प्यारी बिटिया
कितनी मोहक
कितनी आकर्षक है
तुम्हारे अधरों पर
ठिठकी यह मुस्कान !
कितना लुभा रहे हैं
तुम्हारे खुले बिखरे ये बाल !
लगता है दो तीन दिन से
कंघी ने स्पर्श नहीं किया है इन्हें,
लेकिन फिर भी कितना
खिल रहा है तुम्हारा चेहरा
इस बिखरी केशराशि से घिरा !
आँखों में कितना निश्छल सा आग्रह है
कितना निष्पाप सा आमंत्रण है
अपना अधखाया हुआ
जूठा सैंडविच साझा करने का !
कैसे न बलिहारी जाऊँ
तुम्हारी मासूमियत पर
मेरी प्यारी सी गुड़िया रानी !
माँ हूँ न तुम्हारी !
सौ सौ जान कुर्बान जाती हूँ
तुम्हारी इस दरियादिली पर
तुम्हारी लाड़ भरी मनुहार पर !
किसीकी नज़र ना लगे
मेरी राजकुमारी को
बस यही दुआ है
नसीबों वाली इस माँ की !
साधना वैद
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