बुरा न मानें
न चिढ़ें, न चिढ़ाएँ
रंग लगाएं
प्रेम और प्यार के
दें शुभकामनाएं ।
प्यार का पर्व
है रंगों की बहार
मीठी गुंजार
है पानी की फुहार
है होली का त्योहार
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
बुरा न मानें
न चिढ़ें, न चिढ़ाएँ
रंग लगाएं
प्रेम और प्यार के
दें शुभकामनाएं ।
प्यार का पर्व
है रंगों की बहार
मीठी गुंजार
है पानी की फुहार
है होली का त्योहार
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
आप घर से बाहर
कहीं भी जाइए, वो चाहे किसी भी स्तर का होटल हो, अस्पताल हो, स्कूल कॉलेज हो या कार्यालय हो आपकी सुविधा के लिए आपको हर
स्थान पर सहायकों का एक दल मिलेगा जिसे उस संस्था के आयोजक सेवा दल का नाम देते
हैं ! सरकारी नौकरी करने वाले लोग भी सेवक कहलाते हैं ! इसका तो नाम ही लोक सेवा
आयोग है ! राजनीति में आने वाले लोग भी स्वयं को जनता का सेवक कहते हैं लेकिन उनका
तो उद्देश्य ही जनता को ठगना है और सारे छल छद्म करके उनसे वोट हासिल करना है ! मेरी
दृष्टि में हर वह कार्य जिसके लिए आपको वेतन मिलता है वह आपकी जीविका का साधन है
सेवा नहीं ! इन सभी स्थानों पर परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से आप स्वयं ही इन सेवाओं
का भुगतान करते हैं ! कभी किराए के रूप में, कभी टिप के
रूप में, कभी फीस के रूप में या कभी रिश्वत के रूप में
जिसे आज की प्रचलित भाषा में सुविधा शुल्क कहा जाता है ! सेवा कभी खरीदी या बेची
नहीं जा सकती ! सेवा एक अमूर्त भावना है जिसके प्रतिदान में कोई भी अपेक्षा या
प्रत्याशा नहीं होती ! यह सिर्फ अनन्य प्रेम, करुणा, दया या श्रद्धा से जुड़ी भावना है जिसके पीछे न कोई स्वार्थ
होता है न ही लालच ! सेवा के पीछे परोपकार की भावना जुड़ी होती है जहाँ आप निर्मल
मन से केवल सामने वाले के कष्ट को कम करने के प्रयास में तन मन धन से जुट जाते हैं
और हर हाल में उसे सुख पहुँचाना चाहते हैं यह जानते हुए भी कि आपको इसके प्रतिदान में
कुछ मिलने वाला नहीं है ! सेवा एक विशुद्ध सात्विक कर्म है जो सेवा पाने वाले और
सेवा करने वाले दोनों को ही अनिर्वचनीय आनंद से भर देता है और दोनों को ही इससे
परम सुख की प्राप्ति होती है !
इस निष्काम सेवा के भी तीन रूप होते हैं ! एक सेवा वह है जिसके तहत हम किसी साधू
महात्मा या किसी बुज़ुर्ग को सम्मान देने के लिए उनके सारे काम करते हैं, उनके पैर
दबाते हैं, उनके भोजन पानी की व्यवस्था करते हैं और उनके बाकी सारे कार्य भी करते
हैं ताकि उनकी सहायता हो जाए और हमें उनका आशीर्वाद मिल जाए !
दूसरी सेवा के तहत आता है मंदिरों या गुरुद्वारों में जाकर सेवा कार्य करना जैसे
इन देवस्थानों की साफ़ सफाई, जूते चप्पलों का रख रखाव
या वहाँ की रसोई में भोजन बनाने या परसने खिलाने में मदद करना ! बर्तनों की साफ़
सफाई इत्यादि !
और तीसरी सेवा वह होती है जो बिलकुल दीन हीन, असहाय, लाचार अस्वस्थ
रोगियों के लिए की जाती है जिन्हें मदद न मिले तो उनका जीवन संकट में आ जाए !
मेरे विचार से हर मनुष्य जिसमें मानवता शेष है अपनी क्षमता और सामर्थ्य के अनुसार
कुछ न कुछ सेवा तो अवश्य ही करता है !
साधना वैद
झीना था प्रतिरूप तुम्हारा, छीना था हर चैन हमारा
अच्छा था मोहक था खेल, सच्चा था रोचक था मेल
करते रहे तुम्हें हम दूर, कहते रहे तुम्हें हम हूर
छलना था कितना आसान, कहना था बस दो फरमान
तुमको हमने चाहा यह सुख अपना था
तुमको पा हम लेंगे यह एक सपना था !
सपने लेकिन
होते हैं केवल सपने
हमको पल-पल
तिल-तिल करके तपना था !
जागी जगती, जागे पक्षी, जलचर जागे
जागी धरती, तारे, चंदा, अम्बर जागे
जागो तुम अब जाग गया सूरज देखो
जागी प्रकृति सकल सृष्टि अंतर जागे !
साधना वैद
उगता सूर्य
क्षितिज की लालिमा
भोर का गान
फूलों के हार
अगर की खुशबू
देवों का मान
उड़ते पंछी
उमड़ती नदियाँ
ढूँढें सुमीत
खिलते फूल
सुरभित पवन
गाते सुगीत
शिशु की हँसी
ममता छलकाती
माँ की मुस्कान
लिखे कविता
प्रकृति कलम से
निराली शान
भाती सभी को
अद्भुत ये कविता
हे गिरिधारी
छेड़ दो तान
बजाओ न मुरली
कृष्ण मुरारी
साधना वैद
वक्त के उजले सफों पर गर्द सी कुछ जम रही
लाख चाहा भूलना पुरज़ोर, कोशिश कम रही !
हमकदम, न हमनफस, न हमसफर है साथ में
राहे मंज़िल पर अभी से चाल क्यूँ है थम रही !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद
वसंत-पंचमी का
त्योहार आने वाला है ! शोभा अनमनी सी बैठी हुई है ! अब तो हर त्योहार जैसे लकीर
पीटने की तरह हो गया है ! न कोई उत्साह, न कोई चहल-पहल, न कोई साज-सज्जा, न कोई रौनक ! सब अपने-अपने फोन और लैप
टॉप में व्यस्त रहते हैं ! दस आवाजें लगाओ तो बड़ी मुश्किल से मोबाइल में नज़रें गढ़ाए खाने की मेज़ पर आकर बैठ
जाते हैं और बिन देखे प्लेट में जो परोस दिया जाता है खाकर उठ जाते हैं ! शोभा की
आँखें भर आईं !
वह जब छोटी थी तो हर त्योहार कितने उल्लास के साथ मनाया जाता था ! दो तीन दिन पहले
से ही घर में हलचल शुरू हो जाती थी ! घर में हर सदस्य के कपड़े पीले रंग में रँगे
जाते थे ! मम्मी, चाची, भाभी की साड़ियाँ, हम बहनों के फ्रॉक या दुपट्टे ! बाबूजी, चाचाजी, भैया के कुरते और रूमाल ! वसंत के दिन मम्मी केसर डाल
कर चावल की फीरनी बनाती थीं ! दिन में भी खूब मेवा डाल कर पोंगल वाले पीले मीठे
चावल और मटर पनीर का पुलाव बनता था ! पीले पतंगी कागज़ से घर का पूजाघर सजाया जाता
था और हम सब बच्चे अपनी सारी कॉपी किताबें माँ सरस्वती के सामने सुबह से ही रख
देते थे ताकि उन पर विद्या की देवी की कृपा हो जाए और उनसे पढ़ कर हम सब बच्चों को
भी माँ शारदे का आशीर्वाद मिल जाए ! सबसे अधिक खुशी इस बात की होती थी कि उस दिन पढ़ाई
से फुर्सत मिल जाती थी लेकिन फिर भी सरस्वती माँ के आशीर्वाद की गारंटी पक्की होती
थी !
शोभा के पति अरुण से शोभा का मुरझाया चेहरा देखा नहीं गया ! उन्होंने शोभा से
फीरनी बनाने के लिए कहा और अपना स्कूटर उठा कर बाज़ार चले गए ! लौट कर आए तो उनके
पास मिट्टी के बहुत ही कलात्मक सुन्दर शकोरों से भरा हुआ थैला था ! उन्होंने जल्दी
से उन्हें बाल्टी में डाल कर पानी से धोया और शोभा से फीरनी उन शकोरों में परसने
के लिए कहा ! शोभा शकोरों में फीरनी डालती जा रही थी और अरुण उन पर कटे हुए पिश्ते
बुरकते जा रहे थे ! शोभा का मन तरंगित हो उठा ! उसने जल्दी-जल्दी मीठे चावल बनाए
और पूजा की सारी तैयारी कर बच्चों को आवाज़ लगाई !
डाइनिंग टेबिल पर मिट्टी के शकोरों में परोसी हुई फीरनी बहुत आकर्षक लग रही थी ! बच्चों
की आँखें चमक उठीं, “वाओ मम्मी ! ये क्या है ! यह तो बहुत बढ़िया लग रही है ! आपने
पहले तो ऐसे कभी नहीं बनाई !”
शोभा झूम उठी ! आज उसके मन में भी वर्षों के अंतराल
के बाद वसंत महक उठा था !
साधना वैद
कभी सोचती हूँ
कहाँ गलती की थी
जो तुम्हारा साथ चाहा
मैं काँच तुम पत्थर
मैं कमज़ोर तुम कठोर
मैं नाज़ुक तुम मजबूत !
यह सत्य तो तुम भी
जानते ही थे और था
मेरा भी जाँचा, परखा,
सोचा, समझा, सराहा !
तभी तो यह कसम उठाई थी
कभी नहीं टकराएंगे आपस में,
सदा एक दूरी बना कर रखेंगे
कभी पास नहीं आएंगे और
दुनिया को यह चमत्कार भी
करके ज़रूर दिखाएंगे कि
शीशे और पत्थर का प्यार
बिना टूट-फूट के भी
कामयाब हो सकता है
जो मन में हो हौसला और
कुछ कर गुज़रने की लगन तो
पत्थर पर भी गुलाब
खिल सकता है !
लेकिन जाने फिर क्या हुआ ?
सारे संकल्प धरे रह गए
और पता नहीं कैसे हम
रोज़ आपस में टकराने लगे
छोटे से आघात से मैं रोज़
रेशा-रेशा चटकने लगी और
तुम चोट पर चोट लगाने लगे
मैं रोज़ टुकड़े-टुकड़े टूटने लगी
और तुम बेरहम हो मुझे
टूटता देख हँसने खिलखिलाने लगे !
मैं हर रोज़ घायल हो
किरच-किरच बिखरने लगी
और तुम मुझे लहुलुहान देख
पता नहीं क्यों जश्न मनाने लगे !
जानती हूँ यह दुष्परिणाम है
मेरी मूर्खता भरी जिद का
मेरे थोथे आत्मविश्वास का
मेरी खोखली खुशफहमी का
कि मुझमें हुनर है
धाराओं का रुख मोड़ देने का
प्रवाह के विरुद्ध तैरने का
असंभव को संभव कर देने का !
मानती हूँ मैं हार गयी !
लेकिन हार कर भी इतना तो
ज़रूर जान गयी कि
पत्थर कभी फूल से
मुलायम नहीं होते
इस धरती पर कभी
चमत्कार नहीं होते !
साधना वैद
निर्वाण द्वार,
जीवन की पतंग
प्रवेशातुर
स्वागतोत्सुक
थामने को पतंग
प्रभु राम जी
साधना वैद
चित्र - गूगल से साभार
सरला के घर में आज किटी पार्टी थी! सुबह से सरला घर की साफ़ सफाई, व्यवस्था और साज-सज्जा में व्यस्त थी! किटी की 20 महिला मित्रों के बैठने की व्यवस्था, जल पान का प्रबंध और बीच में खेले जाने खेलों के विजेताओं को इनाम में दिए जाने वाले उपहारों को गिफ्ट पैक करना, सभी कुछ उसे देखना था! रविवार होने की वजह से आज सभी घर में थे लेकिन सरला की सहायता के लिए कोई भी तत्पर नहीं था! पति राजीव अपने लैप टॉप के साथ व्यस्त थे, बेटी सुकन्या अपनी सहेली के यहाँ उसका जन्मदिन मनाने चली गई थी और बेटा सुदीप वीडियो गेम खेलने में लगा हुआ था! सरला ने जब बेटे से सहायता करने को कहा तो उसने कह दिया, “आपकी किटी पार्टी है मैं कैसे करूँगा यह सब? आप देख लो न मम्मा! मुझे थोड़े ही आता है कुछ!” सुदीप अपना फोन उठा कर अपने कमरे में चला गया!
पतिदेव बिलकुल
निर्लिप्त अपने लैपटॉप में रील्स देखने में इतने तल्लीन थे जैसे घर में होने वाले
आयोजन का उन्हें कोई अनुमान ही न हो! सरला को बहुत गुस्सा आ रहा था! उसने अपने
अकेले के दम पर ही अपनी किटी पार्टी का बहुत अच्छी तरह से इंतज़ाम किया और उसकी सभी
सहेलियाँ बेहद खुश होकर गईं!
अगले सप्ताह बेटे सुदीप का जन्मदिन था! वह सुबह से बहुत खुश था! शाम को उसने
अपने दस बारह दोस्तों को बुला रखा था! लेकिन आज सुबह से किचिन में कोई हलचल दिखाई
नहीं दे रही थी! सुदीप जानता था हमेशा की तरह मम्मी बहुत अच्छी तरह से शाम की
पार्टी का सारा इंतजाम सम्हाल लेंगी! लेकिन लंच के बाद जब सरला साड़ी बदल कर अपना
शॉपिंग बैग उठा बाहर जाने लगी तो सुदीप और सुकन्या दोनों ही घबरा गए! अभी तक शाम
की पार्टी की तैयारी की शुरुआत भी नहीं हुई थी! न केक आया था, न घर में ही कोई
पार्टी स्नेक्स सरला ने बना कर या मँगवा कर रखे थे, न कमरे में ही कोई सजावट हुई
थी! सुदीप नर्वस होकर सरला के सामने जा खड़ा हुआ, “मम्मी आप
कहाँ जा रही हो? शाम को मेरे दोस्त आएँगे ना मेरा बर्थडे सेलीब्रेट करने! आप कब
तक आओगी?”
“अच्छा!” सरला हैरानी से बोली, “तुम्हारा बर्थडे है ना बेटा! मैं कैसे जानूँगी आजकल के बच्चे कैसे पार्टी सेलीब्रेट
करते हैं! तुम खुद ही देख लो न बेटा अपने दोस्तों को कैसे एन्टरटेन करना है
तुम्हें! मुझे बहुत ज़रूरी काम है ! आने में मुझे देर हो जाएगी!” और सरला रिक्शे में बैठ कर नज़रों से दूर हो चुकी थी !
चित्र - गूगल से साभार
साधना वैद