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Wednesday, December 8, 2010

एक सवाल

वाराणसी के धमाके ने एक बार फिर सबको दहला दिया है ! यह सब
हमारे यहाँ शायद इतनी आसानी से इसलिए घटित हो जाता है क्योंकि
अत्यंत धीमी न्याय प्रक्रिया की वजह से आतंकवादी बखौफ रहते हैं और
उन्हें स्थानीय लोगों की निर्बाध सहायता मिल जाती है जो क्षुद्र स्वार्थों की
पूर्ति के लिये अपने देश के साथ गद्दारी करने से ज़रा भी नहीं हिचकिचाते !

एक सवाल

कल फिर बनारस में एक
धमाका हुआ ,
एक माँ की गोद सूनी
एक पिता के मन के आँगन में
सन्नाटा हुआ !
एक नन्हीं सी जान ने
नफ़रत और आतंक के
घातक वार को
अपनी छाती पर झेला है !
उसकी बलि लेकर
शायद उन नर पिशाचों के
कलेजे में ठंडक पड़ गयी हो
जिन्होंने दरिंदगी भरा
यह घिनौना खेल खेला है !
जिन हाथों ने
इस बम को लगाया होगा
क्या उन्होंने भी कभी
अपनी मासूम बच्ची को
अपने सीने से लगा कर
उसके बालों को प्यार से
सहलाया होगा ?
जिन उँगलियों ने
इस बेजान रिमोट के
विध्वंसक ट्रिगर को
दबाया होगा
क्या उन्होंने भी कभी
दर्द से बिलखते
अपने बच्चे के
आँसुओं को पोंछ कर
रूमाल से
सुखाया होगा ?
कैसे कोई इतना
बेरहम हो सकता है ?
कैसे कोई सर्वशक्तिमान
उनके इस गुनाह को
उनके इस अक्षम्य पाप को
माफ कर सकता है ?
यहाँ तो उन्हें सज़ा मिलने में
शायद सालों लग जाएँ
लेकिन हे ईश्वर !
अगर तू कहीं है
तो कब उस अबोध नन्हीं बच्ची को
न्याय मिल पायेगा
जो इस जघन्य काण्ड की
अकारण शिकार हुई है !


साधना वैद