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Monday, October 4, 2010

* अंतर्व्यथा *

मेरी सपनीली आँखों के बेहद

सुन्दर उपवन में अचानक

सूने मरुथल पसर गए हैं

जिनमें ढेर सारे ज़हरीले

कटीले कैक्टस उग आये हैं ,

ह्रदय की गहरी घाटी में

उमंगती छलकती अमृतधारा

वेदना के ताप से जल कर

बिल्कुल शुष्क हो गयी है,

और अब वहाँ गहरे गहरे

गड्ढे निर्मित हो गए हैं,

भावना के अनंत आकाश में

उड़ने के लिये आतुर मेरे

अधीर मन पंछी के पंख

टूट कर लहू लुहान हो गए हैं

और वह भूमि पर आ गिरा है,

बहुत प्यार से परोसी गयी

"तुम्हारी" अत्यंत स्वादिष्ट

व्यंजनों की थाली की हर कटोरी में

रेत ही रेत मिल गयी है,

जो मेरे मुख को किसकिसा

कर घायल कर गयी है !

अपने बदन को जिस बेहद

मुलायम, मखमली, रेशमी

आँचल से लपेट मैं आँखें मूँद

उसकी स्निग्ध उष्मा और नरमाई

को महसूस कर रही थी

किसीने अचानक झटके से

उसे मेरे बदन से खींच डाला है

और अनायास ही वह

मखमली आँचल रेगमाल सा

खुरदुरा हो मेंरे सारे जिस्म को

खँरोंच कर रक्तरंजित कर गया है !

जीवन खुशनुमाँ हो न हो

पर इतना भी बेगाना

इससे पहले तो कभी न था

जैसा आज है !

साधना वैद