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Sunday, May 17, 2026

ग्रीष्म ऋतु

 





आ ही गयी 

ग्रीष्म ऋतु भी 

ज्येष्ठ मास की 

भीषण गर्मी 

और विकट गर्मी से 

व्याकुल प्राण

स्वेद बिन्दुओं से सिक्त 

बोझिल अंग

शिथिल शरीर और 

कल्पनाएँ निष्प्राण 

कोमल बदन को 

भस्मसात करते

गर्म लू के थपेड़े और 

सुलगती हवाएं 

प्रचंड आँधी तूफानों से 

थर-थर काँपते वृक्ष 

और दरकती धराएं

बूँद-बूँद को तरसते 

प्यासे पंछी और

गुमसुम कुम्हलाए फूल 

खामोश भँवरे और 

स्वेद में भीगे ललनाओं के 

मुलायम दुकूल 

इन गर्म हवाओं की छुअन 

मुझे सदा ही

व्याकुल कर जाती है 

ग्रीष्म ऋतु मुझे 

सबसे कम भाती है !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद


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