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Wednesday, April 29, 2026

औकात - लघुकथा


 






दीनू एक शानदार भव्य भवन के ऊँचे से गेट के बाहर दो घंटे से खड़ा हुआ घर के मालिक मल्होत्रा जी का इंतज़ार कर रहा था ! उन्होंने ही संदेशा भेज कर उसे गाँव से बुलवाया था ! उनके किसी दोस्त का मकान बन रहा था और उन्हें किसी होशियार मिस्त्री की ज़रुरत थी ! मल्होत्रा जी जानते थे कि इस काम के लिए दीनू से बढ़िया और कोई मिस्त्री नहीं हो सकता इसीलिये उन्होंने उसके पास ड्राईवर की मार्फ़त संदेसा भिजवाया था ! उनका ड्राईवर भी तो उसी गाँव का है जहाँ दीनू रहता है ! जैसे ही मल्होत्रा जी की गाड़ी आई दरबान ने अदब से उठ कर गेट खोला ! गाड़ी के साथ-साथ दीनू ने भी भवन के अहाते में प्रवेश कर लिया !


मल्होत्रा जी अपनी चमचमाती हुई गाड़ी से उतरे और घर की ओर बढ़े ! दीनू भी उनके पीछे चल दिया ! तभी दरबान की कड़कती हुई आवाज़ आई
, “कहाँ घुसा चला जा रहा है ! औकात है तेरी ऐसे फर्श पर पैर धरने की ! चल बाहर निकल ! मालिक को बात करनी होगी तो बुला लेंगे तुझे !”


दीनू वहीं ठिठक गया ! उसकी आँखें भर आईं ! कैसे बताए कि तीन साल पहले इस भवन की हर दीवार की एक-एक ईंट उसीकी ही लगाई हुई है और जिस फर्श पर पाँव धरने की आज उसकी औकात नहीं आँकी जा रही उस फर्श की ऐसी चिकनी और सुन्दर सूरत उसीकी जी तोड़ मेहनत और घिसाई के बाद ही निकल कर आई है ! विडम्बना देखिये आज उसीके बनाए फर्श पर पाँव धरने के लायक उसकी औकात है या नहीं यह एक दरबान तय कर रहा है !

साधना वैद


Friday, April 24, 2026

मूँगफली पुराण

 



कितनी फुर्सत से रचा, प्रभु ने यह उपहार

सजे हुए हैं खोल में, दाने सुंदर चार !

दाने सुंदर चार, ईश की लीला न्यारी 

लगते कितने स्वाद, धरा पर कूड़ा भारी !

कहे साधना आज, बात तो है बस इतनी 

प्रभु ने यह उपहार, रचा फुर्सत से कितनी ! 


बैठे महफिल में सभी, छेड़ रहे हों राग

मूँगफली हों सामने, खुल जायेंगे भाग !

खुल जायेंगे भाग, बड़ी गुणकारी मेवा 

भर-भर बाँटो आज, करो तुम सबकी सेवा 

कहे साधना आज, “अजी तुम काहे ऐंठे 

चलो बढ़ाओ हाथ, रहो ना गुमसुम बैठे !” 


भावे सबको कुरकुरी, स्वाद मिले भरपूर

हाथ रुके ना एक पल, होय न पैकिट दूर !

होय न पैकिट दूर, मज़ा हो जाए दूना 

खाते जाएं दोस्त, लगे कितना भी चूना

कहे साधना आज, न कोई उठ के जावे

मूँगफली के साथ, मसाला सबको भावे ! 


होकर तन्मय देखते, परदे पर है चोर 

अँधियारे में सब सुनें, चटर पटर का शोर !

चटर पटर का शोर, कहीं गिर जाए दाना 

होता मन बेचैन, ढूँढ कर उसको लाना 

कहे साधना आज, दुखी हैं दाना खोकर  

मिल जाए तब फिल्म, देखते तन्मय होकर !  



साधना वैद 

Tuesday, April 14, 2026

फायकू - 2

 




लिख डाले कितने खत

जोश में हमने

तुम्हारे लिए

 

कितने ही कोरे कागज

रंग डाले हमने

तुम्हारे लिए

 

सोचते थे ले आएंगे

तोड़ कर तारे

तुम्हारे लिए

 

चाँद भी उतार लाएंगे

इस ज़मीन पर

तुम्हारे लिए

 

लेकिन चूर चूर हुआ

जो सपना देखा

तुम्हारे लिए

 

हम वंदनवार लगाते रहे 

चौक पुराते रहे

तुम्हारे लिए

 

हज़ारों दीप जलाते रहे

फूल बिछाते रहे

तुम्हारे लिए

 

पूरा घर सजाते रहे

रंगोली बनाते रहे

तुम्हारे लिए

 

तुम अनदेखा करते रहे

हम मिटते रहे

तुम्हारे लिए



चित्र - गूगल से साभार 

 

साधना वैद