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Wednesday, April 25, 2012

बस ! अब और नहीं ___


कब तक
मुट्ठी में बँधे
चंद गीले सिक्ता कणों की नमी में
मैं समंदर के वजूद को तलाशती रहूँ
जो बालारूण की पहली किरण के साथ ही
वाष्प में परिवर्तित हो
हवा में विलीन हो जाती है ! 

कब तक
मन की दीवारों पर
उभरती परछाइयों की उँगली पकड़े
मैं एक स्थाई अवलम्ब पा लेने के
अहसास से अपने मन को बहलाती रहूँ
जो भोर की पहली दस्तक पर  
भुवन भास्कर के मृदुल आलोक के
विस्तीर्ण होते ही जाने कहाँ
तिरोहित हो जाती हैं ! 

कब तक
शुष्क अधरों पर टपकी
ओस की एक नन्ही सी बूँद में
समूचे अमृत घट के
जीवनदायी आसव को पी लेने की
छलना से अपने मन को छलती रहूँ
जो कंठ तक पहुँचने से पहले
अधरों की दरारों में जाने कहाँ  
समाहित हो जाती है !

कब तक
हर रंग, हर आकार के
कंकरों से भरे जीवन के इस थाल से
अपनी थकी आँखों पर
नीति नियमों की सीख का चश्मा लगा  
सुख के गिने चुने दानों को बीन
सहेजती सँवारती रहूँ
जबकि मैं जानती हूँ कि इस
प्राप्य की औकात कितनी बौनी है !

कब तक
थकन से शिथिल अपने
जर्जर तन मन को इसी तरह
जीवन के जूए में जोतना होगा ?
कब तक
अनगिनत खण्डित सपनों के बोझ से झुकी
अपनी क्लांत पलकों के तले
फिर से बिखर जाने को नियत
नये-नये सपनों को सेना होगा ?
कब तक
हवन की इस अग्नि में
अपने स्वत्व को होम करना होगा ?   
कितना थक गयी हूँ मैं !
बस अब और नहीं _______!

साधना वैद



27 comments :

  1. कब तक हवन की अग्नि में अपने स्वत्व को होम करना होगा ?कितना थक गयी हूँ में ,बस अब और नहीं |
    उंदा और भावपूर्ण
    बढ़िया प्रस्तुति |बधाई
    आशा

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  2. कब तक
    हवन की इस अग्नि में
    अपने स्वत्व को होम करना होगा ?
    गहन भाव लिए ...उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति ।

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  3. बहुत खूबसूरती से भावों को समेटा है ... खुद को अब होम नहीं करना .... एक नए अस्तित्व को दृढ़ता से लाना है ...

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  4. ्बस अब और नही…………एक बिन्दु पर आकर ऐसा ही महसूस होता है………गहन भाव

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  5. ्बस अब और नही…………एक बिन्दु पर आकर ऐसा ही महसूस होता है………गहन भाव

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  6. वाह...........

    थक गयी हूँ......अब बस.........कभी ना कभी ऐसे भाव जन्मते ही हैं ह्रदय में.

    बहुत सुंदर ....

    सादर.

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  7. जीवन के हर उम्मीदी किरणों में इंतज़ार किया
    पर वक़्त पिघलता गया मोम की तरह
    अब ...... चाह नहीं , ज़रूरत नहीं जो कह लो ,
    पर अब और नहीं ,
    थकान ने किनारों की ख्वाहिश छोड़ दी
    या कहो अब हिम्मत नहीं ...

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  8. बहुत सुन्दर..भावों और शब्दों का उत्कृष्ट संयोजन...गहन भाव

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  9. कविता की प्रत्येक पंक्ति में अत्यंत सुंदर भाव हैं.... संवेदनाओं से भरी बहुत सुन्दर कविता...

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  10. आदरणीय मौसीजी सादर वन्दे,स्त्री के मर्म की थकन को संजोया है आपने ,यक़ीनन स्त्री के होम की अग्नि उसे ही जलती है । आपका मेरे ब्लॉग पर स्वागत है ।

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  11. मन के भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने.....

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  12. wah.....bahut hi sunder likhi hain.

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  13. उत्तम भावाव्यक्ति!!

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  14. कब तक
    हवन की इस अग्नि में
    अपने स्वत्व को होम करना होगा ?

    ye silsila sadiyon se chala aa raha hai aur
    bhi chalata rahega.
    bahut sundar abhivyakti .

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  15. वाह!!!!बहुत सुंदर प्रस्तुति,..खुबसूरत शब्द प्रभावी रचना,..

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: गजल.....

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  16. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 19 -04-2012 को यहाँ भी है

    .... आज की नयी पुरानी हलचल में ....आईने से सवाल क्या करना .

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  17. क्षणिक भी शाश्वत भी, बहुत खूब!

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  18. भाव निराशा के होने पर भी ..दिल को छू गए.

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  19. कब तक
    शुष्क अधरों पर टपकी
    ओस की एक नन्ही सी बूँद में
    समूचे अमृत घट के
    जीवनदायी आसव को पी लेने की
    छलना से अपने मन को छलती रहूँ.......बहुत सुन्दर

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  20. itne sare sawal kab tak karti rahenge aap khud se aur unse jinse ummeede ye man baandh leta hai. kyu nahi is man ko virakt kar deti kisi bhi dukh dene wali, na puri hone wali ummeed se. itne dard ko padhne k baad to yahi kahna padega.

    aapke blog par aakar naye shabd-kosh pa kar behtareen gyan praapti hoti hai.

    aabhar.

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  21. कविता के लिए दिया गया चित्र लाजवाब है।
    कुछ प्रयोग बेहद आकर्षित करते हैं , जैसे --
    १. सिक्ता कणों की नमी में मैं समंदर के वजूद
    २. मन की दीवारों पर उभरती परछाइयों की उँगली पकड़े
    ३. थकी आँखों पर नीति नियमों की सीख का चश्मा लगा
    एक विराम तो लगना ही है इस धैर्य के नाम पर सहने की सीमा को।

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  22. 'कब तक
    हवन की इस अग्नि में
    अपने स्वत्व को होम करना होगा ?
    कितना थक गयी हूँ मैं !'
    - पर विराम तो यहाँ है ही नहीं !

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  23. 'कब तक
    हवन की इस अग्नि में
    अपने स्वत्व को होम करना होगा ?
    कितना थक गयी हूँ मैं !'
    - पर विराम तो यहाँ है ही नहीं !

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  24. कब तक
    मन की दीवारों पर
    उभरती परछाइयों की उँगली पकड़े
    मैं एक स्थाई अवलम्ब पा लेने के
    अहसास से अपने मन को बहलाती रहूँ
    जो भोर की पहली दस्तक पर
    भुवन भास्कर के मृदुल आलोक के
    विस्तीर्ण होते ही जाने कहाँ
    तिरोहित हो जाती हैं !

    ... क्या बात है ... कमाल की रचना ...

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  25. हवन की इस अग्नि में
    अपने स्वत्व को होम करना होगा ?
    कितना थक गयी हूँ मैं !
    बस अब और नहीं

    उत्‍कृष्‍ट अभिव्‍यक्ति. बधाई.

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