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Sunday, January 30, 2011

चूक

कहीं तो चूक हुई है
वरना वर्षों से अंतरतम के निर्जन कोने में
संकलित, संग्रहित निश्च्छल प्रार्थनाएं
सुने बिना ही देवता यूँ रूठ न जाते
और वे पल भर में ही निष्फल ना हो जातीं !

कहीं तो चूक हुई है
वरना अंजुली में सजी चमकीली धूप
उँगलियों से छिटक कर अचानक ही यूँ
सर्द हवाओं में विलीन ना हो जाती
और मेरी हथेलियाँ यूँ रीती ना हो जातीं !

कहीं तो चूक हुई है
वरना पल भर के लिये ही सही
दिग्दिगंत को आलोक से जगमगा देने वाले
त्वरा के प्रकाश को मेरे नयन आत्मसात कर पाते
इससे पहले ही मेरी पलकें मुँद न जातीं !

कहीं तो चूक हुई है
वरना हृदय में सदियों से संचित
नन्हीं-नन्हीं, नादान, भोली, सुकुमार आशाएं
प्रतिफलित होने से पहले ही इस तरह
मेरे मन में ही दम ना तोड़ देतीं !

कहीं तो चूक हुई है
वरना तेरी खुशबू, तेरे अहसास, तेरे वजूद
को मैं जी पाती इससे पहले ही जीवन की गाड़ी
किसी और राह पर ना मुड़ जाती !

साधना वैद

17 comments :

  1. ओह कैसी वेदना है इस चूक की ...

    कहीं तो चूक हुई है
    वरना हृदय में सदियों से संचित
    नन्हीं-नन्हीं, नादान, भोली, सुकुमार आशाएं
    प्रतिफलित होने से पहले ही इस तरह
    मेरे मन में ही दम ना तोड़ देतीं !

    यह पंक्तियाँ विशेष मर्मस्पर्शी लगीं ...कुछ भी होता है तो हर स्त्री अपनी ही चूक ढूँढने लगती है ...ऐसा ही कुछ एहसास हुआ ..ऐसा लगा जैसे आपने मेरे भी मन की बात लिख दी है ...सुन्दर अभिव्यक्ति

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  2. कहीं तो चूक हुई है
    वरना तेरी खुशबू, तेरे अहसास, तेरे वजूद
    को मैं जी पाती इससे पहले ही जीवन की गाड़ी
    किसी और राह पर ना मुड़ जाती !
    ...बहुत ही सुन्दर सार्थक सन्देश छुपा है इन पाँक्तिओं मे। बधाई सुन्दर रचना के लिये।

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  3. बहुत प्यारी सी कविता. स्त्री मन और भावनाएं .

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  4. अंतर्द्वंद यूँ ही नहीं उपजता |केवल अपने को ही दोष नहीं दिया जा सकता |किसी के भावों को ,बिरले ही होते हैं जो समझ सकते हैं |ह्रदय बहुत कोमल होता है |यदि उसे ठेस पहुंचे तो बह सहन नहीं कर पाता और अंतर्द्वंद बेचैन कर देता है |भावपूर्ण अति सुन्दर शब्दों से सजी कविता के लिए बहुत बहुत बधाई |
    आशा

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  5. कहीं तो चूक हुई है
    वरना तेरी खुशबू, तेरे अहसास, तेरे वजूद
    को मैं जी पाती इससे पहले ही जीवन की गाड़ी
    किसी और राह पर ना मुड़ जाती ...


    जीवन में बहुत बार ऐसा होता है ... हाथ आते आते मंज़िल भी तो निकल जाती है ...
    बहुत ही गहरी संवेदन शील रचना है .. ...

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  6. कहीं तो चूक हुई है
    वरना तेरी खुशबू, तेरे अहसास, तेरे वजूद
    को मैं जी पाती इससे पहले ही जीवन की गाड़ी
    किसी और राह पर ना मुड़ जाती !

    बहुत सुन्दर मर्मस्पर्शी रचना..कुछ न कुछ चूक अवश्य होती है पर हम उसको समझ नहीं पाते..बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  7. सुन्दर शब्द और भाव लिए इस अद्भुत रचना के लिए आपको कोटिश बधाई...
    नीरज

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  8. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 01- 02- 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  9. मन के अंतर्द्वंद्व और उस से उपजी वेदना को बड़े प्यार से शब्दों में बाँधा है...

    यह दर्द हमेशा सालता रहता है....शायद कहीं कोई चूक हुई है मन की भावनाओं का सुन्दर चित्रण

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  10. अद्भुत रचना....
    अंतर्मन की अकथ्य वेदना को अभिव्यक्त करने के अपने लक्ष्य से कहीं नहीं 'चुकी' है यह रचना..
    आभार... सादर...

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  11. कहीं तो चूक हुई है
    वरना तेरी खुशबू, तेरे अहसास, तेरे वजूद
    को मैं जी पाती इससे पहले ही जीवन की गाड़ी
    किसी और राह पर ना मुड़ जाती !
    साधना जी दर्द छुपा है इन पँक्तिओं मे। चूक तो जरूर होती है कहीं न कहीं लेकिन कई बार छोटी भूल का भी बडा खामियाज़ा भुगतना पडता है। बेहतरीन रचना। बधाई।

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  12. बढ़िया प्रस्तुति , मन कितनी बातें करता है , कौन जाने प्रतीक्षा का कौन सा पल आखिरी होगा , और सारी चूकें भूल जायेंगी ...

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  13. बहुत ही मर्मस्पर्शी रचना है , दिल को छू लेने वाली पँक्तियाँ कलमबद्ध की है आपने । आभार साधना जी ।

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  14. dard se bharee huee aur khoobsurti ke saath likhi hui hai aapki yah kavita.

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  15. कहीं तो चूक हुई है
    वरना तेरी खुशबू, तेरे अहसास, तेरे वजूद
    को मैं जी पाती इससे पहले ही जीवन की गाड़ी
    किसी और राह पर ना मुड़ जाती !

    साधनाजी निशब्द कर देने वाली पंक्तियाँ रची हैं..... बहुत सुंदर

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  16. कहीं तो चूक हुई है ...
    कैसा अपराध बोध होता है हर स्त्री के मन में , चूक किसी की भी हो , जिम्मेदार खुद को ही मानती है ...
    वेदना ने जैसे शब्दों का जामा पहन लिया है !

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  17. कहीं तो चूक हुई है
    वरना तेरी खुशबू, तेरे अहसास, तेरे वजूद
    को मैं जी पाती इससे पहले ही जीवन की गाड़ी
    किसी और राह पर ना मुड़ जाती !

    arey baba yahi kya kam hai ki aap in sab ka ehsaas kar payi aur dekhiye na zindgi aapko ab isi ehsaas ki mrigtrishna me aage ki or agrsar kiye jati hai aur aap in ehsaaso ko fir se paane ki chaahat me sabhi dukhon ko bhi aasani se jhail jati hain.

    to chook kahan hui ? balki apko jine ka maksad de to diya.

    nice poem.

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