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Saturday, July 30, 2011

एक अकम्पित लौ


तुम्हारी यादों का सिरहाना लगाये,

तुम्हारे ख्यालों की चादर को

कस कर अपने जिस्म से लपेटे,

तुम्हारी छवि को आँखों में बसाये,

तुम्हारी बातों की रातरानी सी

महकती भीनी-भीनी खुशबू की

स्मृति से मन प्राण को

आप्लावित कर,

तुम्हारी आवाज़ के अमृत से

अपनी आत्मा को सींचती हूँ !

जाने कितने मुकाम उम्र के

अब तक पार कर लिये हैं

याद नहीं !

किसी मंदिर में प्रज्वलित

अखण्ड ज्योति की तरह

अपने मन के निर्जन कक्ष में

शाश्वत अकम्पित लौ की तरह

मैं सदियों से हर पल

हर लम्हा आज भी प्रदीप्त हूँ

कभी ना बुझने के लिये

और हर क्षण राख बन

स्वयं को उत्सर्जित

करने के लिये !



साधना वैद

18 comments :

  1. मैं सदियों से हर पल

    हर लम्हा आज भी प्रदीप्त हूँ

    कभी ना बुझने के लिये

    और हर क्षण राख बन

    स्वयं को उत्सर्जित

    करने के लिये !

    ये पंक्तियाँ बहुत प्रभावी हैं।

    सादर

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  2. हर लम्हा आज भी प्रदीप्त हूँ
    कभी ना बुझने के लिये
    और हर क्षण राख बन
    स्वयं को उत्सर्जित
    करने के लिये !

    यही मान के भाव ज़िंदगी जीने कि प्रेरणा बने रहते हैं ..बहुत खूबसूरत शब्दों में भावों को बाँधा है

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  3. Bahut sundar kavita. Dil se nikli huyee.

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  4. खूबसूरत शब्दों से सजी सुन्दर कविता.

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  5. gehre arth ki sunder rachna.........

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  6. इस कविता में प्रतीकों का प्रयोग बहुत अच्छा लगा।

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  7. कुछ मधुर यादें और जिजीविषा के मंथन से उपजे हैं इतने सुंदर भाव...!!
    बधाई इस रचना के लिए..!!

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  8. खूबसूरत शब्द, मधुर यादें, जीवन को आगे बढ़ाने की प्रेरणा देती सुमधुर प्रस्तुति

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  9. हर लम्हा आज भी प्रदीप्त हूँ कभी ना बुझने के लिये
    और हर क्षण राख बन स्वयं को उत्सर्जित करने के लिये !


    प्रतीकों का प्रयोग बहुत अच्छा है.

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  10. हर पल हर लम्हा ,आज भी प्रदीप्त हूँ कभी न बुझने के लिए और हर क्षण राख बन स्वयम को उत्सर्जित करने के लिए "
    बहुत सुन्दर भाव और शब्द चयन |
    बधाई
    आशा

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  11. अपने मन के निर्जन कक्ष में
    शाश्वत अकम्पित लौ की तरह
    मैं सदियों से हर पल
    हर लम्हा आज भी प्रदीप्त हूँ

    बहुत ही सुन्दर ये पंक्तियाँ तो कमाल कि हैं..आपकी लेखनी अक्सर चमत्कृत कर देती हैं...कैसे कैसे अनछुए भावों को आप शब्द दे देती हैं...बहुत ही उत्कृष्ट रचना...

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  12. apka shabd chayan to hamesha hi kamaal ka rahta hai. bahut sunder komal bhaavo ko shabdo rupi motiyo se saja ka sunder mala banayi hai.

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  13. तुम्हारी बातों की
    रातरानी सी महकती
    भीनी-भीनी खुशबू

    क्या बात है, उपमा अलंकार का विलक्षण प्रयोग| अर्थ तो एक ही है इन पंक्तियों का, पर भाव सम्प्रेषण विविधता दिखा रहा है| कविताओं में भी जादू होता है, यदि हम ध्यान से देखें तो|

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  14. कल 03/08/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  15. बहुत ख़ूबसूरत और भावपूर्ण कविता! दिल को छू गई हर एक पंक्तियाँ!

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  16. मैं सदियों से हर पल

    हर लम्हा आज भी प्रदीप्त हूँ

    कभी ना बुझने के लिये

    और हर क्षण राख बन

    स्वयं को उत्सर्जित

    करने के लिये !

    इन पंक्तियों मे पूरी कविता का सार आ गया………बहुत सुन्दर्।

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  17. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल कल 04- 08 - 2011 को यहाँ भी है

    नयी पुरानी हल चल में आज- अपना अपना आनन्द -

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  18. अद्भुत कृति भावनाओं से ओतप्रोत रचना बधाई

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