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Sunday, July 4, 2010

छोटी सी आशा

मुट्ठी भर आसमान
टुकड़ा भर धूप
दामन भर खुशियाँ
दर्पण भर रूप
इतना ही बस मैंने तुमसे माँगा है !

नींद भर सपने
कंठ भर गीत
बूँद भर सावन
नयन भर प्रीत
इससे ज्यादह कब कुछ मैंने माँगा है !

आँचल भर आँसू
ह्रदय भर पीर
शब्द भर कविता
पर्वत भर धीर
यह भी तो मैंने ही तुमसे माँगा है

यह भी क्या तुम
मुझे नहीं दे पाओगे ?
छोटी सी आशा भी
ना सह पाओगे ?
तुम कैसे 'भगवान'
मुझे शक होता है
जागे सबके भाग
मेरा क्यों सोता है !

साधना वैद

14 comments :

  1. मुट्ठी भर आसमान
    टुकड़ा भर धूप
    दामन भर खुशियाँ
    दर्पण भर रूप
    इतना ही बस मैंने तुमसे माँगा है !

    उसके घर देर है अंधेर नही .. दिल की भावनाओं को सुंदर से काग़ज़ पर उतारा है ...

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  2. आँचल भर आँसू
    ह्रदय भर पीर
    शब्द भर कविता
    पर्वत भर धीर
    यह भी तो मैंने ही तुमसे माँगा है

    बहुत भाव पूर्ण रचना....

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  3. बहुत उम्दा भावना प्रधान रचना!

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  4. AB BACH KYA? YE BHI TO SOCHIYE.
    V K V

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  5. जिसके अच्छे भाग्य वो खुश होता है
    जिसके खराब भाग्य वो रोता है

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  6. आँसू पीर कविता
    धीर धूप खुशियाँ
    रूप
    यह भी तो मैंने ही तुमसे माँगा है ...

    masum see khwahish ...masum sa sawaal ...
    sundar!

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  7. भगवान से जो भी सच्चे दिल से माँगा जाए सब मिल जाता है ,लेने वाला होना चाहिए |मन में धीरज होना चाहिए |
    आशा

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  8. मंगलवार 06 जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  9. मुट्ठी भर आसमान
    टुकड़ा भर धूप
    दामन भर खुशियाँ
    दर्पण भर रूप
    इतना ही बस मैंने तुमसे माँगा है !
    वाह साधना जी बहुत सुन्दर रचना है बधाई

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  10. वाह जी क्या बात है? शक न कीजिये उन्ही की देन है इतनी सुन्दर कविताओं के रसास्वादन का अवसर हमे प्राप्त हो रहा है। बेहतरीन रचना।

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  11. नींद भर सपने
    कंठ भर गीत
    बूँद भर सावन
    नयन भर प्रीत
    इससे ज्यादह कब कुछ मैंने माँगा है

    इस भावपूर्ण रचना के लिए ढेरों बधाई...
    नीरज

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  12. बहुत ही सुन्दर भाव भरे हैं।

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  13. Jab koi ablamb naa bache to ishwar se aastha bhi dagmagaane lagti h...behad prabhavpurna rachnaa

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  14. बहुत ही उम्दा रचना .....

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