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Thursday, April 6, 2017

बोझ





“ देख कितने अच्छे लग रहे हैं दोनों ! स्कूल जा रहे हैं पढ़ने को !”
कूड़े में से बेचने लायक काम का सामान बीन कर इकट्ठा करना निमली और उसके छोटे भाई सुजान का रोज़ का काम है ! इसे बेच कर जो थोड़े बहुत पैसे घर में आ जाते हैं उनसे माँ कभी-कभी उन्हें मीठी गोली भी दिला देती है ! गोली के लालच में इस वक्त वही बटोरने के लिए बड़े-बड़े बोरे कंधे पर लटकाए दोनों डम्पिंग ग्राउंड की ओर जा रहे थे ! हठात् सामने से आते स्कूल जाने वाले सौरभ और कनिका पर नज़र पड़ी तो निमली के मन के उद्गार फूट पड़े !
उनकी चमचमाती ड्रेस और जूते देख सुजान की आँखों में भी हसरत भरी प्रशंसा के भाव थे ! फिर भी वह बोला -
“हाँ री निमली, देख ना उनकी पीठ पर भी बोझा है ! कैसे हैरान परेशान से दिखते हैं दोनों !”
“चल पागल, उनकी पीठ पर जो बोझा है वह है किताबों का और हमारी पीठ पर जो बोझा है वो है कूड़ कबाड़ का !”
दोनों की आँखों में पल भर को उदासी तैर गयी !
अचानक सुजान के मन में बिजली सी कौंध गयी ! वह चहक कर बोला,
“निमली, कितना अच्छा हो जो हम लोग अपना बोझा इनसे बदल लें ! मैं तो खुशी-खुशी उनका बस्ता उठा लूँगा ! और तू ?”
“चल पूछ कर देखें ! मेरे पास कल वाली गोलियां भी हैं ! वो भी दे देंगे !” सुजान का उत्साह देखते बनता था ! उसकी आँखों में सुन्दर तस्वीरों वाली चिकनी किताबें घूम रही थीं जो एक बार उसे रद्दी के ढेर में मिली थीं और जिन्हें उसने अभी तक अपने पास सम्हाल कर रख लिया है !
निमली उसे रोक पाती उससे पहले ही वह दौड़ कर सौरभ के पास चला गया ! निकर की जेब से मीठी गोलियाँ निकाल उसने सौरभ के आगे अपनी हथेली फैला दी !
“ खाओगे ?”
अपने सामने मैले कुचैले कपड़ों में खड़े सुजान को देख सौरभ चौंक गया !
“नहीं ! हटो सामने से हमें देर हो रही है !” वह झल्ला कर बोला !
“ले लो ना ! हम तुम्हारा भारी बोझा भी अपने हलके बोझे से बदल लेंगे !”
सुजान ने चतुराई से बात आगे बढ़ाई !
“क्या कहा तुमने ? हमारे बोझे से तुम अपना बोझा बदलना चाहते हो ?”
सौरभ के चहरे पर हैरानी झलक रही थी !
“पागल तो नहीं हो तुम ? यह बोझा नहीं है जो हमारी पीठ पर है ! इन किताबों में दुनिया भर की ज्ञान की बातें हैं जिन्हें पढ़ कर इंसान बड़ा आदमी बनता है ! अच्छे अच्छे काम करता है ! डॉक्टर इंजीनियर, वैज्ञानिक, अध्यापक, कलाकार बनता है ! तुमको भी पढ़ना चाहिए ! तुम्हारे पास बोरे में सिर्फ कूड़ा और गन्दगी है ! इसे फेंक दो ! अगर तुम पढ़ना चाहते हो हमारे साथ चलो ! हम अपने टीचर से तुम्हें मिलवा देंगे ! वो ज़रूर तुम्हारा एडमीशन किसी स्कूल में करवा देंगे !”  सौरभ ने उसे समझाने की कोशिश की !
निमली सुजान का हाथ पकड़ उसे दूर खींच ले गयी, “जल्दी चल ! देर हो जायेगी तो माँ मारेगी ! उसे चौका बासन करने जाना है !”
सौरभ की बातें सुजान के मन में हलचल मचा रही थीं ! उसे भी स्कूल जाना है, किताबें पढ़ कर बड़ा आदमी बनना है ! मगर कैसे ? कंधे के बोझ से कहीं अधिक भारी बोझ इस समय उसके मन पर सवार था !

साधना वैद

Saturday, April 1, 2017

बहती धारा





भोर का तारा
छिपा बही जैसे ही
नूर की धारा

बहे धरा पे
पिघल पर्वत से
चाँदी की धारा

उद्गम स्थल 
आलोकित हो जाता 
रवि आभा से 

छिटकी धूप
समूचे पर्वत पे 
सूर्य प्रभा से 

तपता सूर्य
बना दे नदिया को
सोने की धारा

किनारे खड़े
हरे भरे से पेड़
पन्ने सी धारा

नीलम धारा
हुआ प्रतिबिंबित
नीला आकाश

बहती धारा
बहाती कल मल
निर्विकार हो

बहता जाए
नदिया की धारा में
मेरी भी मन

शीतल धारा
तृषित तन मन
जीवनदायी

निर्मल धारा
कण-कण प्लावित
धरा प्रसन्न

जीवन धारा
बहती प्रति पल 
धीमी गति से

प्रचंड धारा
समस्त जन धन
बहा ले गयी

कुपित धारा
मानव का अज्ञान
आया सैलाब

न छेड़ो तुम
प्रकृति का नियम
पछताओगे


साधना वैद

Tuesday, March 28, 2017

“तो क्या हुआ मिन्नी......”--- लघु कथा







“तो क्या हुआ मिन्नी......”
नन्हा समर सुबकती हुई अपनी छोटी बहन को बड़े प्यार से गोदी में समेटने का प्रयास कर रहा था और बातों से उसका जी बहलाने की कोशिश कर रहा था,
“तो क्या हुआ मिन्नी जो नदी में बाढ़ आ गयी और सारा गाँव उसमें बह गया मैं तो हूँ ना तेरे पास तेरा ख़याल रखने के लिए ! मैं तेरा बहुत ध्यान रखूँगा ! हम दोनों राघव काका के पास चलेंगे ! वो तो कितना प्यार करते हैं हम दोनों से !”
“तो क्या हुआ मिन्नी जो मेरे हाथ छोटे-छोटे हैं ! बाबा ने सिखाया था कभी किसीके आगे हाथ मत फैलाना ! मैं राघव काका के चाय के ठेले पे कप धो दिया करूँगा और तेरे लिए ब्रेड ले आया करूँगा ! हम दोनों मिल कर चाय ब्रेड खाया करेंगे ! ठीक है ना ?”
“तो क्या हुआ मिन्नी जो बाढ़ के संग हमारे माँ, बाबा, घर, सामान सब बह गया ! मुझे अभी भी वो लोरी याद है जो माँ हम दोनों को सुलाते समय गाया करती थी ! मैं रोज़ रात को तुझे वह लोरी सुनाया करूँगा और तू सो जायेगी !”
“तो क्या हुआ मिन्नी जो हमारे पास किताबें खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं ! मैं तुझे स्कूल की क्लास के बाहर ले जाया करूँगा और तू टीचर जी की आवाज़ सुन कर बाहर से ही सारी कवितायें और सबक सीख लेना !”
“तो क्या हुआ मिन्नी........”
नन्हा समर अपनी छोटी बहन को दुनिया की हर वो खुशी देना चाहता था जिसकी वह हकदार थी ! माता-पिता को खोने के बाद अनायास ही वह बड़ा जो हो गया था !
सबसे विकराल प्रश्न जो उसके नन्हे से मस्तिष्क को विचलित कर रहा था वह यही था कि इतने बड़े संसार में अपनी अबोध बहन के साथ वह जीवित कैसे रहेगा !


साधना वैद