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Tuesday, October 27, 2020

कितनी सुन्दर होती धरती

 



कितनी सुन्दर होती धरती, जो हम सब मिल जुल कर रहते

झरने गाते, बहती नदिया, दूर क्षितिज तक पंछी उड़ते

ना होता साम्राज्य दुखों का,  ना धरती सीमा में बँटती

ना बजती रणभेरी रण की, ना धरती हिंसा से कँपती !

पर्वत करते नभ से बातें, जब जी चाहे वर्षा होती

सूखा कभी ना पड़ता जग में, फसल खेत में खूब उपजती

निर्मम मानव जब जंगल की, हरियाली पर टूट न पड़ता

भोले भाले वन जीवों के, जीवन पर संकट ना गढ़ता

जब सब प्राणी सुख से रहते, एक घाट पर पीते पानी

रामराज्य सा जीवन होता, बैर भाव की ख़तम कहानी

पंछी गाते मीठे सुर में, नदियाँ कल कल छल छल बहतीं

पेड़ों पर आरी ना चलती, कितनी सुन्दर होती धरती !




साधना वैद

10 comments :

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (28-10-2020) को   "स्वच्छ रहे आँगन-गलियारा"    (चर्चा अंक- 3868)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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    1. आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी ! सादर वन्दे !

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    1. हार्दिक धन्यवाद मित्र ! बहुत बहुत आभार !

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  3. बहुत....बहुत सुंदर भाव्यभिव्यक्ति।

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    1. हार्दिक धन्यवाद आभा जी ! स्वागत है आपका ! हृदय से आभार !

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  4. Replies
    1. हार्दिक धन्यवाद केडिया जी ! बहुत बहुत आभार आपका !

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  5. आदारणीया साधना वैद जी, नमस्ते👏! धरती और पर्यावरण को सुरक्षित रखने का संदेश देती आपकी यह रचना बहुत सुंदर है।
    पंछी गाते मीठे सुर में, नदियाँ कल कल छल छल बहतीं
    पेड़ों पर आरी ना चलती, कितनी सुन्दर होती धरती !
    हार्दिक साधुवाद!--ब्रजेन्द्रनाथ

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    1. हार्दिक धन्यवाद महोदय ! बहुत बहुत आभार आपका !

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