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Thursday, November 18, 2010

चंद शिकवे

चंद शिकवे हैं हमें आपकी इनायत से ,
कभी तो हाले दिल फुर्सत से सुनाया होता !

उजाड़े आशियाने अनगिनत परिंदों के ,
कोई एक पेड़ मौहब्बत से लगाया होता !

चुभोये दर्द के नश्तर तुम्हारी नफरत ने ,
कभी दिल प्यार की दौलत से सजाया होता !

खिलाए भोज बड़े मंदिरों के पण्डों को ,
कभी भूखों को किसी रोज खिलाया होता !

जलाए सैकड़ों दीपक किया रौशन घर को ,
दिया एक दीन की कुटिया में जलाया होता !

उठाये बोझ फिरा करते हो अपने दिल का ,
कभी तो बोझ किसी सर का उठाया होता !

किये थे वादे जो तुमने महज़ सुनाने को ,
कोई वादा तो कभी मन से निभाया होता !

सुना है बाँटते फिरते हो मौहब्बत अपनी ,
किसी मजलूम को सीने से लगाया होता !

साधना वैद