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Sunday, August 6, 2017

मेरे घर न आना भैया


रक्षा बंधन का त्यौहार है
हर बहन का अपने भाई पर
अटूट विश्वास और
अकथनीय प्यार है !
आरती का थाल सजा
भैया की कलाई पर
अरमान भरी राखी बाँधने का
उसे जाने कब से इंतज़ार है !
लेकिन वर्षों की यह पुनीत परम्परा
इस बहना के घर में अब
टूटती दिखाई देती है
अपने दुलारे भैया के लिए
इसके दिल में घोर अविश्वास
और आँखों में नफरत
साफ़ दिखाई देती है !
ज़मानत पर छूटे अपने भाई से
उसने साफ़ लफ़्ज़ों में
रक्षा बंधन पर अपने घर
न आने की ताकीद कर दी है,
ससुराल में सबके सामने
किस मुँह से वह अपने ऐसे
दुष्कर्मी भाई की कलाई पर
रक्षा सूत्र बाँधेगी जो उसकी
रक्षा का तो दम भरता है
किन्तु किसी अन्य लड़की पर
दरिन्दे की तरह टूट पड़ता है
इस शर्मिन्दगी से बचने के लिए  
अपने इकलौते भाई को उसने
नज़रों से दूर रहने की
हिदायत कर दी है !  
कैसे करेगी वह सामना सबकी  
सवाली निगाहों का –
“अच्छा ! यही हैं आपके भैया
जिन पर केस चल रहा है ?
चिंता न करें आप
वकील बहुत बढ़िया है
बिलकुल बेदाग़ छुड़ा लाएगा ”
लेकिन क्या सच में
वह भी ऐसा ही चाहती है ?
हरगिज़ नहीं !  
जो इंसान किसी स्त्री का
सम्मान नहीं कर सकता
जो किसी ग़ैर स्त्री को अकेली
और असुरक्षित पा उसको  
बेईज्ज़त कर सकता है  
वह किस मुँह से
मेरी रक्षा का दम भरता है
वह कैसे मेरा भाई हो सकता है
ऐसे दरिन्दे को तो समाज में
सबके साथ मिल कर जीने का
हक़ ही नहीं होना चाहिए
बाकी का सारा जीवन इसका
जेल की सलाखों के अन्दर
पश्चाताप की आग में
जलते हुए ही बीतना चाहिए !
एक नारी होने के नाते
मेरी न्याय व्यवस्था से
यही गुज़ारिश है कि
ऐसे खतरनाक मुजरिम को,
जो बदकिस्मती से मेरा भाई है,
कड़ी से कड़ी सज़ा मिले
ताकि हर उस पीड़िता को
जो इस दुर्दम्य वेदना से गुज़री है  
कुछ तो इन्साफ मिले !  
कोई बात नहीं भैया
आइन्दा यह राखी अब
कान्हा जी के हाथों में ही बँधेगी
वो मेरी रक्षा के लिए
आयें या न आयें
लेकिन तुम अब कभी भी
किसी भी रक्षा बंधन पर
मेरे घर न आना !

साधना वैद  





Saturday, July 29, 2017

प्रतिकार



खेल शुरू हुआ था एक दूसरे पर गुलाब की पाँखुरियाँ फेंकने से ! खुशबूदार, रेशम सी कोमल, स्निग्ध, चिकनी, मुलायम पाँखुरियाँ ! सुखद अहसास जगातीं ! स्वयं को विशिष्ट होने का भान करातीं ! मन को आल्हाद से भरतीं फूलों की पाँखुरियाँ ! फिर जब पंखुरियाँ ख़त्म हो गयीं तो उनकी जगह फूल फेंके जाने लगे ! पाँखुरियाँ तोड़ने में वक्त जो लगता ! कौन समय बर्बाद करे ! सो यह भी देखने की ज़हमत किसीने न उठाई कि इन फूलों के साथ काँटे भी हैं ! बड़े-बड़े काँटों सहित फूल यहाँ वहाँ हल्की सी चोट देते ! कभी कहीं हलके से तो कभी कहीं ज़ोर से चुभते काँटे झुँझलाहट और रोष जगाने लगे ! विशिष्ट होने का सुखद अहसास शनै शनै मिटने लगा !
फूल ख़त्म हो गए पर अब खेल में मज़ा आने लगा ! अब एक दूसरे को सम्मानित करने में नहीं अपमानित करने में ! एक दूसरे को चोट पहुँचाने में ! अब खेल शुरू हुआ कंकड़ों से पत्थरों से ! अब जीतना परम ध्येय था ! येन केन प्रकारेण सामने वाले को धूल चटाना भी मकसद बन गया ! एक कंकड़ फेंकता तो दूसरा ढेला ! एक ढेला फेंकता तो दूसरा पत्थर ! बिना यह देखे कि सामने वाले को कितनी चोट लगी !
कब यह खेल आदत बन गया ! कब स्वभाव बन गया और फिर कब एक जुनून बन गया पता ही नहीं चला ! खेल में सब बराबर होते हैं ! नियम भी सबके लिए एक समान ही होते हैं ! न कोई छोटा न कोई बड़ा ! तो फिर कैसे रिश्ते, किसका लिहाज़ ! कैसी मान मर्यादा, कैसी लोक लाज ! अब तो सवाल जीतने का है ! और खेल में जीतता वही है जिसके पास छल बल कौशल है, ताकत है और है समर्थन अपने से भी अधिक शक्तिशाली का ! लेकिन बीतते वक्त के साथ उम्र भी तो बढ़ती है ! दोनों खिलाड़ी हमउम्र हों तो खेल बराबर का चलता रहता है लेकिन अगर उम्र का फासला बहुत अधिक हो तो एक की ताकत चुकने लगती है ! छोटा खिलाड़ी जो ताकतवर भी है और अभ्यस्त भी उसके सामने दूसरे वाले पाले में खड़ा निर्बल, असहाय, जर्जर हो चुका खिलाड़ी भला कैसे जीत सकता है जिसके पास न अब बल बाकी है, न जोश, और न होश !
खेल का एक नियम यह भी है कि खेल बराबर वालों में होता है लेकिन कभी-कभी खेल के मैदान में नियमों को ताक पर रख दिया जाता है ! सर्वमान्य आधिकारिक नियमों की जगह खिलाड़ी अपने नियम खुद बना लेते हैं क्योंकि उस वक्त उनमें बदला लेने की भावना सर्वोपरि हो जाती है ! यह भी तय है कि जीत उसीकी होती है जो ताकत में सामने वाले से कहीं अधिक बलशाली है ! वह जब ऐसे कमज़ोर पर, जो अब प्रतिकार में फूलों की पाँखुरी भी नहीं उठा सकता, भारी पत्थर से वार करेगा तो वह तो कुचल ही जाएगा ना ! लेकिन क्या यह जीत सच में जश्न मनाने लायक है ? ज़रा सुनें तो अपनी अंतरात्मा की आवाज़ अगर आपके पास अंतरात्मा बची हुई है कुछ सोच विचार के लिए !

साधना वैद  




Thursday, July 27, 2017

कारगिल दिवस पर विशेष - नमन है तुमको





टूटी चूड़ियाँ
धुल गयी मेंहदी
वीर की वधु



कैसा सावन
तुम बिन साजन
विष सा मधु



माता बेहाल
कैसी चिर निंद्रा में
सोया है लाल



झुके से कंधे
डगमगाती चाल
बापू का हाल



गर्व से ऊँचा
मस्तक है चाहे हो
मन में पीर



सीने पे झेला
हर वार शत्रु का
ऐसा था वीर



झुका है सर
नमन है तुमको
वीर जवान


याद रखेगा
शहादत तुम्हारी
सारा जहान


साधना वैद

Sunday, July 23, 2017

एक पिता की फ़रियाद



हमने भी जिया है जीवन ! मर्यादाओं के साथ ! मूल्यों के साथ ! सीमाओं में रह कर ! अनुशासन के साथ !

जीवन तुम भी जी रहे हो ! लेकिन अपनी शर्तों के साथ ! नितांत निरंकुश होकर ! बिना किसी दखलंदाजी के ! बिलकुल अपने तरीके से !

असहमति तब भी थी ! असंतोष तब भी था ! झुँझलाहट तब भी थी ! विरोध तब भी था ! हर नयी पीढ़ी का अपने से पुरानी पीढ़ी से कुछ न कुछ, कम या ज्यादह मतभेद स्वाभाविक है ! 
हर युग में होता है ! लेकिन हर युग में उसे व्यक्त करने के तरीके बदल जाते हैं !

तब असभ्यता नहीं थी ! उच्श्रन्खलता नहीं थी ! उद्दंडता नहीं थी और निर्लज्जता नहीं थी !

रिश्तों का सम्मान था ! छोटे बड़े का लिहाज़ था ! मर्यादा का मान था ! अनुशासन का ज्ञान था !

विरोध था लेकिन विद्रोह नहीं था ! असहमति थी लेकिन असभ्यता नहीं थी ! असंतोष था लेकिन जोड़ने और जुड़े रहने की भावना प्रबल थी ! गुस्से में यदि कभी मुँह खुल भी गया तो पश्चाताप भी था मानसिक अनुताप भी था ! झुकने से परहेज़ नहीं था ! माफी माँग लेने से कोई गुरेज़ नहीं था !

तुम्हारी छोटी छोटी भूलों और नादान शरारतों पर दूसरों के गुस्से से  
तुम्हें बचाने के लिए हम औरों से लड़ पड़ते थे ! अब औरों की
बड़ी बड़ी गलतियाँ और गुनाह छिपाने के लिए तुम हम से लड़ पड़ते हो !   

तुम्हारी हर छोटी से छोटी फरमाइश को पूरा करने के लिए मैंने लगभग हर रोज़ ओवरटाईम किया ! रोज़ रात को अपनी जेब खाली कर गिनता था कि तुम्हारे मुख की मुस्कान खरीदने के लिए अभी कितने रुपयों की ज़रुरत और है ! हिसाब तुम भी रोज़ लगाते हो कि आज दिन भर में मैंने चाय के कितने कप पिये और कितनी रोटियाँ अधिक बनानी पडीं ताकि गृहस्थी पर पड़े बोझ की चर्चा कर तुम मेरे मुख की मुस्कान छीन सको !

अब युग बदल गया है अब अपनी ही संतान अपने माता पिता से हिसाब माँगती है कि बचपन में उन्होंने अपने बच्चों के लिए क्या किया, कितना किया और जितना किया सिर्फ उतना ही क्यों किया ! माता पिता ने जो किया वह भी कैसे किया यह जानने की शायद उन्हें ज़रुरत ही नहीं !

लेकिन डंके की चोट पर दिन भर सबके सामने यह गाने और जतलाने में उन्हें कोई एतराज़ नहीं कि, भले ही महीने दो महीने ही सही, अपने वृद्ध, बीमार और असहाय माता पिता को ज़िंदा रखने की प्रक्रिया में उन्होंने कितना हाथ पैरों से काम किया और कितना धन व्यय किया !

जिन माता पिता ने जीवन भर संघर्ष कर अपना पेट काट अपनी हर इच्छा को मार बच्चों को सीने से लगा पैरों पर खड़ा कर दिया उनके वे ही दुलारे बच्चे उन्हें घर से बाहर का रास्ता दिखाने में तनिक भी देर नहीं लगाते !

यह कलयुग है भाई यहाँ दूसरों की आँखों के तिनके गिनने के सब अभ्यस्त हैं लेकिन अपनी ही आँखों के शहतीर हटाना या तो उन्हें आता नहीं या वे इसकी ज़रुरत ही नहीं समझते !   


साधना वैद  

Thursday, July 20, 2017

सुबह हुई





सुबह हुई 
हमसफ़र चाँद 
घर को चला


देखो तो ज़रा 
क्षितिज के किनारे 
कौन है आया


दानी आदित्य 
लुटा रहा प्रकाश 
सहस्त्र हाथों


रवि रश्मियाँ 
सहलाएं तन को 
पुलकी धरा


दिव्य रश्मियाँ 
उतरीं धरा पर 
साक्षी हैं वृक्ष


स्वागत करे 
भुवन भास्कर का 
मुग्ध वसुधा


मौन पर्वत 
झर झर झरने 
करे नमन


पग पखारें 
कल कल नदियाँ 
मुदित मन


करे प्रकृति 
सुन्दर सुवासित 
पुष्प अर्पित


लदे हुए हैं 
फलों से तरुवर 
भोग के लिए


मुखर हुई 
विहगों के गान में 
ईश वन्दना


नत मस्तक 
झुकी अभ्यर्थना में 
धरा सुन्दरी


आँखें तो खोलो 
धन्य करो नयन 
दिव्य दृश्य से


जागी संसृति 
मन में आस लिए 
भोर हो गयी



साधना वैद

Monday, July 17, 2017

कुण्डली हाइकू - अभिनव प्रयोग




हार गयी मैं
और कितने गूँथूँ
फूलों के हार

दिये जलाये
प्रसन्न हो प्रभु ने
दर्शन दिये

दीवान लिखे
अत्याचारी राजा का
क्रूर दीवान

सोया जो बोया
रह गया बापू का
नसीब सोया

माँग थी छोटी
भर दें पिया मेरी
मोती से माँग

जंग हो बंद
हथियारों में लगे
भले ही जंग

पानी पिला दूँ
नानी याद करा दूँ
उतारूँ पानी

पान कराये
षठ रस व्यंजन
खिलाया पान

आम जन का
सबसे प्रिय फल
रसीला आम

खोया सिरे से
मिठाई की मंडी में
विशुद्ध खोया

 पीली चुनरी
लगने लगी नीली
थोड़ी जो पी ली !

सोना है पाना
तो करो परिश्रम
त्याग दो सोना

जीना शान से
सफल हो चढ़ना
  यश का जीना  

संग दिल हैं
प्रियतम फिर भी
रहूँ मैं संग


साधना वैद



  

Thursday, July 13, 2017

उपकार तुम्हारा



धुँधली सी रोशनी है 
धीमी सी आहट है 
मन के क्षितिज पर 
कोई सूरज उदित होने को है !
कल्पना का पंछी 
उड़ान भरने को बेकल है 
हे मेरे आराध्य 
उसके डैनों में 
इतनी शक्ति भर देना कि 
अपने गंतव्य तक पहुँचने में
उसे कोई बाधा न आये 
और प्रात की इस बेला में 
उसका मन उल्लास से 
उत्साह से भर जाए ! 
उपकार होगा तुम्हारा !




साधना वैद