फूलों की चाह है तो काँटों को चुनना होगा
उड़ने की चाह है तो पंखों को खुलना होगा
ऐसे ही नहीं होती हर चाहत किसी की पूरी
कुछ बनने की चाह है तो सपनों को बुनना होगा !
साधना वैद
फूलों की चाह है तो काँटों को चुनना होगा
उड़ने की चाह है तो पंखों को खुलना होगा
ऐसे ही नहीं होती हर चाहत किसी की पूरी
कुछ बनने की चाह है तो सपनों को बुनना होगा !
साधना वैद
प्यारी बिटिया
कितनी मोहक
कितनी आकर्षक है
तुम्हारे अधरों पर
ठिठकी यह मुस्कान !
कितना लुभा रहे हैं
तुम्हारे खुले बिखरे ये बाल !
लगता है दो तीन दिन से
कंघी ने स्पर्श नहीं किया है इन्हें,
लेकिन फिर भी कितना
खिल रहा है तुम्हारा चेहरा
इस बिखरी केशराशि से घिरा !
आँखों में कितना निश्छल सा आग्रह है
कितना निष्पाप सा आमंत्रण है
अपना अधखाया हुआ
जूठा सैंडविच साझा करने का !
कैसे न बलिहारी जाऊँ
तुम्हारी मासूमियत पर
मेरी प्यारी सी गुड़िया रानी !
माँ हूँ न तुम्हारी !
सौ सौ जान कुर्बान जाती हूँ
तुम्हारी इस दरियादिली पर
तुम्हारी लाड़ भरी मनुहार पर !
किसीकी नज़र ना लगे
मेरी राजकुमारी को
बस यही दुआ है
नसीबों वाली इस माँ की !
साधना वैद
गहरा सागर
उत्ताल तरंगें
कम्पित बदन
कूल न किनारा
घना अँधियारा
व्याकुल है मन !
लम्बी पगडंडी
दूर है मंज़िल
थके हुए पाँव
मुश्किल है जाना
ठौर न ठिकाना
ले चल तू गाँव !
विहँसती हवा
मुस्काता गगन
खिलते सुमन
कहते कान में
दिन क्यों ख़ास है
तू आसपास है !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
आ ही गयी
ग्रीष्म ऋतु भी
ज्येष्ठ मास की
भीषण गर्मी
और विकट गर्मी से
व्याकुल प्राण
स्वेद बिन्दुओं से सिक्त
बोझिल अंग
शिथिल शरीर और
कल्पनाएँ निष्प्राण
कोमल बदन को
भस्मसात करते
गर्म लू के थपेड़े और
सुलगती हवाएं
प्रचंड आँधी तूफानों से
थर-थर काँपते वृक्ष
और दरकती धराएं
बूँद-बूँद को तरसते
प्यासे पंछी और
गुमसुम कुम्हलाए फूल
खामोश भँवरे और
स्वेद में भीगे ललनाओं के
मुलायम दुकूल
इन गर्म हवाओं की छुअन
मुझे सदा ही
व्याकुल कर जाती है
ग्रीष्म ऋतु मुझे
सबसे कम भाती है !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
वटवृक्ष सा
हमारा परिवार
शीतल छाँव
मासूम बच्चे
करते कलरव
गूँजता घर
बाबा की सीख
दादी की कहानियाँ
हमारी नींव
चाचा का लाड़
चाचियों का दुलार
बुआ का प्यार
माँ अन्नपूर्णा
पिता शिव शंकर
दीदी लक्ष्मी सी
सारे अपने
सुर नर किन्नर
स्वर्ग सा घर
बचपन का
अनमोल खजाना
अमीर हम
मिली सुशिक्षा
संस्कार, सुविचार
परिवार में
है परिवार
प्रथम पाठशाला
सब बच्चों की
अनुशासन,
सभ्यता, शिष्टाचार
सीखते यहीं
जीवन मूल्य
सीखे हमने इसी
परिवार में
बने समाज
सशक्त औ’ सुदृढ़
परिवारों से
जो कुछ पाया
उपकार मानते
परिवार का
मान मर्दन
कभी होने न देंगे
इस प्यार का !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
सद्कर्मों का सद्परिणाम
धीरज से तुम लेना काम
रखना तुम खुद पर विश्वास
पूरी होगी हर इक आस !
मिहनत से होता है नाम
करना होगा तुमको काम
घबरा कर मत जाना बैठ
रखनी होगी गहरी पैठ !
रहना तुम हर पल तैयार
हर बाधा कर लोगे पार
श्रम से ही मिलता सम्मान
मिले तुम्हें प्रभु का वरदान !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
नमस्कार साथियो,
'चौपई' एक नई विधा है ! यह 'चौपाई' से भिन्न है !
इस पर मेरा एक प्रयास !
मुद्दत से दिल में थी प्यास
जाने कब पूरी हो आस
मिल कर जब बैठेंगे पास
बाटेंगे खुशियाँ तब ख़ास !
हो जाएंगे दुःख सब दूर
चिंता हो जाएगी चूर
मन्नत सबकी होगी पूर
चेहरों पर उतरेगा नूर !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
क्या इस बार भी
खूबसूरत आभासी गुलदस्ते,
तरह-तरह के आभासी केक
और वंचना भरे शुभकामना सन्देश
भेज कर मना लोगे तुम
‘मदर्स डे’,
और खुश हो जाओगे
अपनी दयानतदारी पर,
या अपनी व्यस्ततम दिनचर्या से
निकाल पाओगे
कुछ दिन, कुछ घंटे, कुछ पल
और कर दोगे उन्हें समर्पित
अपनी वास्तविक माँ के लिए
जो वर्षों से दूर देश के किसी
निर्जन एकांत में
तुम्हारी राह देखते-देखते हर क्षण
हताश होती जा रही है,
वृद्ध होती जा रही है,
दुर्बल होती जा रही है ?
तुम्हारी माँ की आँखें
अब पथरा गई हैं,
घुटनों के दर्द ने
चलना दुश्वार कर दिया है,
तुम्हारे लिए स्वादिष्ट पकवान
बनाने वाले अभ्यस्त हाथ
अब पानी से भरा
गिलास उठाने में भी
काँपने लगे हैं !
बिस्तर पर लेटे-लेटे वह
जोहती रहती है तुम्हारी बाट !
इससे पहले कि उसकी आँखें
इतनी धुँधला जाएं कि वह
तुम्हें पहचान ही न पाए
एक बार तो मना लो ‘मदर्स डे’
उसके साथ, उसके पास,
उसके सानिध्य में !
इससे बड़ा उपहार उसके लिए
शायद और कुछ न होगा !
एक बात याद रखना
दुनिया के सारे खूबसूरत मंज़र
सदियों बाद भी ऐसे ही
सुंदर बने रहेंगे लेकिन
माता-पिता की नश्वर देह
पल-पल छीजती जाती है,
शिथिल होती जाती है,
चुकती जाती है !
देर न हो जाए कहीं
देर न हो जाए !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
ग़रीब तो हैं
खुद्दार भी हैं हम
टूटते हैं तो
जानते है जुड़ना
गिर के खड़े होना !
मजदूर हैं
मजबूर नहीं हैं
रच डालेंगे
स्वेद की सियाही से
निज सौभाग्यनामा !
उठायें बोझ
सारे जग का हम
और हमारा ?
बोलो, कौन उठाये ?
सीने से चिपटाये ?
क्या दोगे तुम
किताब या कुदाल ?
खुशी या आँसू ?
खिलौने या फावड़ा?
जीवन या मरण ?
जाती बाहर
रोटी की जुगत में
माँ काम पर
मैं हूँ घर की रानी
करती चौका पानी !
हर चुनौती
आसान या मुश्किल
साध्य है मुझे !
नहीं स्वीकार अब
वर्चस्व पुरुषों का !
ओ मेरे मौला
माथे पे गहराती
चिंता की रेख
सोने की कलम से
लिख नया सुलेख !
तू है महान
धरा से नभ तक
हर दिशा में
गुंजित तेरा गान
ओ माँ तुझे सलाम !
बोझ उठाते
नये घर बनाते
न जाने कैसे
हम बेघर हुए
खुद पे बोझ हुए !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद