो आज, करो तुम सबकी सेवा
कहे साधना आज, “अजी तुम काहे ऐंठे
चलो बढ़ाओ हाथ, रहो ना गुमसुम बैठे !”
भावे सबको कुरकुरी, स्वाद मिले भरपूर
हाथ रुके ना एक पल, होय न पैकिट दूर !
होय न पैकिट दूर, मज़ा हो जाए दूना
खाते जाएं दोस्त, लगे कितना भी चूना
कहे साधना आज, न कोई उठ के जावे
मूँगफली के साथ, मसाला सबको भावे !
होकर तन्मय देखते, परदे पर है चोर
अँधियारे में सब सुनें, चटर पटर का शोर !
चटर पटर का शोर, कहीं गिर जाए दाना
होता मन बेचैन, ढूँढ कर उसको लाना
कहे साधना आज, दुखी हैं दाना खोकर
मिल जाए तब फिल्म, देखते तन्मय होकर !
साधना वैद
लिख डाले कितने खत
जोश में हमने
तुम्हारे लिए
कितने ही कोरे कागज
रंग डाले हमने
तुम्हारे लिए
सोचते थे ले आएंगे
तोड़ कर तारे
तुम्हारे लिए
चाँद भी उतार लाएंगे
इस ज़मीन पर
तुम्हारे लिए
लेकिन चूर चूर हुआ
जो सपना देखा
तुम्हारे लिए
हम वंदनवार लगाते रहे
चौक पुराते रहे
तुम्हारे लिए
हज़ारों दीप जलाते रहे
फूल बिछाते रहे
तुम्हारे लिए
पूरा घर सजाते रहे
रंगोली बनाते रहे
तुम्हारे लिए
तुम अनदेखा करते रहे
हम मिटते रहे
तुम्हारे लिए
साधना वैद
दिन भर मुझको काम बताता
सारे घर में नाच नचाता
लेकिन मन का है वो सच्चा
को सखी साजन ? ना सखी बच्चा !
९
ले आता मँहगे उपहार
चूड़ी, कंगन, झुमके, हार
चाहे खुश होकर दूँ दाद
को सखी साजन ? ना री दमाद !
१०
रात को जब खिड़की से आये
देख उसे दिल घबरा जाए
मन चाहे कर दूँ मैं शोर
को सखी साजन ? ना सखी चोर !
११
जैसे ही वो घर में आये
मेरी साँस गले घुट जाए
रौब दाब है उसका जबरा
को सखी साजन ? ना सखी ससुरा !
१२
जो कह दूँ वो कभी न सुनता
जो बतलाऊँ उलटा करता
करता है अपनी मनमर्ज़ी
को सखी साजन ? ना सखी दर्ज़ी !
१३
दबे पाँव घर में आ जाए
किचिन खोल सब माल उड़ाये
मक्खन, ब्रेड, जैम, अंगूर
को सखी साजन ? ना लंगूर !
१४
जब आकर खिड़की से झाँके
पहरों बैठा मुझको ताके
लगे मुझे हर दुःख तब मंदा
को सखी साजन ? ना सखी चंदा !
१५
मुझे देख कर सीटी मारे
ज़ोर ज़ोर से नाम पुकारे
और सुनाये मीठे बैना
को सखी साजन ? ना सखी मैना !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
महीनों से एक टूटे फूटे कनस्तर में पड़े पत्थर के थोड़े से कोयलों को बड़ी हैरानी हो रही थी ! आज मालकिन ने उन्हें सालों बाद बाहर निकाला है ! सूरज की रोशनी आज ज्यादह चमकदार लग रही थी ! हवा भी तो कितनी खुशनुमां लग रही थी ! वरना इतने दिनों से सीलन भरे डिब्बे में बंद पड़े उनका तो दम ही घुटा जा रहा था ! आज शांता बाई पुरानी-धुरानी अँगीठी को भी बड़े जतन से मरम्मत करके साफ़ सुथरी मिट्टी से पोत रही थी ! पास में एक थैली में कुछ उपले भी रखे थे ! आखिर कोयलों से रहा नहीं गया तो पूछ ही लिया उपलों से !
“आखिर बात क्या है उपले भाई ? इतने लम्बे समय से हम तो अपने कनस्तर में बंद पड़े सो रहे थे तो दुनिया की कुछ खबर ही नहीं है हमको ! आज मालकिन को हमारी याद कैसे आ गयी ?”
उपले कुछ गुमसुम से लग रहे थे !
“अरे, तो क्या तुम्हें युद्ध की कोई खबर नहीं है कोयला भाई ? यह जो अमेरिका और इरान में युद्ध छिड़ गया है उसके कारण खाना पकाने वाली गैस की कमी हो गई है ! इसीलिये अब मालकिन को हमारी याद आई है ! यह हमारी खातिर तवज्जो इसीलिये हो रही है कि अब घर वालों की भूख मिटाने के लिए हमें अपना बलिदान देना होगा !”
“अरे, इतनी भी चिंता क्यों कर रहे हो उपले भाई ! मैं हूँ ना चिर युवा ! मेरे होते तुम पर कोई आँच नहीं आएगी ! तुम्हारी साज सजावट तो सिर्फ इसलिए है कि घर में ब्याह शादी हो तो सारे बारातियों को सज धज के तैयार रहना चाहिए ! न जाने किसकी पुकार लग जाए ! तुम चिंता न करो ! मेरे होते तुम्हारी शहादत की ज़रुरत नहीं पड़ेगी इसका भरोसा है मुझे !”
तसल्ली देती यह आवाज़ थी इन्डक्शन चूल्हे की !
साधना वैद
आज ओम प्रकाश जी के घर में उत्सव का माहौल है !
वर्षों से चले आ रहे ज़मीनी विवाद के मुकदमे का फैसला आखिरकार आज उनके हक़ में आ ही
गया ! उनका छोटा भाई सूरज प्रकाश, जो गाँव के
प्राइमरी स्कूल में टीचर है और आर्थिक रूप से भी कमज़ोर है, मुकदमा हार गया ! इस मुकदमे को जीतने के लिए कुछ कम करतब तो ओमप्रकाश जी ने भी
नहीं किये थे ! कितनी तो तिकड़में लगाईं, कितनी चालें चलीं,
अधिकारियों की जेबें भरने के लिए पैसा भी कम नहीं बहाया !
तो जीत तो उनके पाले में आनी ही थी ! सूरज प्रकाश की कहाँ औकात थी उनसे मोर्चा लेने
की ! प्राइमरी स्कूल का अदना सा शिक्षक, बच्चों को नैतिक
शिक्षा और सदाचरण का पाठ ही पढ़ाता रह गया और मुकदमे की मार से और गरीब होता चला
गया ! नैतिक शिक्षा की चादर ओढ़ कर आज की दुनिया में कहीं मुकदमे जीते जाते हैं ?
रात भर ओमप्रकाश जी के घर में शराब और शबाब के
दौर चलते रहे ! बड़े-बड़े नेता, विधायक, अधिकारी सभी आमंत्रित थे ! सूरज प्रकाश के घर में आज अंधकार
छाया था ! रात को चूल्हा भी न जला था ! बच्चों को मन मसोस कर सुबह के बचे खाने से
कुछ निवाले खिला दिए घरवाली ने और दोनों पति पत्नी दो घूँट पानी पीकर सोने का उपक्रम
करते रहे ! बड़े भाई के घर के जश्न की आवाजें मन पर घन की सी टंकार करती रहीं !
सुबह हो गयी थी ! ओमप्रकाश जी के घर से जश्न की
आवाजें आना बंद हो चुकी थीं लेकिन आगंतुकों की आवाजाही बढ़ गयी थी ! तभी सूरज
प्रकाश का बड़ा बेटा घबराया हुआ आया !
“पापा, ताऊजी को बड़े जोर
का हार्ट अटैक आया है ! गाँव के सारे डॉक्टर्स आये हैं ! शहर के बड़े अस्पताल ले
जाने की बात हो रही है ! आप चलिए ना !”
उद्विग्न सूरज प्रकाश चप्पल भी नहीं पहन पाए कि
गगन भेदी विलाप के स्वर वातावरण में गूँज उठे ! सालों की जद्दोजहद के बाद मिली जीत
को ओम प्रकाश जी चौबीस घंटे भी मना नहीं सके ! मुकदमा जीतने के बाद आखिर हासिल
क्या हुआ उन्हें सब यही सोच रहे थे !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
राधिका बहुत खुश थी ! उसके परंपरावादी परिवार ने बड़ी
कशमकश और तनातनी के बाद अंतत: बड़े भैया माधव के अंतरजातीय विवाह के लिए अनुमति दे
ही दी ! उनके रूढ़िवादी ब्राहमण परिवार में यह एक ऐतिहासिक फैसला था कि माधव का
विवाह उसके साथ पढ़ने वाली रागिनी के साथ होने जा रहा था ! यद्यपि उसके बाबा दादी
और घर के अन्य वरिष्ठ सदस्य अभी भी इस निर्णय के खिलाफ थे ! ऐसा दुस्साहस अभी तक
उनके खानदान में किसी ने नहीं किया था लेकिन इकलौते बेटे की जिद के आगे सबको अपने
हथियार डालने ही पड़े ! राधिका खुश थी इसलिए कि अब उसका रास्ता भी साफ़ हो गया है !
जब माधव भैया का विवाह वैश्य समुदाय की कन्या के साथ हो सकता है तो उसका विवाह
उसके कायस्थ दोस्त के साथ क्यों नहीं हो सकता ! विश्वास बहुत्त ही स्मार्ट,
हैंडसम और प्रतिभाशाली नौजवान है और उसके साथ ही एक मल्टी नेशनल कंपनी में काम
करता है ! उसके परिवार में सभी उच्च शिक्षित और प्रगतिशील सोच रखने वाले उदारमना
लोग हैं ! मन ही मन उसने अपने सुन्दर भविष्य के सपने बुनने भी शुरू कर दिए थे ! रात
को ही उसने विश्वास को पत्र में लिख दिया था कि माधव भैया की शादी के बाद वह अपने
माता-पिता से अपने बारे में बात करेगी ! यह पत्र आज वह ऑफिस में विश्वास को देने
वाली थी ! उसे माधव भैया और अपनी नई नवेली भाभी से भी समर्थन की पूरी आशा थी !
अधरों पर मीठी सी मुस्कान लिए उसने यही बात बताने के लिए विश्वास को वीडियो कॉल मिलाया
!
उसी समय आँधी की तरह उसकी मम्मी ने कमरे में प्रवेश किया और उसके हाथ से फोन छीन
कर दूर फेंक दिया ! उनके हाथ में राधिका का लिखा हुआ पत्र था !
“क्या है यह सब राधिका ?” माँ की आँखों से खून बरस रहा था !
“तुम्हारी हिम्मत भी कैसे हुई यह सब सोचने की और करने की ?”
“क्या हो गया मम्मी ? माधव भैया अपनी पसंद की लड़की से शादी कर सकते हैं तो मैं
अपनी पसंद के लड़के से क्यों नहीं ?” राधिका सहम गयी थी !
“माधव से बराबरी करोगी तुम ? अरे वह लड़का है ! लड़कों के सौ गुनाह भी माफ़ हो जाते
हैं लेकिन लड़की का एक गुनाह पूरे कुल को ले डूबता है ! जानती हो तुम?”
साधना वैद
बच्चे शिक्षक
का नहीं, करते अब सम्मान
मौक़ा एक न
छोड़ते, करते नित अपमान
!
कोचिंग कक्षा
की बड़ी, मची हुई है धूम
लेकिन लालच ने
किया, इसको भी बदनाम
!
दुगुनी तिगुनी
फीस भर, माथा जाये घूम
कहते विद्या
दान से, बड़ा न कोई दान !
साक्षरता के
नाम पर, कैसी पोलम पोल
सच्चे झूठे आँकड़े, भरने से बस काम !
नैतिकता
कर्तव्य को, ढीठ पी गए घोल
!
प्रतिशत बढ़ना
चाहिए, साक्षरता के
नाम !
कक्षा नौ में
छात्र सब, दिए गए हैं ठेल
ऐसी शिक्षा से
भला, किसका होगा नाम
!
अध्यापक और
छात्र में, हो न परस्पर
भीत
शिष्य करें गुरुदेव का, मन से आदर मान !
करना होगा पितृ
सम, शिक्षक को व्यवहार
बच्चे भी दर्शन करें शिक्षक में भगवान् !
साधना वैद
बुरा न मानें
न चिढ़ें, न चिढ़ाएँ
रंग लगाएं
प्रेम और प्यार के
दें शुभकामनाएं ।
प्यार का पर्व
है रंगों की बहार
मीठी गुंजार
है पानी की फुहार
है होली का त्योहार
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
आप घर से बाहर
कहीं भी जाइए, वो चाहे किसी भी स्तर का होटल हो, अस्पताल हो, स्कूल कॉलेज हो या कार्यालय हो आपकी सुविधा के लिए आपको हर
स्थान पर सहायकों का एक दल मिलेगा जिसे उस संस्था के आयोजक सेवा दल का नाम देते
हैं ! सरकारी नौकरी करने वाले लोग भी सेवक कहलाते हैं ! इसका तो नाम ही लोक सेवा
आयोग है ! राजनीति में आने वाले लोग भी स्वयं को जनता का सेवक कहते हैं लेकिन उनका
तो उद्देश्य ही जनता को ठगना है और सारे छल छद्म करके उनसे वोट हासिल करना है ! मेरी
दृष्टि में हर वह कार्य जिसके लिए आपको वेतन मिलता है वह आपकी जीविका का साधन है
सेवा नहीं ! इन सभी स्थानों पर परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से आप स्वयं ही इन सेवाओं
का भुगतान करते हैं ! कभी किराए के रूप में, कभी टिप के
रूप में, कभी फीस के रूप में या कभी रिश्वत के रूप में
जिसे आज की प्रचलित भाषा में सुविधा शुल्क कहा जाता है ! सेवा कभी खरीदी या बेची
नहीं जा सकती ! सेवा एक अमूर्त भावना है जिसके प्रतिदान में कोई भी अपेक्षा या
प्रत्याशा नहीं होती ! यह सिर्फ अनन्य प्रेम, करुणा, दया या श्रद्धा से जुड़ी भावना है जिसके पीछे न कोई स्वार्थ
होता है न ही लालच ! सेवा के पीछे परोपकार की भावना जुड़ी होती है जहाँ आप निर्मल
मन से केवल सामने वाले के कष्ट को कम करने के प्रयास में तन मन धन से जुट जाते हैं
और हर हाल में उसे सुख पहुँचाना चाहते हैं यह जानते हुए भी कि आपको इसके प्रतिदान में
कुछ मिलने वाला नहीं है ! सेवा एक विशुद्ध सात्विक कर्म है जो सेवा पाने वाले और
सेवा करने वाले दोनों को ही अनिर्वचनीय आनंद से भर देता है और दोनों को ही इससे
परम सुख की प्राप्ति होती है !
इस निष्काम सेवा के भी तीन रूप होते हैं ! एक सेवा वह है जिसके तहत हम किसी साधू
महात्मा या किसी बुज़ुर्ग को सम्मान देने के लिए उनके सारे काम करते हैं, उनके पैर
दबाते हैं, उनके भोजन पानी की व्यवस्था करते हैं और उनके बाकी सारे कार्य भी करते
हैं ताकि उनकी सहायता हो जाए और हमें उनका आशीर्वाद मिल जाए !
दूसरी सेवा के तहत आता है मंदिरों या गुरुद्वारों में जाकर सेवा कार्य करना जैसे
इन देवस्थानों की साफ़ सफाई, जूते चप्पलों का रख रखाव
या वहाँ की रसोई में भोजन बनाने या परसने खिलाने में मदद करना ! बर्तनों की साफ़
सफाई इत्यादि !
और तीसरी सेवा वह होती है जो बिलकुल दीन हीन, असहाय, लाचार अस्वस्थ
रोगियों के लिए की जाती है जिन्हें मदद न मिले तो उनका जीवन संकट में आ जाए !
मेरे विचार से हर मनुष्य जिसमें मानवता शेष है अपनी क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार
कुछ न कुछ सेवा तो अवश्य ही करता है !
साधना वैद
झीना था प्रतिरूप तुम्हारा, छीना था हर चैन हमारा
अच्छा था मोहक था खेल, सच्चा था रोचक था मेल
करते रहे तुम्हें हम दूर, कहते रहे तुम्हें हम हूर
छलना था कितना आसान, कहना था बस दो फरमान
तुमको हमने चाहा यह सुख अपना था
तुमको पा हम लेंगे यह एक सपना था !
सपने लेकिन
होते हैं केवल सपने
हमको पल-पल
तिल-तिल करके तपना था !
जागी जगती, जागे पक्षी, जलचर जागे
जागी धरती, तारे, चंदा, अम्बर जागे
जागो तुम अब जाग गया सूरज देखो
जागी प्रकृति सकल सृष्टि अंतर जागे !
साधना वैद