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Thursday, October 28, 2010

चुनौती

खामोशियों के किनारों से
मौन की निशब्द बहती धारा में
मुझे बहुत गहरे उतरना है
और अंगार सी धधकती सीपियों से
शीतल, सुमधुर, सुशांत शब्दों के
माणिक मुक्ता चुन कर लाने हैं !

दर्द भरे स्वरों के आरोह अवरोह पर
सवार हो वेदना के गहरे सागर में
डूब कर भी मुझे अपने कंठ के
अवसन्न मृतप्राय स्वरों में
उमंग और उल्लास के
जीवन से भरपूर उन
स्वरों को जिलाये रखना है
जो सुखों की सृष्टि कर सकें !

कड़वाहट के बदरंग घोल में
डूबे अपनी चाहतों के
जर्जर आँचल को मुझे
बाहर निकालना है
और उसे झटकार कर
दायित्वों की अलगनी पर
इस तरह सुखाना है
कि किसी पर भी उस
बदरंग घोल के छींटे ना आयें
और मेरे उस जर्जर आँचल से
हर्ष और उल्लास के
खुशनुमां सुगन्धित फूल
चहुँ ओर बिखर जाएँ !

साधना वैद