आगरा में राष्ट्रीय राजमार्ग पर मृत जानवरों के अंगों से चर्बी निकाल कर देशी घी बनाया जा रहा था और उसे धड़ल्ले से मशहूर ब्राण्ड्स के नकली रैपर लगा कर सालों से बाज़ार में बेचा जा रहा था लेकिन हमारी पुलिस और प्रशासन किसी को कानोंकान खबर भी ना हुई आश्चर्य होता है । फिर किसी तरह मामला संज्ञान में आया भी तो जिस त्वरित गति से उस पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है वह बेहद शर्मनाक है ।
जिस दिन से इस घिनौने कृत्य के बारे में पता चला है उसी दिन से अधिकारियों के द्वारा इस पर लीपापोती कर मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है । सबूतों के साथ कोई छेड़ छाड़ ना हो सके इसके लिये ज़रूरत थी कि कारखाने को सील कर दिया जाता और सूक्ष्म निरीक्षण परीक्षण के लिये सारे सामान को ज्यों का त्यों छोड़ दिया जाता । लेकिन यहाँ तो उल्टी गंगा ही बहती है । कारखाने को सील करने के बजाय उस पर बुलडोज़र चलाकर उस जगह को मैदान में तब्दील कर दिया और सारे सबूत मिटा डाले । इस ग़ैर ज़िम्मेदाराना कार्यवाही के लिये कौन जवाब देगा ? किसके आदेश से वहाँ बुलडोज़र चलाया गया ? क्या उस अधिकारी को कोई दण्ड मिलेगा ? कारखाना किसका था , किसके वरद हस्त के नीचे वह इस जघन्य काण्ड को बेखौफ चला पा रहा था , उसके इस गुनाह में कौन विशिष्ट लोग उसके भागीदार थे क्या इन रहस्यों से पर्दा उठेगा ? इस विषय पर सारे अधिकारी मौन क्यों साधे हुए हैं ? आखिर किसे बचाने के लिये सारी मशक्कत की जा रही है ? वैसे तो मीडिया तिल का ताड़ बनाने में माहिर है लेकिन इस मामले में वह भी दबे स्वरों में दिन भर में एकाध संक्षिप्त समाचार देकर चुप्पी साध लेता है ?
समाज को भयमुक्त और अपराधमुक्त बनाने के मुख्यमंत्री जी के दावे कहाँ गये ? आगरा आजकल आये दिन होने वाली आपराधिक वारदातों से थर्राया हुआ है । हर रोज़ समाचार पत्र चोरी , डकैती , लूट , खसोट , हत्या , आगजनी आदि के समाचारों से भरे रहते हैं । अपराधी इतने निडर हैं कि दिन दहाड़े ऐसे जघन्य कारनामों को अंजाम देते हैं और कोई कुछ नहीं कर पाता ना पुलिस ना प्रशासन । आखिर क्यों ? यह सब किसकी शै पर हो रहा है ? आगरा ही नहीं पूरा उत्तर प्रदेश अपराधियों की गिरफ्त में है ? क्या हमारे नेता निजी स्वार्थों से अपना ध्यान हटा कर आम जनता के हितों के बारे में भी कभी सोचेंगे या जनता के साथ अंतरंगता केवल चुनाव के महीने में चन्द आम सभाओं तक ही सिमट कर खत्म हो जाती है ? अभी कुछ समय पूर्व नकली दूध के काले धन्धे का पर्दाफाश हुआ था । टी वी पर बाकायदा नकली दूध बनाने वालों के साक्षात्कार तक दिखाये गये थे ? क्या हुआ इस मामले में ? अपराधियों को क्या सज़ा मिली ? अगर नहीं मिली तो कब मिलेगी ? इसी तरह इस केस की फाइल भी सालों के लिये किसी न्यायालय के गोदाम में धूल चाटती रहेगी और मिलावटी खाद्य पदार्थों के बनाने और बचने का सिलसिला इसी तरह से धडल्ले के साथ बखौफ चलता रहेगा । है कोई माई का लाल जो इसको रोक सके ?
हमें कब तक इन हृदयहीन मुनाफाखोरों के हाथों का खिलौना बने रहना पड़ेगा जिनके पास ना तो मानवीयता है ना ही उन्हें ईश्वर का भय है ? राजनीति के बाहुबलियों के साथ साँठ गाँठ उनके ऐसे काले धन्धों को पनपने पसरने में मददगार सिद्ध होती है । जनता के स्वास्थ्य और विश्वास के साथ खिलवाड़ किया जाता है और हम निरुपाय हो सब सहने के लिये मजबूर हैं क्योकि यह तो अंधेर नगरी चौपट राजा का देश बन चुका है । जिनसे न्याय की आशा हो वे ही गुनाहों के दलदल में आकण्ठ डूबे हों तो आम आदमी किसके सामने जाकर अपना दुखडा रोये और उसके आँसू पोंछने के लिये किसके हाथ उठेंगे ? ऐसे में ज़रूरत है कि जनता को समाज के चन्द प्रबुद्ध प्रतिनिधियों के नेतृत्व में एकजुट हो इस तरह के जघन्य काण्डों का पुरज़ोर विरोध करना चाहिये और जब तक मामले की गहन जाँच पड़ताल होकर ठोस नतीजे सामने ना आ जायें प्रशासनिक कार्यवाही पर पैनी नज़र रखनी चाहिये कि वे मामले को दबाने की कोशिश ना कर पायें ।
साधना वैद
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Friday, June 19, 2009
Friday, June 5, 2009
दस सूत्रीय सुझाव
न्याय प्रणाली में सुधार भारत में लोकतंत्र को सुदृढ़ करने के लिये आपके दस सूत्रीय सुझाव आमंत्रित हैं । आशा है हम सबके सम्मिलित प्रयासों से प्रस्तावित सुझावों की जो सूची सामने आयेगी उस पर ध्यान केन्द्रित किया जायेगा तो अवश्य ही अनुकूल परिणाम सामने आयेंगे ।
1. भ्रष्टाचार उन्मूलन
2. न्याय प्रणाली में सुधार
त्वरित न्याय का प्रावधान
मुकदमों में तारीखें कम से कम पडें
मुकदमें की प्रकृति को देखते हुए समय सीमा का निर्धारण
सज़ा सुनाये जाने बाद उसे तुरंत लागू किया जाये
छोटी मोटी शिकायतों के मुकदमों को आउट ऑफ कोर्ट निपटा दिया जाये
विचाराधीन मुकदमों को निपटाने के लिये और न्यायालयों का निर्माण हो
लोक अदालतों और पंचायतों को और अधिक अधिकार सम्पन्न किया जाये
3. शिक्षा का प्रसार
4. सुस्त प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार
5. पुलिस की कार्य प्रणाली में सुधार
6. आम लोगों को स्वास्थ्य व स्वच्छता के प्रति जागरूक करना
7. बेरोज़गार युवाओं के लिये स्व रोज़गार के अवसरों को उपलब्ध कराना
8. नारी सशक्तिकरण के लिये कारगर उपाय
9. निर्धन बच्चों के लिये बेहतर जीवन के अवसर उपलब्ध कराना
10.देश के संविधान में आवश्यक्तानुसार परिवर्तन और कानून का कड़ाई के साथ अनुपालन करना
मेरे दृष्टिकोण से इन बिन्दुओं पर कार्य किया जाये तो भारत में लोकतंत्र को सुदृढ़ किया जा सकता है । आपके सुझाव भी आमंत्रित हैं । जब सभी प्रबुद्ध लोग इस दिशा में सोचेंगे तो आशा है कि कोई भी बिन्दु अछूता नहीं रह जायेगा ।
साधना वैद
1. भ्रष्टाचार उन्मूलन
2. न्याय प्रणाली में सुधार
त्वरित न्याय का प्रावधान
मुकदमों में तारीखें कम से कम पडें
मुकदमें की प्रकृति को देखते हुए समय सीमा का निर्धारण
सज़ा सुनाये जाने बाद उसे तुरंत लागू किया जाये
छोटी मोटी शिकायतों के मुकदमों को आउट ऑफ कोर्ट निपटा दिया जाये
विचाराधीन मुकदमों को निपटाने के लिये और न्यायालयों का निर्माण हो
लोक अदालतों और पंचायतों को और अधिक अधिकार सम्पन्न किया जाये
3. शिक्षा का प्रसार
4. सुस्त प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार
5. पुलिस की कार्य प्रणाली में सुधार
6. आम लोगों को स्वास्थ्य व स्वच्छता के प्रति जागरूक करना
7. बेरोज़गार युवाओं के लिये स्व रोज़गार के अवसरों को उपलब्ध कराना
8. नारी सशक्तिकरण के लिये कारगर उपाय
9. निर्धन बच्चों के लिये बेहतर जीवन के अवसर उपलब्ध कराना
10.देश के संविधान में आवश्यक्तानुसार परिवर्तन और कानून का कड़ाई के साथ अनुपालन करना
मेरे दृष्टिकोण से इन बिन्दुओं पर कार्य किया जाये तो भारत में लोकतंत्र को सुदृढ़ किया जा सकता है । आपके सुझाव भी आमंत्रित हैं । जब सभी प्रबुद्ध लोग इस दिशा में सोचेंगे तो आशा है कि कोई भी बिन्दु अछूता नहीं रह जायेगा ।
साधना वैद
Tuesday, June 2, 2009
घर फूँक तमाशा
देश में कहीं कुछ हो जाये हमारे मुस्तैद उपद्रवकारी हमेशा बड़े जोश खरोश के साथ हिंसा फैलाने में, तोड़ फोड़ करने में और जन सम्पत्ति को नुक्सान पहुँचाने में सबसे आगे नज़र आते हैं । अब तो इन लोगों ने अपना दायरा और भी बढ़ा लिया है । वियना में कोई दुर्घटना घटे या ऑस्ट्रेलिया में, अमेरिका में कोई हादसा हो या इंग्लैंड में, हमारे ये ‘जाँबाज़’ अपने देश की रेलगाड़ियाँ या बसें जलाने में ज़रा सी भी देर नहीं लगाते । विरोध प्रकट करने का यह कौन सा तरीका है समझ में नहीं आता । यह तो हद दर्ज़े का पागलपन है ।
आजकल यह रिवाज़ सा चल पड़ा है कि सड़क पर कोई दुर्घटना हो गयी तो तुरंत रास्ता जाम कर दो । जितने भी वाहन आस पास से गुज़र रहे हों उनको आग के हवाले कर दो फिर चाहे उनका दुर्घटना से कोई लेना देना हो या ना हो और घंटों के लिये धरना प्रदर्शन कर यातायात को बाधित कर दो । किसी अस्पताल में किसी के परिजन की उपचार के दौरान मौत हो गयी तो डॉक्टर के नर्सिंग होम में सारी कीमती मशीनों को चकनाचूर कर दो और डॉक्टर और उसके स्टाफ की जम कर धुनाई कर दो । जनता का यह व्यवहार कुछ विचित्र लगता है । हद तो तब हो जाती है जब अपना आक्रोश प्रदर्शित करने के लिये ये लोग आम जनता की सहूलियत और ज़रूरतों को पूरा करने के लिये वर्षों के प्रयासों और जद्दोजहद के बाद जैसे तैसे जुटायी गयी बुनियादी सेवाओं को अपनी वहशत का निशाना बनाते हैं ।
आम जनता के मन में यह भ्रांति गहराई तक जड़ें जमाये हुए है कि सारी रेलगाड़ियाँ, बसें या सरकारी इमारतें ‘सरकार’ की हैं जो कोई दूसरे पक्ष का व्यक्ति है और उसके सामान की तोड़ फोड़ करके वे अपना बदला निकाल सकते हैं । हम सभी यह जानते हैं कि हमारा देश अभी पूरी तरह से सुविधा सम्पन्न नहीं हुआ है । अभी भी किसी क्षेत्र की किसी ज़रूरत को पूरा करने के लिये सरकार को एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ता है और उस सुविधा का उपभोग करने से पहले आम जनता को भारी मात्रा में टैक्स देकर धन जुटाने में अपना योगदान करना पड़ता है तब कहीं जाकर दो शहरों को जोड़ने के लिये किसी बस या किसी रेल की व्यवस्था हो पाती है या किसी शहर में बच्चों के लिये स्कूल या मरीज़ों के लिये किसी अस्पताल का निर्माण हो पाता है । लेकिन चन्द वहशी लोगों को उसे फूँक डालने में ज़रा सा भी समय नहीं लगता । अपने जुनून की वजह से वे अन्य तमाम नागरिकों की आवश्यक्ताओं की वस्तुओं को कैसे और किस हक से नुक्सान पहुँचा सकते हैं ? जो लोग इस तरह की असामाजिक गतिविधियों में लिप्त रहते हैं क्या वे कभी रेल से या बस से सफर नहीं करते ? अपने परिवार के बच्चों को स्कूलों में पढ़ने के लिये नहीं भेजते या फिर बीमार पड़ जाने पर उन्हें अस्पतालों की सेवाओं की दरकार नहीं होती ? फिर बुनियादी ज़रूरतों की इन सुविधाओं को क्षति पहुँचा कर वे किस तरह से एक ज़िम्मेदार नागरिक होने का दायित्व निभा रहे होते हैं ?
लोगों तक यह संदेश पहुँचना बहुत ज़रूरी है कि जिस सरकारी सम्पत्ति को वे नुक्सान पहुँचाते हैं वह जनता की सम्पत्ति है और उसके निर्माण के लिये उनकी खुद की भी गाढ़े पसीने की कमाई कर के रूप में जब सरकार के पास पहुँचती है तब ये सुविधायें अस्तित्व में आती हैं । इन के नष्ट हो जाने से पुन: इनकी ज़रूरत का शून्य बन जाता है और उसकी पूर्ति के लिये पुन: अतिरिक्त कर भार और उसके परिणामस्वरूप बढ़ने वाली मँहगाई का दुष्चक्र आरम्भ हो जाता है जिसका खामियाज़ा चन्द लोगों की ग़लतियों की वजह से सभी को भुगतना पड़ता है । यह नादानी कुछ इसी तरह की है कि घर में किसी बच्चे की नयी कमीज़ की छोटी सी माँग पूरी नहीं हुई तो वह अपने कपड़ों की पूरी अलमारी को ही आग के हवाले कर दे ।
इस समस्या के समाधान के लिये ज़रूरी है कि जन प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के नागरिकों को केवल धरना प्रदर्शन का प्रशिक्षण ही ना दें वरन उनके कर्तव्यों के लिये भी उन्हें जागरूक और सचेत करें । नेता गण खुद भी धरना प्रदर्शन और हिंसा की राजनीति से परहेज़ करें और आम जनता के सामने संयमित और अनुशासित आचरण कर अच्छे उदाहरण प्रस्तुत करें ताकि जनता के बीच उद्देश्यपूर्ण संदेश प्रसारित हो । रेडियो और टी.वी. चैनल्स पर नागरिकों को इस दिशा में जागरूक करने के लिये समय समय पर संदेश प्रसारित किये जायें और मौके पर तोड़ फोड़ की असामाजिक गतिविधि में लिप्त पकड़े गये लोगों को कठोर दण्ड दिया जाये उन्हें सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ा ना जाये । जब तक कड़े कदम नहीं उठाये जायेंगे हम इसी तरह पंगु बने हुए इन उपद्रवकारियों के हाथों का खिलौना बने रहेंगे ।
साधना वैद
आजकल यह रिवाज़ सा चल पड़ा है कि सड़क पर कोई दुर्घटना हो गयी तो तुरंत रास्ता जाम कर दो । जितने भी वाहन आस पास से गुज़र रहे हों उनको आग के हवाले कर दो फिर चाहे उनका दुर्घटना से कोई लेना देना हो या ना हो और घंटों के लिये धरना प्रदर्शन कर यातायात को बाधित कर दो । किसी अस्पताल में किसी के परिजन की उपचार के दौरान मौत हो गयी तो डॉक्टर के नर्सिंग होम में सारी कीमती मशीनों को चकनाचूर कर दो और डॉक्टर और उसके स्टाफ की जम कर धुनाई कर दो । जनता का यह व्यवहार कुछ विचित्र लगता है । हद तो तब हो जाती है जब अपना आक्रोश प्रदर्शित करने के लिये ये लोग आम जनता की सहूलियत और ज़रूरतों को पूरा करने के लिये वर्षों के प्रयासों और जद्दोजहद के बाद जैसे तैसे जुटायी गयी बुनियादी सेवाओं को अपनी वहशत का निशाना बनाते हैं ।
आम जनता के मन में यह भ्रांति गहराई तक जड़ें जमाये हुए है कि सारी रेलगाड़ियाँ, बसें या सरकारी इमारतें ‘सरकार’ की हैं जो कोई दूसरे पक्ष का व्यक्ति है और उसके सामान की तोड़ फोड़ करके वे अपना बदला निकाल सकते हैं । हम सभी यह जानते हैं कि हमारा देश अभी पूरी तरह से सुविधा सम्पन्न नहीं हुआ है । अभी भी किसी क्षेत्र की किसी ज़रूरत को पूरा करने के लिये सरकार को एड़ी चोटी का ज़ोर लगाना पड़ता है और उस सुविधा का उपभोग करने से पहले आम जनता को भारी मात्रा में टैक्स देकर धन जुटाने में अपना योगदान करना पड़ता है तब कहीं जाकर दो शहरों को जोड़ने के लिये किसी बस या किसी रेल की व्यवस्था हो पाती है या किसी शहर में बच्चों के लिये स्कूल या मरीज़ों के लिये किसी अस्पताल का निर्माण हो पाता है । लेकिन चन्द वहशी लोगों को उसे फूँक डालने में ज़रा सा भी समय नहीं लगता । अपने जुनून की वजह से वे अन्य तमाम नागरिकों की आवश्यक्ताओं की वस्तुओं को कैसे और किस हक से नुक्सान पहुँचा सकते हैं ? जो लोग इस तरह की असामाजिक गतिविधियों में लिप्त रहते हैं क्या वे कभी रेल से या बस से सफर नहीं करते ? अपने परिवार के बच्चों को स्कूलों में पढ़ने के लिये नहीं भेजते या फिर बीमार पड़ जाने पर उन्हें अस्पतालों की सेवाओं की दरकार नहीं होती ? फिर बुनियादी ज़रूरतों की इन सुविधाओं को क्षति पहुँचा कर वे किस तरह से एक ज़िम्मेदार नागरिक होने का दायित्व निभा रहे होते हैं ?
लोगों तक यह संदेश पहुँचना बहुत ज़रूरी है कि जिस सरकारी सम्पत्ति को वे नुक्सान पहुँचाते हैं वह जनता की सम्पत्ति है और उसके निर्माण के लिये उनकी खुद की भी गाढ़े पसीने की कमाई कर के रूप में जब सरकार के पास पहुँचती है तब ये सुविधायें अस्तित्व में आती हैं । इन के नष्ट हो जाने से पुन: इनकी ज़रूरत का शून्य बन जाता है और उसकी पूर्ति के लिये पुन: अतिरिक्त कर भार और उसके परिणामस्वरूप बढ़ने वाली मँहगाई का दुष्चक्र आरम्भ हो जाता है जिसका खामियाज़ा चन्द लोगों की ग़लतियों की वजह से सभी को भुगतना पड़ता है । यह नादानी कुछ इसी तरह की है कि घर में किसी बच्चे की नयी कमीज़ की छोटी सी माँग पूरी नहीं हुई तो वह अपने कपड़ों की पूरी अलमारी को ही आग के हवाले कर दे ।
इस समस्या के समाधान के लिये ज़रूरी है कि जन प्रतिनिधि अपने क्षेत्र के नागरिकों को केवल धरना प्रदर्शन का प्रशिक्षण ही ना दें वरन उनके कर्तव्यों के लिये भी उन्हें जागरूक और सचेत करें । नेता गण खुद भी धरना प्रदर्शन और हिंसा की राजनीति से परहेज़ करें और आम जनता के सामने संयमित और अनुशासित आचरण कर अच्छे उदाहरण प्रस्तुत करें ताकि जनता के बीच उद्देश्यपूर्ण संदेश प्रसारित हो । रेडियो और टी.वी. चैनल्स पर नागरिकों को इस दिशा में जागरूक करने के लिये समय समय पर संदेश प्रसारित किये जायें और मौके पर तोड़ फोड़ की असामाजिक गतिविधि में लिप्त पकड़े गये लोगों को कठोर दण्ड दिया जाये उन्हें सिर्फ चेतावनी देकर छोड़ा ना जाये । जब तक कड़े कदम नहीं उठाये जायेंगे हम इसी तरह पंगु बने हुए इन उपद्रवकारियों के हाथों का खिलौना बने रहेंगे ।
साधना वैद
Wednesday, May 27, 2009
तुम आओगे ना !
रात ने अपनी अधमुँदी आँखे खोली हैं
सुबह ने अपने डैने पसार अँगड़ाई ली है ।
नन्हे से सूरज ने प्रकृति माँ के आँचल से मुँह घुमा
संसार को अपनी उजली आँखों से देखा है ।
दूर पर्वत शिखरों पर देवताओं की रसोई में
सुर्ख लाल अँगीठी सुलग चुकी है ।
कल कल बहते झरनों का आल्हादमय संगीत
सबको आनंद और स्फूर्ति से भर गया है ।
सुदूर गगन में पंछियों की टोली पंख पसार
अनजाने अनचीन्हे लक्ष्य की ओर उड़ चली है ।
फूलों ने अपनी पाँखुरियों से ओस के मोती ढुलका
बाल अरुण को अपना मौन अर्घ्य दिया है ।
मेरे मन में भी एक मीठी सी आशा अकुलाई है
मेरे मन में भी उजालों ने धीरे से दस्तक दी है ।
मेरे मन ने भी पंख पसार आसमान में उड़ना चाहा है
मेरे कण्ठ में भी मीठी सी तान ने आकार लिया है ।
मेरी करुणा के स्वर तुम तक पहुँच तो जायेंगे ना !
झर झर बहते अश्रुबिन्दु का अर्घ्य तुम्हें स्वीकृत तो होगा !
मैंने अंतर की ज्वाला पर जो नैवेद्य बनाया है प्रियतम
उसे ग्रहण करने को तो तुम आओगे ना !
साधना वैद
सुबह ने अपने डैने पसार अँगड़ाई ली है ।
नन्हे से सूरज ने प्रकृति माँ के आँचल से मुँह घुमा
संसार को अपनी उजली आँखों से देखा है ।
दूर पर्वत शिखरों पर देवताओं की रसोई में
सुर्ख लाल अँगीठी सुलग चुकी है ।
कल कल बहते झरनों का आल्हादमय संगीत
सबको आनंद और स्फूर्ति से भर गया है ।
सुदूर गगन में पंछियों की टोली पंख पसार
अनजाने अनचीन्हे लक्ष्य की ओर उड़ चली है ।
फूलों ने अपनी पाँखुरियों से ओस के मोती ढुलका
बाल अरुण को अपना मौन अर्घ्य दिया है ।
मेरे मन में भी एक मीठी सी आशा अकुलाई है
मेरे मन में भी उजालों ने धीरे से दस्तक दी है ।
मेरे मन ने भी पंख पसार आसमान में उड़ना चाहा है
मेरे कण्ठ में भी मीठी सी तान ने आकार लिया है ।
मेरी करुणा के स्वर तुम तक पहुँच तो जायेंगे ना !
झर झर बहते अश्रुबिन्दु का अर्घ्य तुम्हें स्वीकृत तो होगा !
मैंने अंतर की ज्वाला पर जो नैवेद्य बनाया है प्रियतम
उसे ग्रहण करने को तो तुम आओगे ना !
साधना वैद
Sunday, May 24, 2009
यह कैसा विकास !
इक्कीसवीं सदी के इस मुकाम पर पहुँच कर हम गर्व से मस्तक ऊँचा कर खुद के पूरी तरह विकसित होने का ढिंढोरा पीटते तो दिखाई देते हैं लेकिन सच में हमें आत्म चिंतन की बहुत ज़रूरत है कि हम वास्तव में विकसित हो चुके हैं या विकसित होने का सिर्फ़ एक मीठा सा भ्रम पाले हुए हैं ।
विकास को सही अर्थों में नापने का क्या पैमाना होना चाहिये ? क्या आधुनिक और कीमती परिधान पहनने से ही कोई विकसित हो जाता है ? क्या परम्परागत जीवन शैली और नैतिकता को अमान्य कर पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण करने से ही कोई विकसित हो जाता है ? क्या सामाजिक मर्यादा और पारिवारिक मूल्यों की अवमानना कर विद्रोह की दुंदुभी बजाने का साहस दिखाने से ही कोई विकसित हो जाता है ? या फिर उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेने के दम्भ में अपने से पीछे छूट जाने वालों को हिक़ारत और तिरस्कार की दृष्टि से देखने वालों को विकसित माना जा सकता है ? या फिर अकूत धन दौलत जमा कर बड़े बड़े उद्योग खड़े कर समाज के चन्द चुनिन्दा धनाढ्य लोगों की श्रेणी में अपना स्थान सुनिश्चित कर लेने वालों को विकसित माना जा सकता है ? या फिर वे लोग विकसित हैं जिन्होंने विश्व के अनेकों शहरों में आलीशान कोठियाँ और बंगले बनवा रखे हैं और जो समाज के अन्य सामान्य वर्गों के साथ एक मंच पर खड़े होने में भी अपना अपमान समझते हैं ? आखिर हम विकास के किस माप दण्ड को न्यायोचित समझें ? यह तस्वीर भारत के ऐसे बड़े शहरों की है जहाँ समाज के सबसे सभ्य और सम्पन्न समझे जाने वाले लोग रहते हैं । लेकिन ऐसे ही विकसित और सभ्य लोगों के बीच जैसिका लाल हत्याकाण्ड, नैना साहनी हत्याकाण्ड, मधुमिता हत्याकाण्ड, बी. एम. डबल्यू काण्ड, शिवानी हत्याकाण्ड, निठारी काण्ड, आरुषी हत्याकाण्ड ऐसे ही और भी न जाने कितने अनगिनत जघन्य काण्ड कैसे घटित हो जाते हैं ? इन घटनाओं के जन्मदाता तो विकसित भारत का प्रतिनिधित्व करते जान पड़ते हैं । तो क्या ‘विकसित’ और ‘सभ्य’ भारतीयों की मानसिकता इतनी घिनौनी और ओछी है ? उनमें मानवीयता और सम्वेदनशीलता का इतना अभाव है कि इस तरह की लोमहर्षक और रोंगटे खड़े कर देने वाली वारदातें हो जाती हैं और बाकी सारे लोग निस्पृह भाव से मूक दर्शक बने देखते रहते हैं कुछ कर नहीं पाते । क़्या सभ्य होने की हमें यह कीमत चुकानी होगी ? तो क्या भौतिक सम्पन्नता को विकास का पैमाना मान लेना उचित होगा ?
भारत के छोटे शहरों की तस्वीर भी इससे कुछ अलग नहीं है । सभ्य और सुसंस्कृत होने का दम्भ हमारे छोटे शहरों के लोगों को भी कम नहीं है और विकास का झंडा वे भी बड़ी
शान से उठाये फिरते हैं । लेकिन यहाँ अशिक्षा, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और सड़ी गली रूढ़ियों ने अपनी जड़ें इतनी मजबूती से जमा रखी हैं कि आसानी से उन्हें उखाड़ फेंकना सम्भव नहीं है । शायद इसीलिये यहाँ 21वीं सदी के इस दौर में भी जात पाँत और छूत अछूत का भेद भाव आज भी मौजूद है । आज भी यहाँ सवर्णो द्वारा किसी दलित युवती को निर्वस्त्र कर गाँव में परेड करायी जाती है तो सारा गाँव दम साधे चुप चाप यह अनर्थ होते देखता रहता है विरोध का एक भी स्वर नहीं फूटता । आज भी यहाँ ठाकुरों की बारात में यदि कोई दलित सहभोज में साथ में बैठ कर खाना खा लेता है तो उसे सरे आम गोली मार दी जाती है । आज भी यहाँ अबोध बालिकायें वहशियों की हवस का शिकार होती रहती हैं और थोड़ी सी जमीन या दौलत के लिये पुत्र पिता का या भाई भाई का खून कर देता है । तो फिर हम कैसे खुद को सभ्य और विकसित मान सकते हैं ? हमें आत्म चिंतन की सच में बहुत ज़रूरत है । विकास भौतिक साधनों को जुटा लेने से नहीं आ जाता । अपने विचारों से हम कितने शुद्ध हैं, अपने आचरण से हम कितने सात्विक हैं, और दूसरों की पीड़ा से हमारा दिल कितना पसीजता है यह विचारणीय होना चाहिये । अपने अंतर में झाँक कर देखने की ज़रूरत है कि निज स्वार्थों को परे सरका कर हम दूसरों के हित के लिये कितने प्रतिबद्ध हैं, कितने समर्पित हैं । सही अर्थ में विकसित कहलाने के लिये मानसिक रूप से समृद्ध और सम्पन्न होना नितांत आवश्यक है और इसके लिये ज़रूरी है कि हम अपनी सोच को बदलें , अपने आचरण को बदलें और एक बेहतर समाज की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में कृत संकल्प हो जायें ।
साधना वैद
विकास को सही अर्थों में नापने का क्या पैमाना होना चाहिये ? क्या आधुनिक और कीमती परिधान पहनने से ही कोई विकसित हो जाता है ? क्या परम्परागत जीवन शैली और नैतिकता को अमान्य कर पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण करने से ही कोई विकसित हो जाता है ? क्या सामाजिक मर्यादा और पारिवारिक मूल्यों की अवमानना कर विद्रोह की दुंदुभी बजाने का साहस दिखाने से ही कोई विकसित हो जाता है ? या फिर उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेने के दम्भ में अपने से पीछे छूट जाने वालों को हिक़ारत और तिरस्कार की दृष्टि से देखने वालों को विकसित माना जा सकता है ? या फिर अकूत धन दौलत जमा कर बड़े बड़े उद्योग खड़े कर समाज के चन्द चुनिन्दा धनाढ्य लोगों की श्रेणी में अपना स्थान सुनिश्चित कर लेने वालों को विकसित माना जा सकता है ? या फिर वे लोग विकसित हैं जिन्होंने विश्व के अनेकों शहरों में आलीशान कोठियाँ और बंगले बनवा रखे हैं और जो समाज के अन्य सामान्य वर्गों के साथ एक मंच पर खड़े होने में भी अपना अपमान समझते हैं ? आखिर हम विकास के किस माप दण्ड को न्यायोचित समझें ? यह तस्वीर भारत के ऐसे बड़े शहरों की है जहाँ समाज के सबसे सभ्य और सम्पन्न समझे जाने वाले लोग रहते हैं । लेकिन ऐसे ही विकसित और सभ्य लोगों के बीच जैसिका लाल हत्याकाण्ड, नैना साहनी हत्याकाण्ड, मधुमिता हत्याकाण्ड, बी. एम. डबल्यू काण्ड, शिवानी हत्याकाण्ड, निठारी काण्ड, आरुषी हत्याकाण्ड ऐसे ही और भी न जाने कितने अनगिनत जघन्य काण्ड कैसे घटित हो जाते हैं ? इन घटनाओं के जन्मदाता तो विकसित भारत का प्रतिनिधित्व करते जान पड़ते हैं । तो क्या ‘विकसित’ और ‘सभ्य’ भारतीयों की मानसिकता इतनी घिनौनी और ओछी है ? उनमें मानवीयता और सम्वेदनशीलता का इतना अभाव है कि इस तरह की लोमहर्षक और रोंगटे खड़े कर देने वाली वारदातें हो जाती हैं और बाकी सारे लोग निस्पृह भाव से मूक दर्शक बने देखते रहते हैं कुछ कर नहीं पाते । क़्या सभ्य होने की हमें यह कीमत चुकानी होगी ? तो क्या भौतिक सम्पन्नता को विकास का पैमाना मान लेना उचित होगा ?
भारत के छोटे शहरों की तस्वीर भी इससे कुछ अलग नहीं है । सभ्य और सुसंस्कृत होने का दम्भ हमारे छोटे शहरों के लोगों को भी कम नहीं है और विकास का झंडा वे भी बड़ी
शान से उठाये फिरते हैं । लेकिन यहाँ अशिक्षा, अंधविश्वास, पूर्वाग्रह और सड़ी गली रूढ़ियों ने अपनी जड़ें इतनी मजबूती से जमा रखी हैं कि आसानी से उन्हें उखाड़ फेंकना सम्भव नहीं है । शायद इसीलिये यहाँ 21वीं सदी के इस दौर में भी जात पाँत और छूत अछूत का भेद भाव आज भी मौजूद है । आज भी यहाँ सवर्णो द्वारा किसी दलित युवती को निर्वस्त्र कर गाँव में परेड करायी जाती है तो सारा गाँव दम साधे चुप चाप यह अनर्थ होते देखता रहता है विरोध का एक भी स्वर नहीं फूटता । आज भी यहाँ ठाकुरों की बारात में यदि कोई दलित सहभोज में साथ में बैठ कर खाना खा लेता है तो उसे सरे आम गोली मार दी जाती है । आज भी यहाँ अबोध बालिकायें वहशियों की हवस का शिकार होती रहती हैं और थोड़ी सी जमीन या दौलत के लिये पुत्र पिता का या भाई भाई का खून कर देता है । तो फिर हम कैसे खुद को सभ्य और विकसित मान सकते हैं ? हमें आत्म चिंतन की सच में बहुत ज़रूरत है । विकास भौतिक साधनों को जुटा लेने से नहीं आ जाता । अपने विचारों से हम कितने शुद्ध हैं, अपने आचरण से हम कितने सात्विक हैं, और दूसरों की पीड़ा से हमारा दिल कितना पसीजता है यह विचारणीय होना चाहिये । अपने अंतर में झाँक कर देखने की ज़रूरत है कि निज स्वार्थों को परे सरका कर हम दूसरों के हित के लिये कितने प्रतिबद्ध हैं, कितने समर्पित हैं । सही अर्थ में विकसित कहलाने के लिये मानसिक रूप से समृद्ध और सम्पन्न होना नितांत आवश्यक है और इसके लिये ज़रूरी है कि हम अपनी सोच को बदलें , अपने आचरण को बदलें और एक बेहतर समाज की परिकल्पना को साकार करने की दिशा में कृत संकल्प हो जायें ।
साधना वैद
Wednesday, May 13, 2009
विश्वासघात या अवसरवाद
चुनाव चक्र अपने अंतिम पड़ाव पर पहुँच रहा है और अब एक नये दुष्चक्र के आरम्भ का सूत्रपात होने जा रहा है । मंत्रीमंडल में अपनी कुर्सी सुरक्षित करने के लिये सांसदों की खरीद फरोख्त और जोड़ तोड़ का लम्बा सिलसिला शुरु होगा और आम जनता ठगी सी निरुपाय यह सब देख कर अपना सिर धुनती रहेगी । व्यक्तिगत स्तर पर चुनाव लड़ने वाले निर्दलीय प्रत्याशियों और छोटी मोटी क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं का वर्चस्व रहेगा । उनकी सबसे मँहगी बोली लगेगी और सत्ता लोलुप और सिद्धांतविहीन राजनीति करने वाले आयाराम गयारामों की पौ बारह होगी |
नेताओं के प्रति विश्वास और सम्मान आम आदमी के मन से इस तरह धुल पुँछ गया है कि गिने चुने अपवादों को छोड़ दिया जाये तो किसी भी नेता के नाम पर मतदाता को मतदान केंद्रों तक खींच कर लाना असम्भव है । आज भी मतदाता पार्टी के नाम पर अपना वोट देता है और पार्टी के घोषणा पत्र पर भरोसा करता है । लेकिन यही सिद्धांतविहीन नेता चुनाव जीतने के बाद आम जनता के विश्वास का गला घोंट कर और पार्टी विशेष की सारी नीतियों के प्रति अपनी निष्ठाओं की बलि चढ़ा कर कुर्सी के पीछे पीछे सम्मोहित से हर इतर किस्म के समझौते करते दिखाई देते हैं तो आम जनता की वितृष्णा की कोई सीमा नहीं रहती । मतदान के प्रति लोगों की उदासीनता का एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि लोगों के मन में निराशा ने इस तरह से जड़ें जमा ली हैं कि किसी भी तरह के सकारात्मक बदलाव का आश्वासन उन्हें आकर्षित और उद्वेलित नहीं कर पाता । तुलसीदास की पंक्तियाँ आज के राजनैतिक परिदृश्य में उन्हें अधिक सटीक लगती है-
कोई नृप होहि हमहुँ का हानि
चेरी छोड़ि ना होवहिं रानी ।।
जनता की इस निस्पृहता को कैसे दूर किया जाये , उनके टूटे मनोबल को कैसे सम्हाला जाये और नेताओं की दिन दिन गिरती साख को कैसे सुधारा जायें ये आज के युग के ऐसे यक्ष प्रश्न हैं जिनके उत्तर शायद आज किसी युधिष्ठिर के पास नहीं हैं ।
इन समस्याओं को विराम देने के लिये एक विकल्प जो समझ में आता है वह यह है कि देश में सिर्फ दो ही पार्टीज़ होनी चाहिये । अन्य सभी छोटी मोटी और क्षेत्रीय पार्टियों का इन्हीं दो पार्टियों में विलय हो जाना चाहिये । जो पार्टी चुनाव में बहुमत से जीते वह सरकार का गठन करे और दूसरी पार्टी एक ज़िम्मेदार और सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभाये । इस कदम से सांसदों की खरीद फरोख्त पर रोक लगेगी और अवसरवादी नेताओं की दाल नहीं गल पायेगी । इसके अलावा संविधान में इस बात का प्रावधान होना चाहिये कि चुनाव के बाद प्रत्याशी पार्टी ना बदल सके और जिस पार्टी के झंडे तले उसने चुनाव जीता है उस पार्टी के प्रति अगले चुनाव तक वह् निष्ठावान रहे । यदि किसी तरह का मतभेद पैदा होता है तो भी वह पार्टी में रह कर ही उसे दूर करने की कोशिश करे । पार्टी छोड़ने का विकल्प उसके पास होना ही नहीं चाहिये । तभी नेताओं की निष्ठा के प्रति लोगों में कुछ विश्वास पैदा हो सकेगा और पार्टीज़ की कार्यकुशलता के बारे में लोग आश्वस्त हो सकेंगे । इस तरह के उपाय करने से जनता स्वयम को छला हुआ महसूस नहीं करेगी और राजनेताओं और राजनीति का जो पतन और ह्रास इन दिनों हुआ है उसे और गर्त में जाने से रोका जा सकेगा और उसकी मरणासन्न साख को पुनर्जीवित किया जा सकेगा ।
साधना वैद
नेताओं के प्रति विश्वास और सम्मान आम आदमी के मन से इस तरह धुल पुँछ गया है कि गिने चुने अपवादों को छोड़ दिया जाये तो किसी भी नेता के नाम पर मतदाता को मतदान केंद्रों तक खींच कर लाना असम्भव है । आज भी मतदाता पार्टी के नाम पर अपना वोट देता है और पार्टी के घोषणा पत्र पर भरोसा करता है । लेकिन यही सिद्धांतविहीन नेता चुनाव जीतने के बाद आम जनता के विश्वास का गला घोंट कर और पार्टी विशेष की सारी नीतियों के प्रति अपनी निष्ठाओं की बलि चढ़ा कर कुर्सी के पीछे पीछे सम्मोहित से हर इतर किस्म के समझौते करते दिखाई देते हैं तो आम जनता की वितृष्णा की कोई सीमा नहीं रहती । मतदान के प्रति लोगों की उदासीनता का एक सबसे बड़ा कारण यह भी है कि लोगों के मन में निराशा ने इस तरह से जड़ें जमा ली हैं कि किसी भी तरह के सकारात्मक बदलाव का आश्वासन उन्हें आकर्षित और उद्वेलित नहीं कर पाता । तुलसीदास की पंक्तियाँ आज के राजनैतिक परिदृश्य में उन्हें अधिक सटीक लगती है-
कोई नृप होहि हमहुँ का हानि
चेरी छोड़ि ना होवहिं रानी ।।
जनता की इस निस्पृहता को कैसे दूर किया जाये , उनके टूटे मनोबल को कैसे सम्हाला जाये और नेताओं की दिन दिन गिरती साख को कैसे सुधारा जायें ये आज के युग के ऐसे यक्ष प्रश्न हैं जिनके उत्तर शायद आज किसी युधिष्ठिर के पास नहीं हैं ।
इन समस्याओं को विराम देने के लिये एक विकल्प जो समझ में आता है वह यह है कि देश में सिर्फ दो ही पार्टीज़ होनी चाहिये । अन्य सभी छोटी मोटी और क्षेत्रीय पार्टियों का इन्हीं दो पार्टियों में विलय हो जाना चाहिये । जो पार्टी चुनाव में बहुमत से जीते वह सरकार का गठन करे और दूसरी पार्टी एक ज़िम्मेदार और सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभाये । इस कदम से सांसदों की खरीद फरोख्त पर रोक लगेगी और अवसरवादी नेताओं की दाल नहीं गल पायेगी । इसके अलावा संविधान में इस बात का प्रावधान होना चाहिये कि चुनाव के बाद प्रत्याशी पार्टी ना बदल सके और जिस पार्टी के झंडे तले उसने चुनाव जीता है उस पार्टी के प्रति अगले चुनाव तक वह् निष्ठावान रहे । यदि किसी तरह का मतभेद पैदा होता है तो भी वह पार्टी में रह कर ही उसे दूर करने की कोशिश करे । पार्टी छोड़ने का विकल्प उसके पास होना ही नहीं चाहिये । तभी नेताओं की निष्ठा के प्रति लोगों में कुछ विश्वास पैदा हो सकेगा और पार्टीज़ की कार्यकुशलता के बारे में लोग आश्वस्त हो सकेंगे । इस तरह के उपाय करने से जनता स्वयम को छला हुआ महसूस नहीं करेगी और राजनेताओं और राजनीति का जो पतन और ह्रास इन दिनों हुआ है उसे और गर्त में जाने से रोका जा सकेगा और उसकी मरणासन्न साख को पुनर्जीवित किया जा सकेगा ।
साधना वैद
Friday, May 8, 2009
दोषी कौन ?
चुनाव का चौथा चरण भी बीत गया । बड़े दुख की बात है कि मतदान का प्रतिशत अभी तक जस का तस है । लोगों को ‘जगाने’ के सारे भागीरथ प्रयत्न विफल हो गये । लेकिन उससे भी बडे दुख की बात यह है कि जो ‘जाग’ गये थे उनको हमारे अकर्मण्य तंत्र की खोखली अफसरी ने दोबारा ‘सोने’ के लिये मजबूर कर दिया ।
जिस दिन से चुनाव की घोषणा हुई थी मतदाता सूचियों के सुधारे जाने और उनका नवीनीकरण किये जाने का एक ‘वृहद कार्यक्रम’ चलाया गया । कई दिनों तक दिन में शांति से बैठ नहीं सके कि कभी फोटो चाहिये तो कभी पासपोर्ट की कॉपी तो कभी ड्राइविंग लाइसेंस की कॉपी तो कभी परिवार के सारे सदस्यों के विस्तृत वृत्तांत कि कौन कहाँ रहता है और उसकी आयु क्या है आदि आदि । हमने भी बडे धैर्य के साथ उन्हें पूरा सहयोग दिया और सभी वांछित जानकारी उन्हें उपलब्ध कराई इस आशा के साथ कि इस बार तो बड़ी मुस्तैदी से काम हो रहा है और इस बार के चुनाव के साथ अवश्य ही बदलाव की सुख बयार बहेगी और भारतीय लोकतंत्र की जीर्ण शीर्ण काया का अकल्पनीय रूप से सशक्तिकरण हो जायेगा । लेकिन कल बड़ी कोफ्त हुई जब मतदाता सूची में अपना नाम ढूँढने में हमें बड़ी मशक्कत करनी पड़ी और उससे भी ज़्यादह कोफ्त शाम को हुई जब टी.वी. पर कई लोगों को अपना दर्द बयान करते देखा कि मतदाता सूची में नाम नहीं मिलने की वजह से उन्हें वोट नहीं डालने दिया गया । अपने मताधिकार से वंचित रहने वालों में एक बडी संख्या अशिक्षित मतदाताओं की थी । व्यवस्था में इतनी बड़ी चूक के लिये आप किसे दोष देंगे ? मतदाता सूचियों में सुधार की प्रक्रिया का प्रदर्शन क्या दिखावा भर था ? कई लोग अपना फोटो पहचान पत्र भी दिखा रहे थे लेकिन क्योंकि सूची में नाम नहीं था इसलिये उन्हें वोट नहीं डालने दिया गया । जहाँ इतनी लचर व्यवस्था हो और उनकी ‘कार्यकुशलता’ के आधार पर नियमों का अनुपालन हो वहाँ सुधार की गुंजाइश कहाँ रह जाती है !
मतदान केन्द्रों पर एक ऐसे निष्पक्ष अधिकारी को नियुक्त करना चाहिये जो स्वविवेक से यह निर्णय ले सके कि निकम्मी व्यवस्था के शिकार ऐसे लोग किस तरह से अपने मताधिकार का प्रयोग करें और उन्हें अपने बुनियादी अधिकार से वंचित रहने का दंश ना झेलना पड़े । भारत जैसे विशाल देश में जहाँ एक बड़ी संख्या में अशिक्षित मतदाता हैं शासन तंत्र को उनका छोटे बच्चों की तरह ध्यान रखने की ज़रूरत है । छिद्रांवेषण कर उनको वोट देने से रोकने से काम नहीं चलेगा ज़रूरत इस बात की है कि तत्काल वहीं के वहीं उन कमियों को दूर करने के विकल्प तलाशे जायें और उन्हें भी नई सरकार के निर्माण में अपना अनमोल योगदान देने के गौरव को अनुभव करने दिया जाये । चुनाव का अभी भी अंतिम चरण बाकी है । शायद चुनाव आयोग इस ओर ध्यान देगा ।
साधना वैद
जिस दिन से चुनाव की घोषणा हुई थी मतदाता सूचियों के सुधारे जाने और उनका नवीनीकरण किये जाने का एक ‘वृहद कार्यक्रम’ चलाया गया । कई दिनों तक दिन में शांति से बैठ नहीं सके कि कभी फोटो चाहिये तो कभी पासपोर्ट की कॉपी तो कभी ड्राइविंग लाइसेंस की कॉपी तो कभी परिवार के सारे सदस्यों के विस्तृत वृत्तांत कि कौन कहाँ रहता है और उसकी आयु क्या है आदि आदि । हमने भी बडे धैर्य के साथ उन्हें पूरा सहयोग दिया और सभी वांछित जानकारी उन्हें उपलब्ध कराई इस आशा के साथ कि इस बार तो बड़ी मुस्तैदी से काम हो रहा है और इस बार के चुनाव के साथ अवश्य ही बदलाव की सुख बयार बहेगी और भारतीय लोकतंत्र की जीर्ण शीर्ण काया का अकल्पनीय रूप से सशक्तिकरण हो जायेगा । लेकिन कल बड़ी कोफ्त हुई जब मतदाता सूची में अपना नाम ढूँढने में हमें बड़ी मशक्कत करनी पड़ी और उससे भी ज़्यादह कोफ्त शाम को हुई जब टी.वी. पर कई लोगों को अपना दर्द बयान करते देखा कि मतदाता सूची में नाम नहीं मिलने की वजह से उन्हें वोट नहीं डालने दिया गया । अपने मताधिकार से वंचित रहने वालों में एक बडी संख्या अशिक्षित मतदाताओं की थी । व्यवस्था में इतनी बड़ी चूक के लिये आप किसे दोष देंगे ? मतदाता सूचियों में सुधार की प्रक्रिया का प्रदर्शन क्या दिखावा भर था ? कई लोग अपना फोटो पहचान पत्र भी दिखा रहे थे लेकिन क्योंकि सूची में नाम नहीं था इसलिये उन्हें वोट नहीं डालने दिया गया । जहाँ इतनी लचर व्यवस्था हो और उनकी ‘कार्यकुशलता’ के आधार पर नियमों का अनुपालन हो वहाँ सुधार की गुंजाइश कहाँ रह जाती है !
मतदान केन्द्रों पर एक ऐसे निष्पक्ष अधिकारी को नियुक्त करना चाहिये जो स्वविवेक से यह निर्णय ले सके कि निकम्मी व्यवस्था के शिकार ऐसे लोग किस तरह से अपने मताधिकार का प्रयोग करें और उन्हें अपने बुनियादी अधिकार से वंचित रहने का दंश ना झेलना पड़े । भारत जैसे विशाल देश में जहाँ एक बड़ी संख्या में अशिक्षित मतदाता हैं शासन तंत्र को उनका छोटे बच्चों की तरह ध्यान रखने की ज़रूरत है । छिद्रांवेषण कर उनको वोट देने से रोकने से काम नहीं चलेगा ज़रूरत इस बात की है कि तत्काल वहीं के वहीं उन कमियों को दूर करने के विकल्प तलाशे जायें और उन्हें भी नई सरकार के निर्माण में अपना अनमोल योगदान देने के गौरव को अनुभव करने दिया जाये । चुनाव का अभी भी अंतिम चरण बाकी है । शायद चुनाव आयोग इस ओर ध्यान देगा ।
साधना वैद
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