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Monday, March 31, 2025

दरकता दाम्पत्य

 



असफल वैवाहिक रिश्तों के पीछे अनेक कारण हैं । उन अनेक कारणों में सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण कारण है आज के युवाओं की निरंकुश रूप से बढ़ती हुई स्वच्छंदता की प्रवृत्ति और उनकी दिन प्रति दिन विकृत होती जाती मानसिकता ! स्त्री का आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना, पिछली पीढी के मुकाबले अधिक शिक्षित और आत्म विश्वासी होना, अपने निर्णय स्वयं लेने के लिए संकल्पित होना, एक समय था जब इन सभी गुणों का विकास स्त्री स्वातंत्र्य और नारी सशक्तिकरण के सन्दर्भ में बड़े गर्व से देखे जाते थे ! विवाह के समय लड़की के माता-पिता ही लड़की को समझा कर भेजते थे, “ससुराल में किसीसे दब कर रहने की ज़रुरत नहीं है ! कोई परेशानी हो तो हमें बताना ! तुम किसीकी नौकरानी बन कर नहीं जा रही हो ! अपनी शर्तों पर रहना वहाँ !” लेकिन कालांतर में ये ही गुण और यही समझाइश उन्हीं के दाम्पत्य जीवन की सुरक्षा के सन्दर्भ में खतरे की सबसे बड़ी घंटी बन चुकी है ! हर चीज़ जब तक नियंत्रण में होती है अच्छी लगती है ! लेकिन यह भी सत्य है कि अति सर्वत्र वर्जयेत ! आज की युवा पीढी में समानता का ऐसा घमासान छिड़ा हुआ है कि इसकी बहुत बड़ी कीमत उनके बच्चों को, उनके वृद्ध होते माता-पिता को चुकानी पड़ रही है इस बात का उन्हें कोई ख़याल ही नहीं है ! संयुक्त परिवार तो टूट ही चुके हैं ! पति-पत्नी दोनों काम करने वाले हैं इसलिए बच्चों की परवरिश आया, या अनपढ़ नौकरों के हाथों हो रही है ! अक्सर निर्दयी नौकरों के दुर्व्यवहार से त्रस्त उपेक्षित बच्चे मन में आक्रोश का ज्वालामुखी लिए पलते हैं ! ऐसे मामलों में दोषारोपण का ठीकरा पति-पत्नी एक दूसरे के सर पर ही फोड़ते हैं क्योंकि हर बात के लिए दोनों के पास समान अधिकार हैं तो ज़िम्मेदारी भी समान है ! इन्हीं और ऐसे ही अनेक कारणों से रोज़ घरों में अनबन और झगड़े होते हैं ! स्त्रियाँ रिश्ते के आरम्भ से ही बागी तेवर ठान लेती हैं । जब रिश्ते में बँधने वाले दंपत्ति के मन में एक दूसरे के लिए सम्मान की भावना ही न हो, रिश्ते को निभाने का इरादा ही न हो और थोड़ी भी सहनशक्ति न हो तो रिश्तों को टूटने में ज़रा भी देर नहीं लगती ।

आज की पीढ़ी सिर्फ आत्मकेंद्रित है । घर परिवार की प्रतिष्ठा, माता-पिता की मर्ज़ी, समाज की मर्यादा ये सारी बातें उन लोगों के लिए बेमानी हैं । ये ज़िम्मेदारियों से भागते हैं । ये अपना परिवार भी बनाना नहीं चाहते । सास-ससुर की सेवा करना तो बहुत दूर की बात है वे अपने बच्चों की देखभाल भी करना नहीं चाहते । सुनते हैं कि अब तो बच्चों की देखभाल के लिए किराए के माता-पिता भी मिलने लगे हैं जो बच्चों को समय से स्कूल भेजते हैं, उनका ध्यान रखते हैं, उन्हें कहानियाँ और लोरी सुनाते हैं ! अपने परिवार की अब ज़रुरत ही कहाँ रह गई है ! हर चीज़ खरीदी जा सकती है पास में पैसा होना चाहिए ! इसीलिये अब लोगों का फोकस अधिक से अधिक धन कमाने में केन्द्रित हो गया है और शायद इसीलिए विवाह जैसी संस्था की जड़ें ढीली होने लगी हैं ! तलाक के मामलों में पहले से कई गुना वृद्धि हुई है । पहले स्त्री सहनशील होती थी, रिश्तों को प्राणप्रण के साथ निभाने का प्रयास करती थी आज की स्त्री स्वच्छंद हो चुकी है वह अपनी शर्तों पर जीवन जीना चाहती है । विवाहेतर संबंधों के प्रति उसके मन में कोई अपराधबोध नहीं है इसीलिए वह खुल कर इन्हें स्वीकार भी करती है और अपने पति से पीछा छुड़ाने के लिये किसी भी हद तक जा सकती है । फिलहाल ऐसे कई केसेज़ सामने आए हैं जिनमें पत्नी ने अपने प्रेमी के साथ मिल कर पति की हत्या तक करवा दी । पाश्चात्य जीवन शैली ने भी स्त्रियों की सोच को प्रदूषित किया है । परिवार में संस्कारों और नैतिक मूल्यों का ह्रास, अनुशासनहीनता, निरंकुश जीवन शैली और बिना किसी दायित्व के मौज मस्ती की ज़िंदगी बिताने की चाहत, बेइंतहा आज़ादी इस विघटन का सबसे बड़ा कारण हैं । लिव इन रिलेशनशिप की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिला है क्योंकि यह सुविधाजनक है ! जब तक अच्छा लगे साथ में रह लिए जब मन भर गया तो साथी भी बदल लिया नई पोशाक की तरह ! न शादी हुई, न बहू बने, न कोई ज़िम्मेदारी निभाई लेकिन विवाह का पूरा सुख उठा लिया ! लड़के भी खुश न शादी की, न पत्नी लाए, अलग हुए तो कोई गुज़ारा भत्ता देने की झंझट भी नहीं, न ही ज़मीन जायदाद पर किसीका कोई हक़ बना ! सारा सार इसी बात में है कि मौज मज़ा भरपूर होना चाहिए और किसी के भी प्रति ज़िम्मेदारी ज़रा सी भी कोई नहीं ! जैसी विकृत मानसिकता होगी समाज का भी वैसा ही रूप उभर कर सामने आयेगा ! समाज के निर्माता भी तो वे ही हैं जो उसके रूप और आकार का अभिन्न अंग हैं !



साधना वैद



Friday, March 28, 2025

किराए की कोख

 



प्रियांशी इस बार फिर अवसादग्रस्त थी ! डॉक्टर मिश्रा ने उसे आगाह किया था कि प्राकृतिक तरीके से उसके लिए गर्भाधान करना संभव नहीं है ऐसी स्थिति में किसी अन्य स्त्री के गर्भाशय में भ्रूण का प्रत्यारोपण कर उसकी सहायता से ही उसके बच्चे का जन्म लेना संभव हो सकेगा ! इस तकनीक को आई. वी. ऍफ़. तकनीक और ऐसी माताओं को सरोगेट मदर कहते हैं !
प्रियांशी चिंतित थी ! नौ माह तक बच्चे को अपने शरीर में रख कर गर्भाधान के सारे कष्ट सहने के बाद और फिर प्रसव की सारी पीड़ा से गुज़रने के बाद क्या उस स्त्री को बच्चे के प्रति मोह नहीं हो जाएगा ? अगर उसने जन्म के बाद बच्चे को देने से इनकार कर दिया तो क्या होगा ? उसके मन में बड़ी बेचैनी थी ! उस स्त्री के स्थान पर वह खुद को रख कर देख रही थी ! वह तो बिलकुल नहीं दे पाती अपने बच्चे को ! इतने महीनों तक अपने अस्थि मज्जा से उसे सींचा है ! ऐसे कैसे दे दें किसी और को ! प्रियांशी की साँस अटकी हुई थी !
तभी दरवाज़े की घंटी बजी ! डॉ. मिश्रा का असिस्टेंट एक स्त्री को लेकर आया था जो प्रियांशी के बच्चे को अपने गर्भ में रखने के लिए तैयार थी ! खूब गोरी चिट्टी, स्वस्थ वह खुश मिजाज महिला दिखाई देती थी ! प्रियान्शी ने डरते-डरते उससे पूछ ही लिया, “इतने दिनों तक बच्चे को अपनी कोख में रखने के बाद तुम्हें उससे मोह नहीं हो जाएगा ? कैसे विश्वास करें कि तुम बच्चा हमें दे दोगी ?” 
महिला ठठा कर हँस पड़ी, “हमारा शरीर तो है ही किराए की कोख बहू जी ! किरायेदारों से कैसा मोह ! यह कोई पहला बच्चा थोड़े ही है ! पहले भी तीन बच्चे पैदा करके सौंप चुके हैं उनके माँ बाप को ! हाँ किराया अच्छा देना पड़ता है ! सो तो तुम्हें बता ही दिया होगा मिश्रा मैडम ने !” वह नज़रों में प्रियांशी की औकात को तोल रही थी और प्रियांशी हतप्रभ सी उसे देख रही थी !


साधना वैद    


Friday, March 21, 2025

क्या है कविता ?

 विश्व कविता दिवस की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं ! 



उगता सूर्य 

क्षितिज की लालिमा 

भोर का गान 

 

फूलों के हार 

अगर की खुशबू 

देवों का मान 


उड़ते पंछी

उमड़ती नदियाँ 

ढूँढें सुमीत 


खिलते फूल 

सुरभित पवन 

गाते सुगीत  


शिशु की हँसी 

ममता छलकाती

माँ की मुस्कान 


लिखे कविता 

प्रकृति कलम से 

निराली शान 


भाती सभी को 

अद्भुत ये कविता 

हे गिरिधारी 


छेड़ दो तान 

बजाओ न मुरली 

कृष्ण मुरारी 


साधना वैद 

Sunday, March 16, 2025

त्योहारों को मनाने में उदासीनता क्यों

 



यह विषय बहुत ही सामयिक एवं विचारणीय है ! इसमें संदेह नहीं है कि पारंपरिक तरीके से त्योहारों को मनाने का चलन अब शिथिल होता जा रहा है ! इसके पीछे अनेक कारण हैं ! टी वी, मोबाइल, इन्टरनेट के अविष्कारों ने इंसान को एकान्तप्रिय और अंतर्मुखी बना दिया है ! देशी भाषा में कहें तो ‘इकलखोरा बना दिया है ! पहले जो लोग सुबह होते ही दोस्तों, संगी साथियों की तलाश में घर से निकल पड़ते थे अब किसी परिचित के आने के समाचार से ही उनकी भवों पर बल पड़ने लगे हैं ! जो लोग पहले समूह में उल्लसित आनंदित होते थे अब वे एकांत में अपने मोबाइल.या टी वी. के साथ परम प्रसन्न और संतुष्ट रहने लगे हैं ! किसीके घर जाना या किसी का घर में आना अब झंझट सा लगने लगा है !
पहले संयुक्त परिवारों का चलन था ! त्योहारों में सारे पकवान घर पर ही सारी महिलाएं मिल-जुल कर खुशी-खुशी बनाया करती थीं और घर के सभी सदस्य बड़े प्रेम से उन्हें खाते थे
, सराहते थे, खूब इनाम भी दिए जाते थे युवा सदस्यों को ! इसलिए उत्साह बना रहता था ! इस सुखद परम्परा को झटका लगा संयुक्त परिवारों के टूटने से ! अब समाज में हर दूसरा घर ऐसा है जिसमें एकाकी, बीमार और अशक्त वृद्ध जन रहते हुए मिल जाते हैं ! पकवान बनाने का न उनमें बूता बचा है न हज़म करने की ताकत इसीलिये पकवान घर में बनाने की परम्परा को भी धक्का लगा है ! लोगों की आर्थिक स्थिति पहले से सुदृढ़ हुई है ! जो बच्चे साथ नहीं रहते वे बाज़ार से पकवानों को ऑर्डर कर माता-पिता के पास भिजवा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं ! पहले ये सारे पकवान हलवाई के यहाँ मिलते भी नहीं थे सब घर में ही बनाए जाते थे अब तो किसी भी पकवान का नाम लीजिए बाज़ार में हर चीज़ उपलब्ध है ! लोगों की जेब में पैसा उपलब्ध है तो चिंता किस बात की है !
पहले हर गली मोहल्ले में समूह के समूह एक साथ होली खेलते थे ! आस पड़ोस के हर घर में सबसे मिलने जाते थे और सबके घरों के पकवानों का स्वाद लेते थे लेकिन अब चन्दा जमा करके सामूहिक होली का आयोजन किसी पार्क या खुली जगह पर होने लगा है जहाँ कुछ खाने पीने की व्यवस्था भी होती है ! सब वहीं पर एक दूसरे से मिल लेते हैं इसलिए अब घरों में जाने की परम्परा भी ख़त्म हो गई ! इसलिए अधिक मात्रा में पकवानों को बनाने की ज़रुरत भी ख़त्म हो गई ! थोड़ा सा शगुन का बना लिया जाता है और वही बनाया जाता है जो आसानी से बन जाए और पच जाए !
आज की अति महत्वाकांक्षी पीढ़ी पर कैरियर बनाने का इतना अधिक प्रेशर है कि उनका सारा समय कॉलेज
, कोचिंग, ट्यूशन और पढ़ाई में ही खर्च हो जाता है ! उसके बाद इन त्योहारों को पूरे जोश खरोश के साथ मनाने का न तो उनमें उत्साह ही बचा रह जाता है न ही ऊर्जा ! उस पर इन दिनों पर्यावरण संरक्षण को लेकर मीडिया के द्वारा इतनी सारी हिदायतें नसीहतें दी जाने लगी हैं कि कोई भी त्योहार पारंपरिक तरीके से मनाना गुनाह सा लगने लगा है ! पहले भी होली पर खूब रंगों से होली खेली जाती थी, थाल भर-भर कर अबीर गुलाल उड़ाया जाता था हर आने जाने वाले को रंग लगाया जाता था किसीको कोई परेशानी नहीं होती थी ! दीपावली पर भी खूब पटाखे चलाये जाते थे ! तेल के ढेर सारे दीपक जलाए जाते थे ! सबको खूब आनंद आता था ! लेकिन अब हर पुरातन तरीके की इतनी आलोचना होती है उससे पैदा होने वाली हानियों के बारे में इतने विस्तार से बताया जाता है कि लोग उनसे विमुख होने लगे ! कोई सही विकल्प समझ नहीं आया तो लोगों ने उसे बिलकुल ही छोड़ दिया ! रंगों से स्किन खराब हो जाती है तो अब सिर्फ गुलाल से सूखी होली खेलने का चलन शुरू हो गया ! तेल के दीयों के जलाने से वातावरण में खराब महक फैलती है और पटाखों से वायु प्रदूषण और ध्वनि प्रदूषण होता है तो लोगों ने बिजली की झालर लगानी आरम्भ कर दी और पटाखे चलाने ही बंद कर दिए ! बच्चों को इन्हीं में तो मज़ा आता था ! उनका सारा उत्साह समाप्त हो गया ! त्योहार का आनंद सबसे अधिक बच्चे ही उठाते हैं ! वे उदासीन हो गए, बड़ों को रूचि नहीं रही ! कदाचित इसीलिये आज की युवा पीढ़ी परिवार के साथ त्योहार मनाने के स्थान पर छुट्टियों का उपयोग घूमने जाने में करने लगी है ! रिश्तों में औपचारिकता आ गई है और दोस्ती शायद अब इतनी प्रगाढ़ नहीं रह गई है ! इसलिए कह सकते हैं त्योहार अब उदासीनता के साथ ही मनाए जाते हैं ! इनकी सार्थकता अब फेसबुक, इन्स्टाग्राम, व्हाट्स एप पर रंगरंगीले आकर्षक शुभकामना सन्देश, रील्स, फ़ोटोज़ आदि भेजने तक ही सिमट कर रह गई है ! अब घर परिवार के सदस्यों के स्थान पर नितांत अजनबी अपरिचितों की रील्स देख कर त्योहार मनाये जाने लगे हैं !

साधना वैद


Monday, March 3, 2025

दीदार








ज़हर रुसवाई का घुट-घुट के पिया करते हैं 
तुम्हारी याद में जीते हैं हम न मरते हैं
सफर तनहाई का काटे नहीं कटता हमसे 
अब तो आ जाओ कि दीदार को तरसते हैं ।


ओ निर्मोही तरस रहे हैं हम तेरे दीदार को ।
आ जाओ अब करो सार्थक तुम अपने इस प्यार को
तुमने ही तो ज़ख्म दिए हैं और किसे दिखलाएं हम 
कब तक सोखेंगे आँचल में नैनों की इस धार को ।


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद

Friday, February 21, 2025

एक और राधा






बाँध लिया था मैने तुम्हें 
अपने नैनों की सुदृढ़ डोर से ।
इसी भ्रम में रही कि
तुम सदा मेरे नैनों की कारा में 
बंद रहोगे और कभी भी
इनके सम्मोहन से तुम
मुक्त नहीं हो सकोगे ।
लेकिन भूल थी यह मेरी 
मेरे नयनों की यह डोर
जिसे मैं मजबूत श्रृंखला 
समझती आ रही थी
सूत से भी कच्ची निकली
और तुम भी तो निकले 
नितांत निर्मोही, निर्मम
एक झटके में तोड़ कर इसे 
जा बैठे दूर परदेस में 
निष्ठुर कान्हा की तरह
और इस बार फिर
एकाकी रह गई 
एक और राधा 
जीवनपर्यंत भटकने को
संसार की अंधी गलियों में ।


चित्र - गूगल से साभार 

साधना वैद 
🙏🌹🌹🌹🙏

Monday, February 10, 2025

अनुरोध

 




करना है ‘संकल्प’ कभी ना तुम भटकोगे 

मिलें प्रलोभन खूब कभी ना तुम बहकोगे 

मौसम हो प्रतिकूल भले ही चाहे जितना

सुरभित करने जीवन सबका तुम महकोगे ! 


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद 

🙏🌹🌹🌹🙏