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Friday, March 11, 2011

खामोशी


खामोशी की जुबां कभी कभी
कितनी मुखर हो उठती है
मैंने उस कोलाहल को सुना है !
खामोशी की मार कभी कभी
कितनी मारक होती है
मैंने उसके वारों को झेला है !
खामोशी की आँच कभी कभी
कितनी विकराल होती है
मैंने उस ज्वाला में
कई घरों को जलते देखा है !
खामोशी के आँसू कभी कभी
कितने वेगवान हो उठते हैं
मैंने उन आँसुओं की
प्रगल्भ बाढ़ में
ना जाने कितनी
सुन्दर जिंदगियों को
विवश, बेसहारा बहते देखा है !
खामोशी का अहसास कभी कभी
कितना घुटन भरा होता है
मैंने उस भयावह
अनुभूति को खुद पर झेला है !
खामोशी इस तरह खौफनाक
भी हो सकती है
इसका इल्म कहाँ था मुझे !
मुझे इससे डर लगता है
और मैं इस डर की क़ैद से
बाहर निकलना चाहती हूँ ,
कोई अब तो इस खामोशी को तोड़े !

साधना वैद

25 comments :

  1. तूफ़ान के पहले की ख़ामोशी को भावनाओ में ढाल दिया आपने... बहुत भयावह है इसे झेलना........ भावुक रचना

    My prayers are with all affected in tsunami in japan...God Bless them......

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  2. स्मिताMarch 11, 2011 at 6:35 PM

    खामोशी में दिमाग में विचारों का आगमन बढ़ जाता है|सुंदर भावनात्मक रचना ख़ामोशी का ही सृजन है |

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  3. मुझे इससे डर लगता है
    और मैं इस डर की क़ैद से
    बाहर निकलना चाहती हूँ ,
    कोई अब तो इस खामोशी को तोड़े !

    दर्द से भरी खामोश रचना -
    कितना कुछ बोलती हुई .
    बहुत खूबसूरत .

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  4. सुंदर भावनात्मक रचना ख़ामोशी का ही सृजन है| धन्यवाद|

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  5. खामोशी की भी जुबां होती है..बहुत भावमयी रचना

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  6. • इस कविता में आपकी वैचारिक त्वरा की मौलिकता नई दिशा में सोचने को विवश करती है।

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  7. खामोशी का बहुत सार्थक चित्रण किया है |
    बहुत अच्छी पोस्ट |सोचने को बाध्य करती है |
    बधाई |इसी प्रकार लिखती रहना |
    आशा

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  8. sadhna ji aapki ye rachna padh kar
    Amrita Pritam ji ki likhi hui kuchh panktiyan yaad aa gayi jo me apke sath share karna chaahungi.

    आज एक ऐसा सन्नाटा है जो न किसी को आने को आमंत्रित करता है और न किसी को जाने से रोकता है. आज मैं एक ऐसा मैदान हूँ जिस पर की सारी पगडंडियाँ तक मिट गयी हैं. एक ऐसी डाल जिसके सारे फूल झड चुके हों. सारे घोंसले उजड गए हैं. मन में असीम कुंठा और वेदना है . ऐसा कोई नहीं कि मेरे घावों को छू ले तो मैं आंसुओं में बिखर पडूँ.

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  9. खामोशी की जुबां कभी कभी
    कितनी मुखर हो उठती है
    मैंने उस कोलाहल को सुना है !

    ख़ामोशी का शोर इंसान केवल स्वयं ही सुन पाता है और इससे घुटन के साथ तीव्र वेदना भी होती है ...

    बहुत मर्मस्पर्शी रचना

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  10. खामोशी की मार कभी कभी
    कितनी मारक होती है

    इस गहन ख़ामोशी के बाद ही सैलाब आता है..
    .बहुत ही हृदयग्राही रचना

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  11. खामोशी की आँच कभी कभी
    कितनी विकराल होती है
    sach men.aapne to khamoshi ka ek naya hi roop dikha diya....bahut sundar.

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  12. are koi hai????????? gala sookhne laga hai , koi hai kahin?

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  13. खामोशी इस तरह खौफनाक
    भी हो सकती है
    इसका इल्म कहाँ था मुझे !
    मुझे इससे डर लगता है

    सच कहा ख़ामोशी ज्यादा डराती है. भावनात्मक रचना.

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  14. बहुत सुंदर कभी कभी खामोशी से भी डर लगता हे, धन्यवाद

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  15. मैंने उन आँसुओं की
    प्रगल्भ बाढ़ में
    ना जाने कितनी
    सुन्दर जिंदगियों को
    विवश, बेसहारा बहते देखा है ॥

    सुन्दर भावमयी प्रस्तुति ।

    .

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  16. ख़ामोशी की मार बड़ी मारक होती है ...
    इसे ज्यादा लम्बा नहीं खींचना चाहिए ...
    मौन और ख़ामोशी , बहुत अंतर है इसकी विभिन्न अवस्थाओं में ...
    ख़ामोशी को बेहतरीन शब्दों में समझा दिया !

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  17. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

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  18. खामोशी की ज़ुबां जब खुलती है तो सुनामी ले कर आती है। विचारों का प्रवाह रोके नही रुकता। सुन्दर रचना के लिये बधाई।

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  19. ख़ामोशी में सम्प्रेषण क्षमता ज़बरदस्त होती है.

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  20. कुछ न कहो......

    बस !!

    खामोश रहो......!!!

    आगे का काम खामोशी का......

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  21. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 15 -03 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  22. मैंने उन आँसुओं की
    प्रगल्भ बाढ़ में...................

    आदरणीया साधना जी आप की ये कविता पाठक से सीधा संवाद स्थापित करते हुए संदेश संप्रेषण करती हुई स्मृतियों में दर्ज हो जाती है| बधाई|

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