Followers

Thursday, October 7, 2010

* क्या है मेरा नाम *

उस दिन अपनी एक डॉक्टर मित्र संजना के यहाँ किसी काम से गयी थी ! संजना अपने क्लीनिक में मरीजों को देख रही थी ! मुझे हाथ के संकेत से अपने पास ही बैठा लिया ! सामने की दोनों कुर्सियों पर एक अति क्षीणकाय और जर्जर लगभग ८० वर्ष के आस पास की वृद्ध महिला और एक नौजवान लड़की, लगभग १६ -१७ साल की, बैठी हुईं थीं ! वृद्धा की आँखों पर मोटे लेंस का चश्मा चढ़ा हुआ था ! कदाचित वह अपनी पोती के साथ अपनी किसी तकलीफ के निदान के लिये संजना के पास आई थीं ! संजना ने उनकी सारी बातें ध्यान से सुनीं और प्रिस्क्रिप्शन लिखने के लिये पेन उठाया ! आगे का वार्तालाप जो हुआ उसे आप भी सुनिए –

संजना - अम्मा जी अपना नाम बताइये !

पोती - आंटी ज़रा जोर से बोलिए दादी ऊँचा सुनती हैं !

संजना - अम्मा जी आपका नाम क्या है ?

पोती - दादी आंटी आपका नाम पूछ रही हैं !

दादी - नाम ? मेरो नाम का है ? मोए तो खुद ना पतो !

संजना – तुम ही बता दो उन्हें याद नहीं आ रहा है तो !

पोती – आंटी दादी का नाम तो मुझे भी नहीं पता ! हम तो बस दादी ही बुलाते हैं !

संजना – अम्माजी आपको घर में किस नाम से बुलाते हैं सब ?

इतनी देर में वार्तालाप के लिये सही वोल्यूम सेट हो गया था !

दादी – घर में तो सब पगलिया पगलिया कहत रहे ! छोट भाई बहन जीजी जीजी कहके बुलात रहे ! सादी के बाद ससुराल में अम्माजी बाऊजी दुल्हन कह के बुलात रहे ! मोकूँ कबहूँ मेरो नाम से काऊ ने ना बुलायो ! तो मोए तो पतो ही नईं है ! ना जाने का नाम रखो हतो बाउजी ने !

संजना – घर में और रिश्तेदार भी तो होंगे जो आपसे बड़े होंगे वो कैसे बुलाते थे ?

दादी – हाँ बुलात तो रहे पर कोई को मेरो नाम लेबे की कबहूँ जरूरत ही ना परी ! सब ऐसे ही बुलात रहे बिसेसर की दुल्हन, के रोहन की माई और के रजनी की माई ! बच्चा बच्ची सब अम्मा, माई कहके बुलात रहे !

विश्वेश्वर उनके पति का और रोहन और रजनी उनके बच्चों का नाम था !

संजना – अरे कोई तो होगा आस पड़ोस में जो आपको किसी नाम से बुलाता होगा !

दादी सोच में डूबी कुछ असहज हो रही थीं !

दादी – हाँ बुलात काहे नहीं रहे ! रामेसर और दुलारी दोऊ देबर ननद भाभी कहत रहे ! उनके बाल गोपाल बबलू, बंटी, गुडिया, मुनिया सब ताईजी कहत रहे ! भाई बहिन के बच्चा कोऊ बुआ तो कोई मौसी कहत रहे ! नन्द के बच्चा मामी कहके बुलात रहे ! आस पड़ोस के लोग कोई काकी तो कोई चाची कहके बुलात रहे ! मेरे को अपनो नाम सुनबे को कोई काम ही ना परो कबहूँ ! मोए सच्चेई याद ना परि है कि मेरो का नाम है !पोती को भी दिलचस्पी हो रही थी वार्तालाप में बोल पडी !

पोती – अच्छा दादी दादाजी आपको किस नाम से बुलाते थे ?

दादी सकुचा गईं !

दादी – जे कैसो सवाल है लली ? हमार जमाने में मरद अपनी जोरू को नाम ना ले सकत थे ! ना उन्होंने कभी मोए पुकारो ! बस पास आयके काम बता देत थे सो हम कर दिया करती थीं ! कभी बहुत जरूरत परी तो ‘नेक सुनियो’ से काम चल जात थो !

दादी घोर असमंजस में थीं ! मैं भी सोच रही थी वाकई स्त्री की क्या पहचान है ! उसका अपना सारा परिचय इतने टुकड़ों में बँट जाता है कि वह स्वयं अपनी पहचान खो देती है ! वृद्धा दादी की याददाश्त क्षीण हो गयी थी ! वे शायद इसीका इलाज कराने आयी थीं ! विडम्बना देखिये उन्हें बाकी सबके नाम याद थे लेकिन अपना नाम ही याद नहीं था ! शायद इसलिये कि अपनी याददाश्त में उन्हें उनके अपने नाम से कभी किसीने पुकारा ही नहीं ! शायद इसलिए कि उन्होंने कभी अपने लिये जीवन जिया ही नहीं ! अनेक रिश्तों में बंधी वे अपने दायित्व निभाती रहीं और अपनी पहचान खोती रहीं और उससे भी बड़ी बात बच्चों तक को उनका नाम याद नहीं है जैसे स्त्री का अपना कोई स्थान, कोई वजूद या कोई पहचान नहीं है वह महज एक रिश्ता है और उसका दायित्व उस रिश्ते के अनुकूल आचरण करना है ! इन सारे रिश्तों की भीड़ में वह कभी ढूँढ नहीं पाती कि उसका स्वयं अपने आप से भी कोई रिश्ता है जिसके लिये उसे सबसे अधिक जागरूक और प्रतिबद्ध होने की ज़रूरत है !

यह संस्मरण सत्य घटना पर आधारित है ! हैरानी होती है यह देख कर कि आज के युग में भी ऐसे चरित्रों से भेंट हो जाती है जो सदियों पुरानी स्थितयों में जी रहे हैं ! ग्रामीण भारत में जहाँ आज भी शिक्षा का प्रसार यथार्थ में कम और सरकारी फाइलों में अधिक है ऐसे उदाहरण और भी मिल सकते हैं ! सोचिये, जागिये और कुछ ऐसा करिये कि कम से कम आपके आस पास रहने वाली हर स्त्री सबसे पहले खुद से रिश्ता जोड़ना सीख सके !

साधना वैद

13 comments :

  1. महिला की पहचान केवल नाम से नहीं की जा सकती |
    बहुत अच्छी रचना के लिए बधाई
    आशा

    ReplyDelete
  2. बहुत खूब | यह लेख अंतरात्मा को स्पर्श कर रही है | आभार

    ReplyDelete
  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    मध्यकालीन भारत-धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-२), राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

    ReplyDelete
  4. क्या कहूँ आज भी इस तरह के प्रसंग सामने आ सकते है जान कर अचरझ में हूँ .....बहुत अच्छी प्रस्तुति |

    ReplyDelete
  5. नाम एक पहचान है ...सच है की औरत की ज़िंदगी न जाने कितने टुकड़ों में बंट जाती है ...सोचने पर विवश करता संस्मरण ....

    ReplyDelete
  6. आज भी क्या बदल गया है....भले ही माता-पिता,बड़े भाई-बहन...नाम लेकर बुला लें...पर पहचान तो वही है..किसी की ,बेटी,पत्नी या माँ.
    बहुत कुछ सोचने को विवश करता है , यह संस्मरण....मैने भी अपनी दादी से शायद कॉलेज में आने के बाद उनसे उनका नाम पूछा था...बस उत्सुकतावश.

    गाँवों में एक अच्छा रिवाज़ है, लोक गीतों में...नाम लेकर गीत गाये जाते हैं...जैसे..."फलां देवी दें आशीष"...कम से कम..नाम तो बना रहता है.

    ReplyDelete
  7. naam me n kyaa rakhaa hai daadee kaa ek naheen anekon naam hai aur vah unheen naamon ke saath khush hai sasuraal men yadi koee naam nahee to maanaa jaa saktaa hai par janm dene vaale maataa pitaa bhee use pagalee kah kar bulaate rahe yah ghor aashchary hai kam se kam maa pitaa ko ko to naam se hee bulaanaa chaahaye achchhaa sabaal uthaayaa hai aapane

    ReplyDelete
  8. आपने इस बात को इतनी खूबसूरती से लिखा है कि यह बात सोचने पर मजबूर करती है कि वाकई क्या कोई अपने नाम के बिना पूरा जीवन गुजार सकता है...लेकिन ये होता है...बहुत सुंदर प्रस्तुति

    http://shikanjee.blogspot.com/

    ReplyDelete
  9. इसमें स्‍त्री जीवन की टूटन, घुटन, निराशा, उदासी और मौन के बीच मानवता की पैरवी करती स्‍त्री के आवेग की कहानी है । संवेदना के कई तस्‍तरों का संस्‍पर्श करती यह राचना जीवन के साथ चलते चलते स्‍त्री मन की छटपटाहट को पूरे आवेश के साथ व्‍यक्त करती है ।

    ReplyDelete
  10. आप की रचना 08 अक्टूबर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
    http://charchamanch.blogspot.com/2010/10/300.html



    आभार

    अनामिका

    ReplyDelete
  11. बहुत सच्ची पोस्ट लिखी है आपने...हैरानी होती है जब इस तरह के दृष्टान्त देखने सुनने को मिलते हैं...ग्रामीण हलकों और पिछड़े इलाकों में आज भी हालात बहुत अधिक नहीं बदले हैं...
    नीरज

    ReplyDelete
  12. मन को छू गई आपकी यह पोस्ट...



    ________________
    'शब्द-सृजन की ओर' पर आज निराला जी की पुण्यतिथि पर स्मरण.

    ReplyDelete
  13. बहुत सुन्दर और शानदार पोस्ट! बधाई!

    ReplyDelete