Followers

Thursday, October 22, 2009

कुछ तो करूँ

थी चाह्त उजालों की मुझको बहुत
अँधेरा जगत का मिटाना जो था ।
दिये तो जलाये थे मैने बहुत
एक शमा रौशनी की जला ना सकी ।
थी चाहत कि महकाऊँ सारा चमन
बहा दूँ एक खुशबू का दरिया यहाँ ।
बगीचे लगाये थे मैने बहुत
एक कली प्यार की भी खिला ना सकी ।
था रस्ता कठिन दूर मंज़िल बहुत
थी चाह्त कि तुम साथ देते मेरा
सदायें तो पहुँचीं बहुत दूर तक
एक तुम्हें पास ही से बुला ना सकी ।
मैं कुछ तो करूँ कि अन्धेरा मिटे
मेरे चार सूँ ज़िन्दगी मुस्कुराये ।
मिटे दिल की नफरत खिलें सुख की कलियाँ
मोहब्बत की खुशबू चमन को सजाये ।
हो दिल में सुकूँ और लबों पर तराने
खुशी की लहर से जहाँ जगमगाये ।
हर एक आँख में एक उजली किरन हो
हर एक लफ्ज़ उल्फत का पैग़ाम लाये ।
अकेली हूँ मैं तुम चलो साथ मेरे
है मुश्किल डगर अब चला भी ना जाये ।
है हसरत यही कि मैं जब भी पुकारूँ
मेरी एक सदा पर जहाँ साथ आये |

साधना वैद

Friday, October 2, 2009

बी.पी.एल. से नीचे रहने वालों के लिये आवासीय योजना में गम्भीर भूलें

भारत में जनसंख्या की अधिकता की वजह से आवासीय समस्या बहुत गम्भीर होती जा रही है । गाँवों की अपेक्षा शहरों में यह समस्या और अधिक विकराल रूप धारण कर चुकी है । इस समस्या का दुष्परिणाम भारत की ग़रीब जनता को सबसे अधिक भोगना पड़ता है क्योंकि रोज़गार की तलाश में अपना घर छोड़ कर शहरों की ओर पलायन करना उनकी विवशता है और इस कारण रहने के लिये उचित व्यवस्था के ना होने से उन्हें अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है । समय समय पर प्रदेश की सरकार तथा केंद्र सरकार ने ग़रीबी की रेखा से नीचे रहने वाले भारतीयों के लिये आवासीय सुविधा उपलब्ध कराने के असफल प्रयास किये हैं लेकिन वे मकान अंतत: या तो घोटालेबाजों की भेंट चढ़ गये या केवल काग़ज़ों में ही सिमट कर रह गये और कभी यथार्थ में आकार नहीं ले सके । इन योजनाओं के क्रियान्वयन में कई गम्भीर भूलें संज्ञान में आती हैं जिनको निजी स्वार्थों के कारण सम्बन्धित अधिकारियों के द्वारा या तो जानबूझ कर नज़र अन्दाज़ किया गया है या यह उनकी अदूरदर्शिता का ज्वलंत उदाहरण हैं ।
ग़रीब जनता को सस्ते मकान मिल सकें या उन्हें कम दरों पर सस्ते भूमि के टुकड़े मिल सकें इसके लिये सरकार ने कई योजनायें लागू कीं लेकिन उनके त्रुटिपूर्ण होने की वजह से उनका लाभ ऐसे लोगों ने उठाया जो किसी भी तरह से इसके अधिकारी नहीं थे । व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार के चलते उन व्यक्तियों तक तो योजना की सूचना सही तरीके से पहुँची ही नहीं जो वास्तव में इसके हक़दार थे । प्लॉट्स के आवंटन में अनेकों धाँधलियाँ हुईं जैसे पैसे और रुतबेदार लोगों के नाते रिश्तेदार फर्ज़ी नामों का सहारा लेकर ग़रीबों के लिये सुरक्षित की गयी ज़मीन हथियाने में कामयाब हो गये । जो स्थान ग़रीबों की रिहाइशी मकानों के लिये सुरक्षित किये गये थे उन स्थानों पर ग़रीबों के लिये मकान बनाने की जगह शॉपिंग मॉल या बहुमंज़िला इमारतें बन गयीं । कुछ भाग्यशाली लोग जो प्लॉट या ज़मीन खरीदने में कामयाब हो गये वे उन्हें अधिक समय तक अपने पास रोक नहीं पाये । मकान खरीदने की कोशिश में अपनी सारी जमा पूँजी खर्च कर देने के बाद किसी को दाल रोटी के भी लाले पड़ गये तो किसी को अपना कर्ज़ उतारने के लिये धन की आवश्यक्ता हो गयी । क़िसी को इलाज के लिये पैसों की ज़रूरत थी तो किसीको घर में बहन बेटी के ब्याह के लिये धन जुटाने की ज़रूरत आन पड़ी । ऐसे में उनके पास सबसे सहज सुलभ विकल्प इन मकानों या ज़मीन का ही था जो उन्होंने सस्ते दरों पर सरकार से खरीदे थे । भू माफियाओं ने इनकी मजबूरी का फायदा उठाया और थोड़े से ज़्यादह पैसे देकर इनके मकान और प्लॉट्स इनसे खरीद लिये । इस प्रकार मकानों और ज़मीन का मालिकाना हक़ ग़रीबों को दे देना दूसरी सबसे बड़ी भूल साबित हुई । ग़रीबों की इस मजबूरी का फायदा भी पैसे वाले रुतबेदार लोगों ने उठाया और उनके हिस्से की ज़मीन औने पौने दामों में भूमाफियाओं के अधिग्रहण में चली गयी । जिन थोड़े से लोगों ने अपने मकान नहीं बेचे उन्हें लालच देकर या डरा धमका कर उनकी ज़मीनें और मकान हथिया लिये गये और यह सारा तमाशा सरकारी अधिकारी तटस्थ भाव से चुपचाप देखते रहे क्योंकि इस सारे तमाशे को देखने की कीमत उनके लिये कोई और अदा कर रहा था ।
जनता को राहत देने की सरकार की सारी कोशिशें इस तरह नाकामयाब नहीं होतीं यदि थोड़ी सी दूरदर्शिता और समझदारी से काम लिया जाता । ग़रीबों के हित में काम करना बहुत अच्छी बात है । लेकिन यह नहीं भूलना चाहिये कि ग़रीब और मजबूर व्यक्ति के पास यदि पैसे प्राप्त करने का छोटे से छोटा भी विकल्प होगा तो वह बिना सोचे समझे उसे इस्तेमाल कर लेगा । भारत जैसे ग़रीब देश में जहाँ चन्द रुपयों के लिये लोग अपनी संतान तक बेच डालते हैं वहाँ घर क्या चीज़ है । होना यह चाहिये कि सस्ते मकान बना कर सरकार को ग़रीब लोगों को न्यूनतम किराये पर उन्हें रहने के लिये देना चाहिये । वे जब तक चाहें वहाँ रह सकें लेकिन उन्हें बेचने या अन्य किसीको किराये पर देने का हक़ उन्हें नहीं होना चाहिये । यदि कोई मकान छोड़ कर जाना चाहे तो वह मकान किसी और को आवंटित किया जा सके यह प्रावधान होना चाहिये । अपनी मेहनत और बुद्धिबल से यदि कोई इतनी तरक्की कर लेता है कि वह ग़रीबी की रेखा से ऊपर निकल जाता है तो उसे इन मकानों को छोड कर जाने के लिये कहा जा सकता है । ग़रीबों के लिये बनाये जाने वाले इन मकानों में सभी बुनियादी आवश्यक्ताओं का ध्यान रखा जाना चाहिये लेकिन ये मज़बूत, सदगीपूर्ण और सस्ते होने चाहिये । मकान जितने मँहगे बनाने की कोशिश की जायेगी भ्रष्टाचार के लिये उतने ही रास्ते खुलेंगे । मकानों के पास बच्चों के लिये पार्क, स्कूल और अस्पताल जैसी सुविधायें समीप ही उपलब्ध हों इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिये ।
ग़रीबी की रेखा से नीचे रहने वाली जनता के पास जब बिना किसी बाधा के रहने के लिये मकान की सुविधा उपलब्ध हो जायेगी तो वह तनावरहित होकर एकाग्र चित्त से अपने काम पर ध्यान केन्द्रित कर सकेगा । भूमाफियाओं का भय भी उसे नहीं होगा और अनधिकृत भू अधिग्रहण की समस्या से भी छुटकारा मिल सकेगा । शहर के विकास की योजना में भी इस तरह की अवांछनीय निर्माण की बाधायें सामने नहीं आयेंगी और भारत के शहर भी दर्शनीय हो जायेंगे ।
साधना वैद

Thursday, October 1, 2009

सोचती हूँ

सोचती हूँ
जो आँसू तुमने मुझे दिये
उन्हें एक दिन में बहा देना तो सम्भव नहीं
इसलिये एक सागर अपने मन में ही
क्यों ना रच लूँ ।
सोचती हूँ
जो दु:ख तुमने मुझे दिये
उन्हें एक पल में उतार फेंकना तो मुमकिन नहीं
इसलिये एक हिमालय अपने अंतर में ही
क्यों ना समेट लूँ ।
सोचती हूँ
जो यादें तुमने मुझे दीं
उन्हें पल भर में फूँक मार कर बुझा देना तो आसाँ नहीं
इसलिये एक ज्वालामुखी अपने हृदय में ही
क्यों ना प्रज्ज्वलित कर लूँ ।
सोचती हूँ
जो दंश तुमने मुझे दिये
उनकी चुभन से मुक्ति मिलना तो सम्भव नहीं
इसलिये पैने कैक्टसों का एक बागीचा अपने दिल में ही
क्यों ना खिला लूँ ।
चाहती हूँ
काश तुम जान पाते
तुमसे मिली इन छोटी छोटी दौलतों ने
मुझे कितना समृद्ध कर दिया है
कि मैं इस सारी कायनात को अपने अंतर में समेटे
जन्म जन्मांतर तक ऐसे ही जीती रहूँगी ।
काश तुम भी तो कभी पीछे मुड़ कर देखते
कि इस तरह से दौलतमन्द होने का अहसास
कैसा होता है ।


साधना वैद

Monday, September 14, 2009

टुकड़ा टुकड़ा आसमान

अपने सपनों को नई ऊँचाई देने के लिये
मैंने बड़े जतन से टुकड़ा टुकडा आसमान जोडा था
तुमने परवान चढ़ने से पहले ही मेरे पंख
क्यों कतर दिये माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने भविष्य को खूबसूरत रंगों से चित्रित करने के लिये
मैने क़तरा क़तरा रंगों को संचित कर
एक मोहक तस्वीर बनानी चाही थी
तुमने तस्वीर पूरी होने से पहले ही
उसे पोंछ क्यों डाला माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने जीवन को सुख सौरभ से सुवासित करने के लिये
मैंने ज़र्रा ज़र्रा ज़मीन जोड़
सुगन्धित सुमनों के बीज बोये थे
तुमने उन्हें अंकुरित होने से पहले ही
समूल उखाड़ कर फेंक क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
अपने नीरस जीवन की शुष्कता को मिटाने के लिये
मैंने बूँद बूँद अमृत जुटा उसे
अभिसिंचित करने की कोशिश की थी
तुमने उस कलश को ही पद प्रहार से
लुढ़का कर गिरा क्यों दिया माँ ?
क्या सिर्फ इसलिये कि मैं एक बेटी हूँ ?
और अगर हूँ भी तो क्या यह दोष मेरा है ?

साधना वैद

Saturday, September 5, 2009

शिक्षक दिवस – आत्म चिंतन की महती आवश्यक्ता

शिक्षक दिवस पर उन सभी विभूतियों को मेरा हार्दिक नमन और अभिनन्दन है जिन्होंने विद्यादान के पावन कर्तव्य के निर्वहन के लिये अपना सारा जीवन समर्पित कर दिया । नि:सन्देह रूप से यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण और वन्दनीय कार्य है एवम् इसे वही कर सकता है जो पूर्ण रूप से निर्वैयक्तिक हो चुका हो और जिसने अपने जीवन का ध्येय ही अनगढ़ पत्थरों को तराश कर अनमोल हीरों में परिवर्तित कर देने का बना लिया हो । जैसे एक मूर्तिकार कच्ची माटी को गूँध कर अनुपम मूर्तियों का निर्माण करता है उसी तरह एक सच्चा शिक्षक बच्चों के मन मस्तिष्क की कोरी स्लेट पर पुस्तकीय ज्ञान के अलावा अच्छे संस्कार और उचित जीवन मूल्यों की परिभाषा इतनी गहराई से उकेर देता है जिसे जीवन पर्यंत कोई मिटा नही पाता । एक समाजोपयोगी व्यक्तित्व का बीजारोपण एक शिक्षक बालक के मन में बचपन में ही कर सकता है यदि यह लक्ष्य उसकी प्राथमिकताओं में शामिल हो ।
वर्तमान परिदृश्य में समर्पण का ऐसा भाव विरले महापुरुषों में ही देखने को मिलता है । आज के युग में शिक्षक सरस्वती के उपासक नहीं रह गये हैं वे तो अब लक्ष्मी की तरफ अधिक आकृष्ट हो गये हैं । शिक्षा का क्षेत्र अब व्यावसायिक हो गया है और शिक्षादान अब धनोपार्जन का अच्छा विकल्प माना जाने लगा है । शिक्षक और छात्रों में परस्पर सम्बन्ध भी अब उतने पावन और वात्सल्यपूर्ण नहीं रह गये हैं जितने होने चाहिये । वरना दण्ड देने के नाम पर बच्चों के साथ अमानवीयता की हद तक अत्याचार करने के प्रसंग सामने नहीं आते । मेरा आज का यह आलेख ऐसे ही शिक्षकों को समर्पित है जो पूरा वेतन तो वसूल कर लेते हैं लेकिन बच्चों को पढ़ाने के लिये कभी स्कूल नहीं जाते , जो बच्चों के साथ हद दर्ज़े की बदसलूकी करते हैं और उनका निजी हितों के लिये शोषण करने से ज़रा भी नहीं हिचकते , जो बच्चों के लिये दी गयी अनुदान राशि को खुद हड़प कर जाते हैं और जिन्हें बच्चों को बासी , विषाक्त भोजन खिलाते समय ईश्वर का भय भी नहीं सताता ।
क्या ऐसे शिक्षक सचमुच नमन के योग्य हैं ? क्या आज शिक्षक दिवस के दिन ऐसे शिक्षकों को चिन्हित करके उनकी सार्वजनिक रूप से भर्त्सना नहीं की जानी चाहिये ? वास्तव में शिक्षकों के आदरणीय वर्ग में कुछ ऐसे अपवाद भी घुलमिल गये हैं जिनकी अनुचित हरकतों ने सबकी छवि को धूमिल किया है ।
मेरी ऐसे शिक्षकों से विनम्र विनती है कि वे अपने कर्तव्यों को पहचानें , जिन बच्चों के व्यक्तित्व और भविष्य को सँवारने का दायित्व उन्होने स्वयम लिया है उसे पूरा करें । बच्चे बहुत कोमल होते हैं अपने शिक्षक पर उनकी अगाध श्रद्धा और विश्वास होता है इस विश्वास का वे मान रखें और कभी इसे कलंकित ना होने दें । बच्चों को इतना प्यार , इतना भरोसा और निर्भयता का वातावतण दें कि वे उनके सान्निध्य में स्वयम को सबसे सुरक्षित , सुखी और आश्वस्त महसूस करें । उन्हें अपने शिक्षक से डर ना लगे , वे बेझिझक अपने मन की गुत्थियों को उनके सामने खोल सकें और उनके सुझाये समाधानों को अपना सकें ।
आज का दिन अपने अंतर में झांकने का दिन है । आप ईमानदारी से अपने क्रियाकलापों का विश्लेषण कीजिये क्या शिक्षक दिवस के इस पवित्र दिन पर आप वास्तव में उन श्रद्धा सुमनों को पाने के योग्य हैं जिन्हें अगाध विश्वास, प्यार और भक्तिभाव के साथ आपके विद्यार्थी आपको समर्पित करते हैं ? यदि नहीं तो यही दिन है जब आप यह संकल्प ले सकते हैं कि आप इन श्रद्धासुमनों को पाने की पात्रता स्वयम में अवश्य अर्जित् करेंगे और शिक्षक तथा विद्यार्थी के पवित्र रिश्ते को कभी कलंकित नहीं होने देंगे ।
साधना वैद

Tuesday, August 25, 2009

क्या यह आत्मघात नहीं है ?

स्वप्न नींदों मे,
अश्रु नयनों में,
गुबार दिल में ही
छिपे रहें तो
मूल्यवान लगते हैं यह माना ।
भाव अंतर में,
विचार मस्तिष्क में,
शब्द लेखनी में ही
अनभिव्यक्त रहें तो
अर्थवान लगते हैं यह भी माना ।
पर इतनी ज्वाला,
इतना विस्फोटक
हृदय में दबाये
खुद से बाहर निकलने के
सारे रास्ते क्यों बन्द कर लिये हैं ?
क्या यह आत्मघात नहीं है ?

Sunday, August 9, 2009

अतिथि देवो भव

हमारी भारतीय संस्कृति की यह परम्परा रही है कि हम अपने अतिथियों को देवतुल्य मानते हैं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार उनके स्वागत सत्कार और अभ्यर्थना में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते । अतिथियों के साथ सज्जनता से व्यवहार करना, उनकी आवश्यक्ताओं को समझ कर उनको पूरा करने के लिये प्रयत्नशील रहना, उनके मान सम्मान और उनकी सुख सुविधा का ध्यान रखना और उनके लिये यथा सम्भव एक सुखद और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण उपलब्ध कराना ही अब तक हमारी सर्वोपरि प्राथमिकता रही है और आज भी होनी चाहिये । यही संस्कार बचपन से हमें हमारे माता पिता देते आये हैं और स्कूलों में भी यही शिक्षा अब तक हमें अपंने गुरुजनों से मिली है ।
वर्तमान संदर्भ में ये अवधारणायें अपना औचित्य खोती हुई प्रतीत होती हैं । कहीं न कहीं मूल्यों का विघटन इतनी बुरी तरह से हुआ है कि विश्व बिरादरी के सामने हमें अक्सर शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ता है । सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भारत एक अत्यंत वैभवशाली और समृद्ध देश है । यहाँ के छोटे से छोटे गाँव या कस्बे से भी अतीत के गौरव की अनमोल गाथायें गुँथी हुई हैं । यहाँ के कण-कण में पर्यटकों को लुभाने और मोहित कर लेने की अद्भुत क्षमता है । हम अच्छी तरह से जानते हैं कि भारत एक विकासशील देश है और यहाँ की अर्थ व्यवस्था में पर्यटन व्यवसाय का बहुत अधिक महत्व है । यदि हम अपने देश में आने वाले पर्यटकों का विशिष्ट ध्यान रखें उन्हें भारत भ्रमण के समय सम्पूर्ण निष्ठा और सद्भावनापूर्ण सहयोग के साथ उनकी सहायता करें तो इस व्यवसाय की आय में चार चाँद लग सकते हैं । लेकिन होता बिल्कुल इसके विपरीत है । मैं विश्व प्रसिद्ध ताजनगरी आगरा में रहती हूँ और पर्यटन व्यवसाय से जुड़े सभी व्यक्तियों को आत्मावलोकन के लिये यह बताना चाहती हूँ कि हम अपने अतिथियों के साथ किस तरह का व्यवहार करते हैं इस पर चिंतन करने की महती आवश्यक्ता है । ज़रा ध्यान दें – पर्यटक रेल से या बस से नगर में जैसे ही प्रवेश करते हैं लपके जोंक की तरह उनसे चिपट जाते हैं और कभी कभी तो पर्यटक का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की होड़ में खींचतान करने से भी पीछे नहीं हटते । यदि आगंतुक पर्यटक का कार्यक्रम पूर्व निर्धारित है तो अपने असंतोष को व्यक्त करने के लिये वे अशोभनीय और आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग करने से खुद को रोक नहीं पाते । पर्यटक भले ही कहे हुए वाक्य का शाब्दिक अर्थ ना समझ पायें लेकिन लपकों की भाव भंगिमा और आवाज़ के उतार चढ़ाव से उन्हें समझने में ज़रा भी देर नहीं लगती कि उनके लिये कैसी अपमांजनक भाषा का प्रयोग किया जा रहा है और नगर में प्रवेश के साथ ही उनका मन खट्टा हो जाता है । पर्यटकों के मार्गदर्शन के लिये जो पुस्तिकायें छपती हैं उनमें भी इन लपकों से सावधान रहने की हिदायतें दी गयी हैं । क्या हमें इस पर विचार नहीं करना चाहिये कि ये लपके किसकी शह पर क्रियाशील रहते हैं और इनके व्यवहार पर नियंत्रण लगाने के लिये क्या प्रयास किये जा रहे हैं ? ज़बर्दस्ती कर अपने वाहन से ले जाने की ज़िद करना, फिर अपनी पसन्द के होटल में ठहरने के लिये विवश करना, अपने कमीशन बँधे हस्त शिल्प के शो रूम्स से खरीदारी करने के लिये मजबूर करना, जैसे कृत्य तो हम भारवासियों के लिये अति सामान्य और सर्व साधारण द्वारा मान्यता प्राप्त हो गये हैं लेकिन बाहर से आने वाले अतिथि अवश्य इस प्रकार के अभद्र आचरण से असंतुष्ट और रुष्ट हो जाते हैं । इस प्रकार की अप्रत्याशित मेहमाननवाज़ी से वे सकते में आ जाते हैं । सड़कों पर गली मोहल्लों के अशिक्षित बच्चे उन्हें अश्रवणीय और अकथनीय भाषा में तरह तरह के नामों से पुकार कर उनका मज़ाक बनाते हैं, स्मारकों पर जहाँ जूते उतारना अनिवार्य हो जाता है अक्सर उनके कीमती जूते चोरी हो जाते हैं, पर्यटकों के हाथों से उनके बैग और कैमरे छीन लिये जाते हैं, महिलाओं के साथ छेड़खानी की जाती है यहाँ तक कि कई बार उनके साथ यौन शोषण और बलात्कार की घटनायें भी संज्ञान में आई हैं । हमारे शहर में आकर वे अपना रुपया पैसा और सभी कीमती सामान गँवा कर बड़ी परेशानी में फँस जाते हैं । इस पर क्या पर्यटकों की संख्या में आने वाली कमी की शिकायत करने का हमारा कोई नैतिक आधार बनता है ? क्या इस तरह के आचरण पर अंकुश लगाने की हमारी कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती ? अगर हम ग़लत आचरण को रोक नहीं सकते तो उसकी वजह से होने वाले नुक्सान की भरपाई के लिये भी हमें तैयार रहना चाहिये । आखिर इस घर के मेजबान भी तो हमीं हैं । जैसा आतिथ्य सत्कार हम अपने अतिथियों को देंगे वैसा ही प्रतिदान हम उनसे पायेंगे ।
इन सबके अलावा कभी हम अपने शहर की स्वच्छता और साज सज्जा की तरफ भी ध्यान देते हैं ? जगह-जगह पर गन्दगी और कूड़े के ढेर सड़कों पर सजे रहते हैं । मच्छर और मक्खियों का बोलबाला है । शहर की एकाध विशिष्ट सड़क को छोड़ दिया जाये तो अधिकांश सड़कें टूटी-फ़ूटी और छोटे-बड़े गड्ढों से आच्छादित हैं । पर्यटक मलेरिया और हैजे के डर से शहर में घुसने से भी डरते हैं । गन्दगी के ढेर उनके सौंदर्य बोध को ग्रहण लगाते हैं और वे जान छुड़ा कर यहाँ से भागना चाहते हैं । क्या हम इस सबको रोकने के लिये कोई प्रयत्न कर रहे हैं ?
हमारा प्रशासन और पुलिस कितनी कार्यकुशल और तत्पर है यह तो सभी जानते हैं । इन समस्याओं से जूझने के लिये हमें स्वयं अपनी कमर कसनी होगी । पर्यटन व्यवसाय से जुड़े सभी उद्यमियों और संगठनों को एक समानांतर फौज खड़ी करनी होगी जो इस तरह के कुकृत्यों पर अंकुश लगा सके और इस प्रकार की असामाजिक गतिविधियों में लिप्त लोगों को दण्डित कर एक भयमुक्त वातावरण की रचना कर सके । शहर की साफ सफाई के लिये नगरपालिका पर निर्भर रहने की बजाय सफाई कर्मियों को संगठन स्वयम नियुक्त करे और उन्हें अच्छा वेतन देकर उनसे अच्छा काम ले । सभी ऐतिहासिक इमारतों और पर्यटकों की रुचि के स्थलों के आस-पास नियमित रूप से डी डी टी और मक्खी मच्छरों को मारने के लिये उपयुक्त दवाओं का छिड़काव किया जाये । ताकि पर्यटकों को बीमार होने का अंदेशा ना रहे ।
यदि वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को साकार करना है तो इस विचार को भी आत्मसात करना होगा कि विश्व के हर देश के लोग हमारे सगे सम्बन्धी हैं और हमें उन्हें वही आदर मान देना होगा जो हम अपने सगे सम्बन्धियों को देना चाहते हैं । तभी हमारे देश का गौरव बढ़ेगा, पर्यटकों की संख्या में भी आशातीत वृद्धि होगी, कमर टूटते पर्यटन व्यवसाय को भी सहारा मिलेगा और साथ ही देश की अर्थ व्यवस्था में भी कुछ सुधार आयेगा ।

साधना वैद