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Sunday, August 16, 2026

इसलिए नहीं आ सका

 




याद तो आई थी माँ

अपने जन्मदिन पर 

तुझे याद कर मेरी 

आँख भी भर आई थी,

जब यारों ने बाज़ार से लाकर 

रेडीमेड केक खिलाया था 

तेरे हाथ के बने मुलायम पूए 

और मीठी-मीठी खीर की भी 

बहुत याद आई थी माँ

लेकिन भारत माँ की रक्षा की 

कसम भी तो मैंने ही खाई थी न माँ

इसलिए नहीं आ सका ! 

सावन के महीने में रक्षा बंधन पर 

तेरी बहुत याद आई थी बहना 

अपनी सूनी कलाई देख 

मेरी आँख भी भर आई थी, 

मेरे माथे पर रोली अक्षत का 

पावन तिलक लगाती

अपने हाथों बड़े प्यार से मुझे 

घेवर का बड़ा सा टुकड़ा खिलाती 

तेरी मासूम छवि मेरी आँखों में 

उभर आई थी प्यारी बहना 

लेकिन भारत की सभी बहनों की 

रक्षा की कसम भी तो 

मैंने ही खाई थी न छोटी 

इसलिए आना तो बहुत चाहता था 

पर नहीं आ सका ! 

दीवाली से कुछ दिन पहले ही तो 

फ़ौज में मेरी भर्ती की 

सुखद सूचना आई थी, 

याद है पापा, आपने ही तो

अपने हाथों मुझे फौजी की यह 

गौरवशाली वर्दी पहनाई थी ! 

और जब गर्व से आपने मुझे 

अपने सीने से लगाया था 

आपके साथ-साथ मेरी आँख भी 

भर-भर आई थी 

उस वर्ष हमने कितने उत्साह के साथ 

दीवाली मनाई थी ! 

छोटे भाई के साथ खूब सारे पटाखे 

खरीद कर मैं ले आया था 

सारे घर में माटी के दीपक जला 

पूरे घर को हर्ष और उल्लास की 

रोशनी से जगमगाया था ! 

हर तरफ पटाखों का शोर था 

हृदय में आस और विश्वास की गूँज थी !

पापा, आज भी मोर्चे पर गूँज है 

आतंकियों के धमाकों की,

उनके नापाक नारों की, इरादों की, 

मशीनगनों और गोला बारूद की,

इस गूँज को तो खामोश करना ही है 

दुश्मनों का खात्मा तो करना ही है 

इसलिए नहीं आ सका ! 

जब-जब गुलमोहर देवदार पर बहार आई 

बुरांश के फूलों पर अरुणिमा छाई

तुम्हारा सलज्ज मुखड़ा याद कर प्रिये

मेरी आँख भी भर-भर आई ! 

यह मादक मतवाला मौसम 

मन भारी कर जाता है 

तुम्हारे साथ बिताया हर खूबसूरत पल 

याद दिला जाता है !

तुम्हारे कंगन, तुम्हारी चूड़ी

तुम्हारी पायल की खनक 

सुनाई देती है,

पंछियों की सरगम में मुझे

तुम्हारे गीतों की प्रतिध्वनि

सुनाई देती है ! 

तभी सुदूर घाटी से भारत माँ की 

घुटी-घुटी सी चीत्कार भी 

मुझे सुनाई दे जाती है ! 

मेरा मधुर स्वप्न टूट जाता है, 

यथार्थ का निर्मम प्रहार 

मुझे मोहनिद्रा से जगा जाता है ! 

भारत माँ ने कातर हो मुझे

रक्त रंजित घाटियों से आवाज़ लगाई है, 

मेरी आँखों में खून उतर आया है 

अंतर में प्रतिकार ने आग भड़काई है !

तुम जानती तो हो न प्रिये 

इस पुकार को मैं किसी भी हाल में 

अनसुनी नहीं कर सकता 

इसीलिये नहीं आ सका ! 


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद   

   

 

  








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