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Monday, November 10, 2014

शिशिर की भोर


शिशिर ऋतु की सुहानी भोर
आदित्यनारायण के स्वर्ण रथ पर
आरूढ़ हो धवल अश्वों की
सुनहरी लगाम थामे
पूर्व दिशा में शनैः शनैः
अवतरित हो रही है !
पर्वतों ने अपना लिबास
बदल लिया है !
कत्थई रंग के हरे फूलों वाले
अंगवस्त्र को उतार
लाल और सुनहरे धागों से कढ़े
श्वेत दुशाले को अपने तन पर
चारों ओर से कस कर
लपेट लिया है !



पर्वत शिखरों के देवस्थान पर
रविरश्मियों ने अपने जादुई स्पर्श से
अंगीठी को सुलगा दिया है !  
वहाँ पर्वत की चोटियों पर देवता
और यहाँ धरा पर हम मानव
गरम चाय की प्याली
हाथ में थामे शीत लहर से
स्पर्धा जीतने के लिये
स्वयं को तैयार कर रहे हैं !
कल-कल बहती जलधारायें
सघन बर्फ की मोटी रजाई ओढ़
दुबक कर सो गयी हैं !

 

सृष्टि की इस मनोहारी छटा पर
मुग्ध हो दूर स्वर्ग में बैठे
देवराज इंद्र ने मुक्त हस्त से
अनमोल मोतियों की दौलत
न्यौछावर करने का दायित्व
सजल वारिदों को दे दिया है !
नभ में विचरण करते
ठिठुरते श्यामल बादलों के
कँपकँपाते हाथों से छिटक कर
ओस के मोती नीचे धरा पर
यत्र यत्र सर्वत्र बिखर गये हैं !
धन्य धरा ने विनीत भाव से
हर कली, हर फूल,
हर पत्ते, हर शूल
यहाँ तक कि
नर्म मुलायम दूर्वा के
हर तिनके की खुली मंजूषा में
इन मनोरम मोतियों को  
सहेज कर रख लिया है !
 शीत ऋतु का यह सुखद
शुभागमन है और प्रकृति के
इस नये कलेवर का
हृदय से स्वागत है,
अभिनन्दन है,
वंदन है !

साधना वैद

Saturday, November 8, 2014

जिजीविषा


 
















शुष्क तपते रेगिस्तान के
अनंत अपरिमित विस्तार में
ना जाने क्यों मुझे
अब भी कहीं न कहीं
एक नन्हे से नखलिस्तान
के मिल जाने की आस है
जहां स्वर्गिक सौंदर्य से ओत प्रोत
सुरभित सुवासित रंग-बिरंगे
फूलों का एक सुखदायी उद्यान
लहलहा रहा होगा !

सातों महासागरों की अथाह
अपार खारी जलनिधि में
प्यास से चटकते
मेरे चिर तृषित अधरों को
ना जाने क्यों आज भी
एक मीठे जल की
अमृतधारा के मिल जाने की
जिद्दी सी आस है जो मेरे
प्यास से चटकते होंठों की
तृषा बुझा देगी !

विषैले कटीले तीक्ष्ण
कैक्टसों के विस्तृत वन की
चुभन भरी फिजां में
ना जाने क्यों मुझे
आज भी माँ के
नरम, मुलायम, रेशमी आँचल के
ममतामय, स्नेहिल, स्निग्ध,
सहलाते से कोमल
स्पर्श की आस है
जो कैक्टसों की खंरोंच से
रक्तरंजित मेरे शरीर को
बेहद प्यार से लपेट लेगा !

सदियों से सूखाग्रस्त घोषित
कठोर चट्टानी बंजर भू भाग में
ना जाने क्यों मुझे
अभी भी चंचल चपल
कल-कल छल-छल बहती
मदमाती इठलाती वेगवान
एक जीवनदायी जलधारा के
उद्भूत होने की आस है
जो उद्दाम प्रवाह के साथ
अपना मार्ग स्वयं विस्तीर्ण करती
निर्बाध नि:शंक अपनी
मंजिल की ओर बहती हो !

लेकिन ना जाने क्यों
वर्षों से तुम्हारी
धारदार, पैनी, कड़वी और
विष बुझी वाणी के
तीखे और असहनीय प्रहारों में
मुझे कभी वह मधुरता और प्यार,
हितचिंता और शुभकामना
दिखाई नहीं देती
जिसके दावे की आड़ में
मैं अब तक इसे सहती आई हूँ
लेकिन लाख कोशिश करने पर भी
कभी महसूस नहीं कर पाई !


साधना वैद

Saturday, November 1, 2014

बीज




क्षितिज तक पसरी विशाल धरा का

एक लघु सा कण

अथाह असीम रत्नाकर की

एक छोटी सी बूँद

अपार सृष्टि के अनंत विस्तार का

एक नन्हा सा अणु

बृह्माण्ड में अवस्थित कोटिश: सितारों में

एक नन्हा सा सितारा

हाँ ! है वजूद मेरा

कदाचित सबसे छोटा

सबसे नगण्य

शायद ना के बराबर

लेकिन हुंकार है मेरी 

उतनी ही घनघोर

हौसला है मेरा

उतना ही बुलंद

पहचान है मेरी

उतनी ही पुख्ता

चमक है मेरी

उतनी ही प्रखर क्योंकि

हर विराट का बीज

मुझमें ही निहित है

मुझसे ही जन्म लेता है

और अंत में

मुझमें ही समाहित

हो जाता है

मैं हूँ

हर महान

हर विराट का

हर अनंत

हर अथाह का

हर असीम

हर अपार का

एक नन्हा सा बीज

और मुझमें ही

विकसित होता है

वह सभी कुछ जो

इस समस्त जगत को

अनादि काल से

विस्मित, हर्षित 

पुलकित, चमत्कृत

और कभी-कभी

भयभीत भी

 करता आ रहा है !



साधना वैद