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Friday, December 24, 2010

गुत्थी

कभी-कभी
नितांत अजनबी,
अपरिचित चेहरों पर
जैसा अपनत्व,
जैसी गहन आत्मीयता,
और जैसी
एक कोमल सी अंतरंगता का
मधुर सा प्रतिबिम्ब झलक जाता है
वह उन चेहरों की रुखाई
और अजनबियत से कितना
अलग होता है ना
जिन्हें ईश्वर ने
आपका सगा संबंधी बना कर
इस धरती पर भेजा है,
और जिनके लिये आपने
ना जाने
कितनी कसमसाती रातों के
अंधेरों की दहशत
और कितने सुलगते दिनों की
तपती धूप को
उनकी हर विपदा में
उनके साथ झेला है ?

कभी-कभी
किसी नितांत अजनबी,
अपरिचित की वाणी में
कितनी मिठास,
कितना अपनापन और
कितनी सच्चाई महसूस होती है ना
जो आप अपने उन तथाकथित
‘अपनों’ की वाणी में ढूँढने का
बारम्बार भागीरथ प्रयास
करते रहते हैं
लेकिन हर बार
निराशा ही
आपके हाथ लगती है ?

कभी-कभी
कुछ लम्हों की
क्षणिक मुलाक़ात में ही
ना जाने कैसे
किसी अनजान अपरिचित के सामने
आपको अपना हृदय उड़ेल कर
रख देने की प्रेरणा मिल जाती है ना
जिसकी थाह
सदैव आपके साथ रहने वाले
आपके निकटतम संबंधी भी
कभी नहीं ले पाते ?

बहुत सोचती हूँ
ऐसा क्यों हो जाता है ,
ऐसा कैसे हो जाता है ,
लेकिन यह गुत्थी
मैं कभी
सुलझा नहीं पाती !

साधना वैद