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Monday, April 11, 2011

कितना चाहा

कितना चाहा
कि अपने सामने अपने इतने पास
तुम्हें पा तुम्हें छूकर तुम्हारे सामीप्य की अनुभूति को जी सकूँ,
लेकिन हर बार ना जाने कौन सी
अदृश्य काँच की दीवारों से टकरा कर मेरे हाथ घायल हो जाते हैं
और मैं तुम्हें छू नहीं पाती ।
कितना चाहा
कि बिन कहे ही मेरे मन की मौन बातों को तुम सुन लो
और मैं तुम्हारी आँखों में उजागर
उनके प्रत्युत्तर को पढ़ लूँ,
लेकिन हर बार मेरी मौन अभ्यर्थना तो दूर
मेरी मुखर चीत्कारें भी समस्त ब्रह्मांड में गूँज
ग्रह नक्षत्रों से टकरा कर लौट आती हैं
लेकिन तुम्हारे सुदृढ़ दुर्ग की दीवारों को नहीं बेध पातीं ।
कितना चाहा
कि कस कर अपनी मुट्ठियों को भींच
खुशी का एक भी पल रेत की तरह सरकने ना दूँ,
लेकिन सारे सुख न जाने कब, कैसे और कहाँ
सरक कर मेरी हथेलियों को रीता कर जाते हैं
और मैं इस उपमान की परिभाषा को बदल नही पाती ।
कितना चाहा
कि मौन मुग्ध उजली वादियों में
सुदूर कहीं किसी छोर से हवा के पंखों पर सवार हो आती
अपने नाम की प्रतिध्वनि की गूँज मैं सुन लूँ
और वहीं पिघल कर धारा बन बह जाऊँ,
लेकिन ऐसा कभी हो नहीं पाता
और मैं अपनी अभिलाषा को कभी कुचल नहीं पाती ।

साधना वैद

22 comments :

  1. सुदूर कहीं किसी छोर से हवा के पंखों पर सवार हो आती
    अपने नाम की प्रतिध्वनि की गूँज मैं सुन लूँ
    और वहीं पिघल कर धारा बन बह जाऊँ,
    लेकिन ऐसा कभी हो नहीं पाता
    और मैं अपनी अभिलाषा को कभी कुचल नहीं पाती ।
    bahut hi achhi rachna

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  2. बीनाशर्माApril 11, 2011 at 9:05 PM

    अभी नहीं तो कभी नहीं | इसलिए कल की प्रतीक्षा नहीं अभीऔर इसी जीवन में सब कुछ कीजिए |

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  3. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 12 - 04 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  4. साधना जी...मेरे दिल में जा कर पूरी तरह बैठ गयी ये काव्य पंक्तियाँ...प्रेम तो बस प्रेम है....और उसका साथ जन्नत से भी बढ़ कर...पर विवशता प्रेम की रुला जाती है कभी कभी...बहुत ही सुंदर प्रेममयी रचना....।

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  5. समर्पण और प्यार किसी भी अभेद दिवार को भेदने में समर्थ है..
    सुन्दर रचना बधाइयाँ साधना जी..
    .....................

    क्या वर्ण व्योस्था प्रासंगिक है ?? क्या हम आज भी उसे अनुसरित कर रहें हैं??

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  6. कितना चाहा
    कि कस कर अपनी मुट्ठियों को भींच
    खुशी का एक भी पल रेत की तरह सरकने ना दूँ,
    लेकिन सारे सुख न जाने कब, कैसे और कहाँ
    सरक कर मेरी हथेलियों को रीता कर जाते हैं

    भावनाओं के समुन्दर में डूब कर ही रिक्त आत्मा सिक्त होती है ........
    अद्भुत भावों से परिपूर्ण रचना .....
    मैं पूरी तरह डूब गयी ......

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  7. हर शब्द पीड़ा और समर्पण को सजीव करता हुआ . अद्भुत काव्य संयोजन .

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  8. कितना चाह की अपने नाम के प्रतिध्वनि की गूंज मैं सुन लूं ...
    मौन को ना पढ़ा जाए तो समझ आता है , मगर मुखरता भी ना पढ़ी जा सके तो पीड़ा फूट कर यूँ ही शब्दों में अभिव्यक्त होती है ..
    बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति !

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  9. भावपूर्ण एवं बेहतरीन!!

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  10. acchee rachana..
    kash abhilashao ko kaboo kiya ja sakta........
    nirashao se insaan bach jata.......

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  11. बहुत बढ़िया लिखा आपने.रामनवमी की हार्दिक शुभकामनायें.

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  12. पास हो कर छू लेने की चाहत पर चरों ओर खड़ी कांच की दीवार ..मुखर भाषा ही नहीं सुनता कोई तो मौन का उत्तर कैसे मिले आँखों में ? खुशी के पल को मुट्ठी में बंधने का प्रयास जितना कस कर बांधें उतना ही रेत की तरह फिसल जाते हैं ...और अपने नाम की गूंज को प्रतिध्वनि के रूप में सुनने की चाहत ...चाहतों की वेदना से उपजी कहानी ....फिर अभिलाषाओं को कुचलना क्यों भला ?

    बहुत सुंदरता से लिखी है मन की वेदना ...

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  13. सुन्दर भावमय रचना। बधाई आपको।

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  14. एक बहुत सुंदर भावपूर्ण रचना |बहुत अच्छी लगी |
    आशा

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  15. jo socha ho jo chaha ho vo sab mil jaye to jeewan swarg ban jaye....aur jab tak jeewan me koi kami nahi hogi to usko pane ki ehmiyat bhi nahi hogi...aur jab kuchh pane ki ichha hi balwati nahi hogi to jiwan boring sa lagega...kyuki sab kuchh to apke kadmo me hoga....isliye bhagwan kuchh na kuchh kami chhod dete hain aur chaahte hain ki insan kuchh n kuchh pane ki jaddo-jehed me laga rahe aur vyast rahe taki uski itni lambi zindgi kuchh karne me beete...ha.ha.ha.lo ek gana yad aa gaya..

    ye na hota to koi dusra gam hona tha..
    meri kismat hi kuchh aisi thi ki har haal me bas rona tha....

    ha.ha.ha.

    so bura na mano yahi zindgi hai...

    anyway...apki rachna manobhavo ki samwedna ko darshati ek sunder abhivyakti hai.

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  16. बहुत खूब कहा है आपने ...।

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  17. कितना चाहा
    कि बिन कहे ही मेरे मन की मौन बातों को तुम सुन लो
    और मैं तुम्हारी आँखों में उजागर
    उनके प्रत्युत्तर को पढ़ लूँ,
    बेहतरीन पंक्तियाँ हैं...

    हमेशा की तरह बड़ी सुन्दरता से मन के भावों को शब्दों में ढाला है...बेहद भावपूर्ण रचना

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  18. अपने नाम की प्रतिध्वनि की गूँज मैं सुन लूँ
    और वहीं पिघल कर धारा बन बह जाऊँ,
    लेकिन ऐसा कभी हो नहीं पाता
    और मैं अपनी अभिलाषा को कभी कुचल नहीं पाती

    बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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  19. "मौन मुग्ध उजली वादियों में
    सुदूर कहीं किसी छोर से हवा के पंखों पर सवार हो आती
    अपने नाम की प्रतिध्वनि की गूँज
    मैं सुन लूँ और वहीं पिघल कर
    धारा बन बह जाऊँ,
    लेकिन ऐसा कभी हो नहीं पाता "

    काश कि
    ये सब सच हो पाता.....!
    कोई आता इतने पास कि
    फिर दूर न जा पाता...

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  20. स्मिताApril 14, 2011 at 12:09 PM

    सुंदर भावनात्मक अभिव्यक्ति ,खास करके "पिघल कर धारा बन जाऊँ" बहुत अच्छा लगा |

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