Followers

Saturday, April 14, 2012

दर्दे ज़हर




हम भी चुप थे वो भी चुप थे
सब गाफिल थे अपने में ,
दिल के ज़ख्मों के मरहम को
इक जुमला ही काफी था !

किसने किसको कितना चाहा
नाप तोल कर क्या होगा ,
प्यार की छोटी सी दुनिया को
इक तिनका ही काफी था !

चाह कहाँ थी, मंज़िल तक
जाने की ज़हमत कौन करे ,
राहे वफ़ा पर संग चलने को
एक कदम ही काफी था

फर्क कहाँ पड़ता है
डूबे दरिया में या प्याली में ,
मरने को तो दर्दे ज़हर का
इक कतरा ही काफी था !

सात जनम का साथ भला कब
किसको हासिल होता है ,
करने को इज़हारे मोहोब्बत
इक लम्हा ही काफी था !

साधना वैद

24 comments :

  1. बस वो एक जुमला ही तो नहीं कहा जाता , पूरी रचना बहुत सुंदर

    ReplyDelete
  2. किसने किसको कितना चाहा
    नाप तोल कर क्या होगा ,
    प्यार की छोटी सी दुनिया को
    इक तिनका ही काफी था !

    ....बहुत सही कहा है...बहुत सुन्दर और प्रभावी अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!
    --
    संविधान निर्माता बाबा सहिब भीमराव अम्बेदकर के जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-
    आपका-
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  4. किसने किसको कितना चाहा
    नाप तोल कर क्या होगा ,
    प्यार की छोटी सी दुनिया को
    इक तिनका ही काफी था !.... जीने को इक लम्हा ही बराबर था

    ReplyDelete
  5. मरने को तो दर्दे ज़हर का
    इक कतरा ही काफी था !

    आह!क्या बात कह दी।

    ReplyDelete
  6. असर कर जाए तो छोटी सी बात ही काफ़ी है।
    http://blogkikhabren.blogspot.com/2012/04/buniyad-blog.html

    ReplyDelete
  7. किसने किसको कितना चाहा
    नाप तोल कर क्या होगा ,
    प्यार की छोटी सी दुनिया को
    इक तिनका ही काफी था !...

    एकदम सच कहा है, जीवन भर जीकर भी वो लम्हा नहीं जी पाते जिसके जीने से पूरा जीवन सफल हो जाता है.

    ReplyDelete
  8. बहुत भाव पूर्ण प्रस्तुति |
    आशा

    ReplyDelete
  9. .... एक जुमला ही तो नहीं कहा जाता....

    lovely

    ReplyDelete
  10. फर्क कहाँ पड़ता है
    डूबे दरिया में या प्याली में ,
    मरने को तो दर्दे ज़हर का
    इक कतरा ही काफी था !

    वाह.............

    बहुत सुंदर!!!

    सादर

    ReplyDelete
  11. फर्क कहाँ पड़ता है
    डूबे दरिया में या प्याली में ,
    मरने को तो दर्दे ज़हर का
    इक कतरा ही काफी था !

    वाह.............

    बहुत सुंदर!!!

    सादर

    ReplyDelete
  12. किसने किसको कितना चाहा
    नाप तोल कर क्या होगा ,
    प्यार की छोटी सी दुनिया को
    इक तिनका ही काफी था !

    अनुपम भावों की अभिव्यक्ति सुंदर रचना...बेहतरीन पोस्ट
    .
    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: आँसुओं की कीमत,....

    ReplyDelete
  13. किसने किसको कितना चाहा
    नाप तोल कर क्या होगा ,
    प्यार की छोटी सी दुनिया को
    इक तिनका ही काफी था

    ................गहराई से आती रचना, गहराई तक जाती रचना..!!

    ReplyDelete
  14. हम भी चुप थे वो भी चुप थे
    सब गाफिल थे अपने में ,
    दिल के ज़ख्मों के मरहम को
    इक जुमला ही काफी था !

    प्रभावी प्रस्तुति.

    ReplyDelete
  15. हर अश आर मतले का ही सुन्दर विस्तार है .बढ़िया रचना .

    ReplyDelete
  16. फर्क कहाँ पड़ता है
    डूबे दरिया में या प्याली में ,
    मरने को तो दर्दे ज़हर का
    इक कतरा ही काफी था !


    सच क्या फर्क पड़ता है. भावपूर्ण प्रस्तुति.

    ReplyDelete
  17. फर्क कहाँ पड़ता है
    डूबे दरिया में या प्याली में...

    सुन्दर रचना....
    सादर.

    ReplyDelete




  18. आदरणीया दीदी साधना जी
    सादर प्रणाम !


    भावनाओं की अच्छी अभिव्यक्ति हुई है आपकी इस रचना में-
    फर्क कहां पड़ता है
    डूबे दरिया में या प्याली में ,
    मरने को तो दर्दे ज़हर का
    इक कतरा ही काफी था


    …और एक बात की ख़ास मुबारकबाद है कि इस रचना का प्रवाह देखते ही बनता है …
    छंद पर आपकी पकड़ मजबूत होती जा रही है …
    अब नवीन जी के यहां ठाले बैठे पर आपकी रचनाएं और भी आनंद देंगी …
    :)

    शुभकामनाओं-मंगलकामनाओं सहित…
    -राजेन्द्र स्वर्णकार

    ReplyDelete
  19. बहुत बहुत धन्यवाद राजेन्द्र भाई ! आपने मेरे प्रयत्न को सराहा आपकी आभारी हूँ ! इसी तरह अनुग्रह बनाये रखियेगा ! एक बार पुन: धन्यवाद !

    ReplyDelete
  20. sadhna jinamaskaar....apki ye poem usi din padh li thi jb aapne mujhe link bheja tha...lekin vyavastTa vash apko response nahi de payi..deri k liye maafi chaahti hun.

    is tarah ka lekhan bhi manbhawan aur uttam hai....pahle ki posts ki upeksha isme dard ki aahat kam he...acchha laga.

    ReplyDelete
  21. आदरणीय मौसीजी सादर नमस्ते,आज आपके ब्लॉग पर आई तो देखा की आपने इतनी सुन्दर गजल जो मन को भावुक कर गई.आपसे खुलकर बात भी नहीं हो पाई इसका मुझे खेद है और में क्षमा प्रार्थी हूँ ।

    ReplyDelete
  22. मरने को तो दर्दे ज़हर का
    इक कतरा ही काफी था !
    सच है!
    सुन्दर अभिव्यक्ति!

    ReplyDelete