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Thursday, November 13, 2014

एक थी चिड़िया ( बाल कथा )

पिछली पोस्ट, "गुमशुदा बच्चों का दर्द," बाल दिवस के उपलक्ष्य में कुछ अधिक गंभीर हो गयी ! इसलिए नन्हे मुन्नों के लिये आज एक बहुत ही मजेदार सी बुनियादी कहानी लेकर आयी हूँ जो शायद हर बच्चे को सुनाई जाने वाली पहली कहानी होती है ! आशा है बच्चे इसे ज़रूर पसंद करेंगे ! 
 

एक थी चिड़िया 

एक थी चिड़िया ! चिड़िया कैसे बोलती है ? चीं चीं ची !

एक था चिरौटा ! चिरौटा कैसे बोलता है ! चूँ चूँ चूँ !

दोनों मज़े से एक घोंसला बना कर रहते थे ! एक दिन चिड़िया ले आई कहीं से दाल और चिरौटा ले आया चावल ! दोनों ने मिल कर खिचड़ी बनाई ! उसमें दही मिला कर दोनों ने मज़े से खूब खाई, खूब खाई, खूब खाई  !

पेट भर गया तो चिड़िया बोली,

“चिरौटे चिरौटे मेरा झूला झूलने का मन कर रहा है !”

चिरौटा बोला, “मैं अभी झूला डाल देता हूँ !”



पास में था एक कुआं ! कूए में था पानी ! पानी खींचने के लिये कूए के ऊपर लगी हुई थी एक घिर्री ! चिरौटे ने घिर्री से बाँध कर पतले से डोरे का एक झूला टाँग दिया ! उस झूले पर बैठ कर चिड़िया खूब झूली, खूब झूली, खूब झूली ! डोरा टूट गया ! चिड़िया छपाक से पानी में गिर गयी ! चिड़िया ने पानी में से बाहर निकलने की बहुत कोशिश की लेकिन क्योंकि उसके पंख भीग गये थे इसलिए वह बाहर निकल ही नहीं पाई ! चिरौटा घबरा कर रोने लगा और चूं चूं चूं करने लगा !

उधर से आई एक बिल्ली ! बिल्ली कैसे बोलती है, “म्याऊँ, म्याऊँ, म्याऊँ !”

बिल्ली ने चिरौटे से पूछा, “तुम क्यों रों रहे हो ?” वह रो रो कर कह रहा था, “ऊं ऊं ऊं मेरी चिड़िया गिर गयी ! ऊं ऊं ऊं मेरी चिड़िया गिर गयी !”

बिल्ली ने पूछा, “मैं निकाल दूँ ?”

चिरौटे ने कहा, “निकाल दो !”

बिल्ली बोली “लेकिन मैं उसे खा जाउँगी !”

चिरौटा बोला, “ठीक है !”

बिल्ली ने पानी में छलाँग लगाई और चिड़िया को बाहर निकाल लाई ! फिर चरौटे से पूछने लगी, “मैं इसे खा लूँ ?”

चिरौटे ने कहा, “अभी नहीं ! सूख जाए तो खा लेना !”

थोड़ी देर के बाद चिड़िया आधी सूख गयी ! बिल्ली ने चिरौटे से फिर पूछा,

“अब तो मैं इसे खा लूँ ?”

चिरौटा फिर बोला, “अभी नहीं ! जब पूरी सूख जाए तब खा लेना !”

कुछ देर बाद चिड़िया पूरी सूख गयी ! बिल्ली ने पूछा,

“अब तो इसे खा लूँ ?”

चिरौटा बोला, “खा लो !”

लेकिन जैसे ही बिल्ली चिड़िया को खाने के लिये आगे बढ़ी चिड़िया फुर्र से उड़ कर अपने घोंसले में जा बैठी ! चिरौटा भी उड़ कर चिड़िया के पास पहुँच गया !

बिल्ली देखती रह गयी, चिड़िया फुर्र से उड़ गयी !

बिल्ली देखती रह गयी, चिड़िया फुर्र से उड़ गयी !  







 साधना वैद


Wednesday, November 12, 2014

गुमशुदा बच्चों का दर्द


बाल दिवस पर एक विशेष प्रस्तुति
 


१४ नवंबर का दिन भारत में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है जो हमारे लोकप्रिय प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू का जन्मदिवस भी है ! मनाना भी चाहिए ! बच्चे हमारी उम्मीदों का प्रतीक हैं और हमारी जमा पूँजी भी हैं !
 
दुर्भाग्य से हमारा देश आर्थिक विषमताओं से बुरी तरह ग्रस्त है ! हमारी जनसंख्या का बड़ा हिस्सा ग़रीबी की वजह से उन सब सुविधाओं से वंचित है जो हम अपने बच्चों को देना चाहते हैं ! सुधार हो तो रहा है पर धीमी गति से ! वंचित बच्चों की समस्याएँ, जैसे गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा, बाल मजदूरी आदि पर तो चिंतन होता ही रहता है लेकिन आज एक अन्य भयावह समस्या की ओर आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहती हूँ जिस पर ध्यान देने की बहुत आवश्यकता है और वह समस्या है उन खोये हुए बच्चों की जो या तो मिल नहीं पाते या लापता ही रह जाते हैं !

गृह मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को यह सूचना दी है कि प्रति वर्ष भारत में एक लाख बच्चे खो जाते हैं जिनका कोई पता नहीं चलता ! अब गौर करने की बात यह है कि इन खोये हुए बच्चों में से ९५ % बच्चे गरीब तबके के होते हैं जिनको निश्चित रूप से धन के लालच में या फिरौती के लिये अगवा नहीं किया जाता ! फिरौती के लिये अगवा किये जाने वाले बच्चों की सूचना तो मिल भी जाती है क्योंकि अगवा करने वाला खुद फिरौती की रकम के लिये बच्चे के परिवार से संपर्क करता है और फिर पुलिस भी सचेत और सतर्क हो जाती है ! भयावह स्थिति उन ग़रीब बच्चों की होती है जो फिरौती के धन के लिये अगवा नहीं किये जाते ! पुलिस तो मान लेती है कि ये बच्चे अपने आप घर से भाग गये हैं और इसीलिये कुछ नहीं करती ! लेकिन हकीकत कुछ और ही है !

ये गुमशुदा बच्चे, जिनमें से ५५% लड़कियाँ होती हैं, पैसा कमाने के लिये चोरी किये जाते हैं ! इन बच्चों का इस्तेमाल भीख मँगवाने के लिये, बड़े शहरों में चल रहे बाल श्रमिक आधारित उद्योगों में बतौर बँधुआ मजदूर काम कराने के लिये और इससे भी घृणित कर्म देह व्यापार के अड्डों पर सप्लाई करने के उद्देश्य से किया जाता है ! भारत में यह काला धंधा बहुत समय से चला आ रहा है ! अनेक लोग धन के लोभ में इस घृणित कर्म से जुड़े हुए हैं ! ये अंतर्प्रांतीय गिरोह इतने निडर और शक्तिशाली हो गये हैं कि उनके गाँव के गाँव बसे हुए हैं ! इनका काम इस तरह चलता है - छोटे बच्चे उठाये, गाँव में अपने लोगों के परिवारों में धरोहर की तरह बाँट दिए और फिर सही समय आने पर फिक्स्ड डिपोजिट की तरह कैश कर लिये ! पुलिस, प्रशासन, राजनेता और यहाँ तक कि समाज के प्रतिष्ठित लोगों को भी इसकी जानकारी और भनक होती है लेकिन सब मौन रहने में ही अपनी भलाई मानते हैं !

बतौर एक साधारण नागरिक क्या हम लेख लिखने के अलावा भी कुछ कर सकते हैं ? ज़रूर कर सकते हैं ! इस दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति से निबटने के लिये हम इतना काम तो कर ही सकते हैं कि धर्मस्थलों, मेले तमाशों, रेलवे स्टेशन व बस अड्डों पर भीख माँग रहे बच्चों पर तरस आ जाने के बावजूद भी उन्हें भीख में पैसे ना दें क्योंकि हो सकता है कि खोये हुए एक लाख बच्चों में इनमें ही कोई बच्चा हाथ फैलाए खड़ा हो और उसके ज़रिये हम उन अपराधियों की मंशा को सफल करने में अप्रत्यक्ष रूप से योगदान कर रहे हों !

जो संस्थाएं बाल श्रमिकों की सहायता करने के लिये कल कारखानों में छापा मार कर उन्हें आज़ाद करा रही हैं उनकी जितनी प्रशंसा की जाए कम ही है लेकिन उन्हें पूरी सफलता तब ही मिल सकेगी जब बाल श्रमिकों द्वारा तैयार किये गये सामान की बिक्री ना हो पाए ! बल्कि होना तो यह चाहिए कि बाल श्रमिकों द्वारा तैयार किये गये सामान का बाज़ार में बहिष्कार किया जाना चाहिए ! जब उद्योगपतियों को बच्चों से काम करवाने पर लाभ होने की बजाय घाटा उठाना पड़ेगा तो इस ग़लत चलन पर ज़रूर रोक लगेगी ! मीडिया बाल श्रमिकों द्वारा बनाए गये उत्पादों को पहचान कर और इस बारे में व्यापक रूप से प्रचार कर लोगों को जागरूक करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है !

विकट समस्या है उन बच्चों की जिन्हें देह व्यापार के लिये चुराया जाता है ! देह व्यापार में कमाने योग्य आयु होने तक उनको अपराधियों के गाँवों और मोहल्लों में अपराधियों के परिवारों के साथ ही पाला जाता है ! ये गाँव और मोहल्ले बदनाम तो होते हैं लेकिन यहाँ रहने वाले अपराधी भी कानूनी रूप से भारत के आम नागरिक होने के नाते सभी बुनियादी अधिकारों के हकदार होते हैं और इसीका फ़ायदा उठा कर वे हमारी लचीली व्यवस्था को अंगूठा दिखाते हुए इस काले धंधे को चलाने में कामयाब हो जाते हैं !

इन गुटों पर तीन तरफ से हमला करना होगा ! सबसे पहले तो इनके परिवारों में आने वाले हर नये सदस्य के बारे में बारीकी से खोज खबर रखनी होगी ! और इसके लिये उसी प्रतिबद्धता के साथ काम करना होगा जिस तरह हम आतंकवादियों के बारे में जानकारी हासिल करने के लिये करते हैं !

दूसरा बड़े शहरों के रेड लाईट एरियाज़ की निगरानी पुलिस, प्रशासन व इस क्षेत्र में काम करने वाली सामाजिक संस्थाओं द्वारा इस प्रकार की जानी चाहिए कि अगवा किये हुए बच्चों की यहाँ पर सप्लाई असंभव नहीं तो मुश्किल ज़रूर हो जाए ! पुलिस के बारे में तो क्या कहा जाए ! पूरे महकमे का सुधार ओवरड्यू है लेकिन सामाजिक संस्थाएं व जागरूक नागरिक अपनी भूमिका ईमानदारी के साथ निभा सकते हैं !   

तीसरा और कारगर उपाय यह है कि इस काम में संलग्न अपराधी समाज के लिये कमाई के वैकल्पिक साधनों की व्यवथा की जानी चाहिए जिससे वे इस दुष्कर्म से स्वयम को मुक्त कर सकें और खेती बाड़ी या किसी अन्य उद्योग या व्यापार की ओर उन्मुख हो सकें ! काम कठिन ज़रूर है लेकिन हाथ पर हाथ धरे बैठा भी तो नहीं जा सकता ! कुछ तो करना ही होगा ! और इसके लिये सबके सहयोग की ज़रूरत है !

अंत में बच्चों की चोरी से जुड़ी हुई एक प्रसिद्द फिल्म ’उमराव जान’ का ज़िक्र करना यहाँ प्रासंगिक होगा जो इसी समस्या पर आधारित है और इन बच्चों के दर्द को बखूबी बयान करती है ! 
    


 साधना वैद   



              चित्र --  गूगल से साभार