कितनी फुर्सत से रचा, प्रभु ने यह उपहार
सजे हुए हैं खोल में, दाने सुंदर चार !
दाने सुंदर चार, ईश की लीला न्यारी
लगते कितने स्वाद, धरा पर कूड़ा भारी !
कहे साधना आज, बात तो है बस इतनी
प्रभु ने यह उपहार, रचा फुर्सत से कितनी !
बैठे महफिल में सभी, छेड़ रहे हों राग
मूँगफली हों सामने, खुल जायेंगे भाग !
खुल जायेंगे भाग, बड़ी गुणकारी मेवा
भर-भर बाँटो आज, करो तुम सबकी सेवा
कहे साधना आज, “अजी तुम काहे ऐंठे
चलो बढ़ाओ हाथ, रहो ना गुमसुम बैठे !”
भावे सबको कुरकुरी, स्वाद मिले भरपूर
हाथ रुके ना एक पल, होय न पैकिट दूर !
होय न पैकिट दूर, मज़ा हो जाए दूना
खाते जाएं दोस्त, लगे कितना भी चूना
कहे साधना आज, न कोई उठ के जावे
मूँगफली के साथ, मसाला सबको भावे !
होकर तन्मय देखते, परदे पर है चोर
अँधियारे में सब सुनें, चटर पटर का शोर !
चटर पटर का शोर, कहीं गिर जाए दाना
होता मन बेचैन, ढूँढ कर उसको लाना
कहे साधना आज, दुखी हैं दाना खोकर
मिल जाए तब फिल्म, देखते तन्मय होकर !
साधना वैद

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