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Thursday, May 17, 2012

लकीरें














हाथों की लकीरों में
ज़िंदगी उसी तरह उलझ गयी है
जैसे बहुरंगी स्वेटर बुनते वक्त
सारी ऊनें उलझ जाती हैं और
जब तक उन्हें पूरी तरह से
सुलझा न लिया जाये
एक फंदा भी आगे बुनना
असंभव हो जाता है !
भागती दौड़ती
सुबह शामों के बीच
किसी तरह समय निकाल
स्वेटर की उलझी ऊन को तो
मैं फिर भी सुलझा लूँगी
लेकिन पल-पल दामन छुड़ा
चोरों की तरह भागती
इस ज़िंदगी ने तो
इतना वक्त भी नहीं दिया है कि
हाथों की इन लकीरों को मिटा
तकदीर की तख्ती पर कोई
नयी इबारत लिख सकूँ !
अब नसीब में जो कुछ
हासिल होना लिखा है
हाथ की इन्हीं उलझी  
लकीरों में छिपा है !
बस कोई इन लकीरों को
सुलझाने की तरकीब
मुझे बता दे !

साधना वैद


Friday, May 11, 2012

ममता की छाँव



 













आने वाला रविवार मातृ दिवस के रूप में मनाया जाने वाला है ! माँ की याद, उनके प्रति अपनी श्रद्धा या समर्पण की भावना क्या किसी दिवस विशेष के लिये सुरक्षित रखी जा सकती है ! यह तो उस प्राण वायु के समान है जो जीने के लिये अनिवार्य है और जो हमें हमारी हर साँस और हृदय के हर स्पंदन के साथ अपने ज़िंदा होने का अहसास कराती है ! हमें जीने के लिये प्रेरित करती है ! इसलिए माँ के नाम यह पैगाम आज ही भेज रही हूँ !
 

वह तुम्हीं हो सकती थीं माँ
जो बाबूजी की लाई
हर नयी साड़ी का उद्घाटन
मुझसे कराने के लिये
महीनों मेरे मायके आने का
इंतज़ार किया करती थीं ,
कभी किसी नयी साड़ी को
पहले खुद नहीं पहना ! 

वह तुम्हीं हो सकती थीं माँ
जो हर सुबह नये जोश,
नये उत्साह से
रसोई में आसन लगाती थीं
और मेरी पसंद के पकवान बना कर
मुझे खिलाने के लिये घंटों
चूल्हे अँगीठी पर कढ़ाई करछुल से
जूझती रहती थीं !
मायके से मेरे लौटने का
समय समाप्त होने को आ जाता था
लेकिन पकवानों की तुम्हारी लंबी सूची
कभी खत्म ही होने को नहीं आती थी ! 

वह तुम्हीं हो सकती थीं माँ
मेरा ज़रा सा उतरा चेहरा देख
सिरहाने बैठ प्यार से मेरे माथे पर  
अपने आँचल से हवा करती रहती थीं
और देर रात में सबकी नज़र बचा कर
चुपके से ढेर सारा राई नोन साबित मिर्चें
मेरे सिर से पाँव तक कई बार फेर
नज़र उतारने का टोटका
किया करती थीं !  

वह तुम्हीं हो सकती थीं माँ
जो ‘जी अच्छा नहीं है’ का
झूठा बहाना बना अपने हिस्से की  
सारी मेवा मेरे लिये बचा कर
रख दिया करती थीं
और कसम दे देकर मुझे
ज़बरदस्ती खिला दिया करती थीं !

सालों बीत गये माँ
अब कोई देखने वाला नहीं है
मैंने नयी साड़ी पहनी है या पुरानी ,  
मैंने कुछ खाया भी है या नहीं ,
मेरा चेहरा उदास या उतरा क्यूँ है ,
जी भर आता है तो
खुद ही रो लेती हूँ
और खुद ही अपने आँसू पोंछ
अपनी आँखें सुखा भी लेती हूँ
क्योंकि आज मेरे पास
उस अलौकिक प्यार से अभिसिंचित
तुम्हारी ममता के आँचल की 
छाँव नहीं है माँ
इस निर्मम बीहड़ जन अरण्य में
इतने सारे ‘अपनों’ के बीच
होते हुए भी
मैं नितांत अकेली हूँ !  

साधना वैद

 

Sunday, May 6, 2012

ओ नन्हे से परिंदे !



ओ नन्हें से परिंदे
मुझे तुमसे बहुत कुछ सीखना है !

सीखना है कि
दिन भर की अपनी थकान को
सहज ही भुला तुम
अपने छोटे-छोटे से पंखों में
कहाँ से इतनी ऊर्जा भर लाते हो
कि पलक झपकते ही
आकाश की ऊँचाइयों में विचरण करते  
घने मेघों से गलबहियाँ डाल
चहचहा कर तुम ढेर सारी
बातें करने लगते हो !


सीखना है कि  
कहाँ से तुमने इतना हौसला जुटाया है
कि लगभग हर रोज़
कभी इंसान तो कभी बन्दर
तुम्हारा यत्न से सँजोया हुआ
घरौंदा उजाड़ देते हैं  
और तुम निर्विरोध भाव से  
तिनका-तिनका जोड़
पुन: नव नीड़ निर्माण के  
असाध्य कर्म में बिना कोई उफ़ किये
एक बार फिर से जुट जाते हो !

सीखना है कि
कहाँ से तुम धीर गंभीर
योगी तपस्वियों जैसी  
असम्पृक्तता, निर्वैयक्तिकता
और दार्शनिकता की चादर
ओढ़ पाते हो कि अपने 
जिन नन्हे-नन्हे चूजों की चोंच में  
दिन रात के अथक श्रम से  
एकत्रित किये दानों को चुगा कर
तुम उन्हें जीवनदान देते हो,
दिन रात चील, कौए 
गिद्ध, बाजों से उनकी 
रक्षा करते हो ,
सक्षम सशक्त होते ही
तुम्हें अकेला छोड़ वे
फुर्र से उड़ जाते हैं 
और उनके जाने के बाद भी  
निर्विकार भाव से 
बिना स्वर भंग किये
हर सुबह तल्लीन हो तुम  
उतने ही मधुर, 
उतने ही जीवनदायी,
उतने ही प्रेरक गीत 
गा लेते हो !

ओ नन्हें से परिंदे अभी
मुझे तुमसे बहुत कुछ सीखना है !

साधना वैद !

Tuesday, May 1, 2012

पढ़ी लिखी लड़की____


श्रम दिवस के उपलक्ष्य में विशेष

सड़क मार्ग से सफर करो तो कई बार ट्रक्स के पीछे बड़ी शानदार शायरी पढ़ने के लिये मिल जाती है ! ऐसे ही एक सफर में -‘पढ़ी लिखी लड़की, रोशनी घर की’ के जवाब में एक मज़ेदार सा शेर पढ़ने को मिला ! ज़रा आप भी मुलाहिज़ा फरमाइये ‘पढ़ी लिखी लड़की, न खेत की न घर की !’
उस समय तो इस शेर के रचयिता के मसखरेपन का मज़ा लेकर हँस दिये और फिर उसे भूल भी गये लेकिन चंद रोज़ पहले चौका बर्तन का काम करने वाली एक अशिक्षित महिला की बातों ने मुझे सोचने के लिये विवश कर दिया कि हमारी सामाजिक व्यवस्था या सरकारी नीतियों में कहाँ कमी है कि इस वर्ग के लोगों की मानसिकता लड़कियों की शिक्षा के पक्ष में ना होकर विपक्ष में मज़बूत होती जा रही है !
दीदी के घर में घरेलू काम करने के लिये एक कम उम्र की युवा लड़की रमा आती है ! रमा की कहानी भी बड़ी दर्दभरी है ! कम उम्र में प्यार कर बैठी ! घर से भाग कर शादी कर ली ! तीन साल में तीन बार गर्भवती हुई ! दो बार जन्म से पहले ही बच्चे गँवा बैठी ! तीसरे बच्चे को जन्म दिया तब उसकी उम्र शायद सोलह सत्रह बरस की रही होगी ! जीवन की मुश्किलों का सामना करते-करते प्यार कहीं तिरोहित हो गया और प्रेमी पति बीबी और दुधमुँहे बेटे को इतने बड़े संसार में कठिनाइयों से जूझने के लिये अकेला छोड़ कर अपने लिये नया आकाश तलाशने  कहीं और निकल गया ! बेसहारा रमा अपने नन्हें से बच्चे को लेकर अपनी सास के पास लौट आई जिसने दरियादिली का प्रदर्शन कर उसे अपने घर में पनाह दे दी ! रमा कक्षा आठ तक पढ़ी हुई थी ! शायद होशियार भी थी ! मोबाइल के एस एम एस पढ़ना, डिलीट करना या भेजना वह सब जानती थी ! दीदी उसकी होशियारी की कायल थीं और उसे प्राइवेट आगे पढ़ाना चाहती थीं ! उनका विचार था कि एक साल में हाई स्कूल कर लेगी तो इसी तरह प्राइवेट इम्तहान देकर तीन चार साल में ग्रेजुएशन कर ही लेगी और फिर उसे टीचर का जॉब मिल जायेगा और उसका जीवन सँवर जायेगा ! रमा भी उत्साहित थी !
लेकिन दीदी और रमा का यह् हवाई किला एक दिन पल भर में ही धराशायी हो गया ! कदाचित रमा ने इस योजना का ज़िक्र अपनी सास से कर दिया था ! एक दिन लाल पीली होकर वह दीदी के घर आ धमकी !
मैडम जी आप मेरी बहू को मत बरगलाओ ! हमें नहीं पढ़ाना है उसे और ! वह जैसी है जितना पढ़ी है उतना ही ठीक है !
दीदी ने उसे बहुत समझाने की कोशिश की वह पढ़ लेगी तो टीचर बन जायेगी और इज्ज़तदार काम करेगी ! उसे इस तरह घर-घर जाकर चौका बर्तन का काम नहीं करना पड़ेगा !
तो क्या कमाल कर लेगी टीचर बन कर ? तपाक से रमा की सास का जवाब आया ! स्कूल में पढ़ाने जायेगी तो पाँच सौ छ: सौ रुपये से ज्यादह तनख्वाह तो नहीं मिलेगी ना ! पाँच सौ देंगे और हज़ार पर दस्तखत करवाएंगे ! अभी इज्ज़त के साथ तीन चार घर में काम करती है तो दो ढाई हज़ार कमा लेती है ! बच्चा थोड़ा और बड़ा हो जायेगा तो दो तीन घर और पकड़ लेगी तो आमदनी भी और बढ़ जायेगी ! एक बार टीचर बन जायेगी तो घर में ही बैठी रह जायेगी पाँच सौ पकड़ कर ! फिर घर-घर जाकर चौका बर्तन का काम थोड़े ही करेगी ! आप उसका माथा मत घुमाओ मैडम जी !  हम लोग गरीब ज़रूर हैं लेकिन मेहनत मजूरी करके अपना पेट भर लेते हैं ! यह अगर पढ़ लिख गयी तो मेहनत मजूरी का काम नहीं कर पायेगी और फिर इसका और इसके बच्चे का पेट कौन पालेगा ! हमारे यहाँ जितने मुँह होते हैं उतने ही हाथ चाहिये होते हैं कमाने के लिये ! एक की कमाई से घर नहीं चलता !
रमा की सास बड़बड़ाती हुई किचिन में चली गयी ! मैं इस सारे तमाशे की मूक दर्शक बनी हुई थी और सोच रही थी इस अनपढ़ औरत की बातों में तर्क हो या कुतर्क लेकिन एक सच्चाई ज़रूर है ! प्राइवेट स्कूलों में आजकल जितनी तनख्वाह टीचर्स को दी जाती है उससे कहीं अधिक तो ये झाडू पोंछा और बर्तन माँजने वाली बाइयाँ कमा लेती हैं और वह भी मात्र चंद घंटों में जबकि टीचर्स कई घण्टे स्कूल में ड्यूटी देती हैं, उसके बाद घर पर भी उन्हें स्कूल का ढेरों काम करना पड़ता है ! कभी कॉपियाँ जाँचनी हैं तो कभी पेपर सेट करने हैं लेकिन उन्हें उनकी मेहनत के अनुरूप तनख्वाह नहीं दी जाती ! सबको तो सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती ना ! तभी मुझे यह अहसास हुआ कि ट्रक पर लिखा हुआ शेर – पढ़ी लिखी लड़की, खेत की न घर की ज़रूर किसी भुक्तभोगी दिलजले ने ही लिखा होगा !

साधना वैद

Wednesday, April 25, 2012

बस ! अब और नहीं ___


कब तक
मुट्ठी में बँधे
चंद गीले सिक्ता कणों की नमी में
मैं समंदर के वजूद को तलाशती रहूँ
जो बालारूण की पहली किरण के साथ ही
वाष्प में परिवर्तित हो
हवा में विलीन हो जाती है ! 

कब तक
मन की दीवारों पर
उभरती परछाइयों की उँगली पकड़े
मैं एक स्थाई अवलम्ब पा लेने के
अहसास से अपने मन को बहलाती रहूँ
जो भोर की पहली दस्तक पर  
भुवन भास्कर के मृदुल आलोक के
विस्तीर्ण होते ही जाने कहाँ
तिरोहित हो जाती हैं ! 

कब तक
शुष्क अधरों पर टपकी
ओस की एक नन्ही सी बूँद में
समूचे अमृत घट के
जीवनदायी आसव को पी लेने की
छलना से अपने मन को छलती रहूँ
जो कंठ तक पहुँचने से पहले
अधरों की दरारों में जाने कहाँ  
समाहित हो जाती है !

कब तक
हर रंग, हर आकार के
कंकरों से भरे जीवन के इस थाल से
अपनी थकी आँखों पर
नीति नियमों की सीख का चश्मा लगा  
सुख के गिने चुने दानों को बीन
सहेजती सँवारती रहूँ
जबकि मैं जानती हूँ कि इस
प्राप्य की औकात कितनी बौनी है !

कब तक
थकन से शिथिल अपने
जर्जर तन मन को इसी तरह
जीवन के जूए में जोतना होगा ?
कब तक
अनगिनत खण्डित सपनों के बोझ से झुकी
अपनी क्लांत पलकों के तले
फिर से बिखर जाने को नियत
नये-नये सपनों को सेना होगा ?
कब तक
हवन की इस अग्नि में
अपने स्वत्व को होम करना होगा ?   
कितना थक गयी हूँ मैं !
बस अब और नहीं _______!

साधना वैद



Monday, April 23, 2012

पाण्डुचेरी में फ्रांसीसी राष्ट्रपति के चुनाव के लिये मतदान


आज २३ अप्रेल २०१२ के दैनिक जागरण में एक अच्छा समाचार पढ़ने के लिये मिला ! जानकारी मिली कि फ्रांस के पूर्व उपनिवेश पाण्डुचेरी में फ्रांसीसी नागरिकता वाले ५७०० मतदाता आज भी रहते हैं और उन्होंने २२ अप्रेल रविवार को होने वाले फ्रांस के राष्ट्रपति के चुनाव के लिये मतदान में बढ़ चढ़ कर भाग लिया ! उनकी सुविधा के लिये फ्रांसीसी दूतावास ने ना केवल कई मतदान केन्द्र बनाये बल्कि वृद्ध एवं बीमार लोगों को केन्द्रों तक पहुँचाने के लिये वाहन की व्यवस्था भी की ! सुखद अहसास हुआ कि फ्रांसीसी लोग अपने नागरिकों के वोट की कीमत समझते भी हैं और उसका सम्मान भी करते हैं !
तभी मेरा विदेशों में बसे भारतीय नागरिकों की तरफ भी ध्यान गया जिनको इस प्रकार की सुविधा उपलब्ध नहीं है ! वैसे तो कहा जाता है कि जिस प्रकार आलू और प्याज दुनिया के हर कोने में मिल जाते हैं उसी प्रकार भारतीय भी दुनिया के हर हिस्से में बसे हुए मिल जाते हैं ! लेकिन भारतीय नागरिकों को वोट देने की सुविधा कम से कम उन देशों में तो मिलनी ही चाहिये जहाँ एक लाख से अधिक भारतीय नागरिक बसते हैं ! यहाँ पर चर्चा सिर्फ भारतीय नागरिकों की हो रही है भारतीय मूल के लोगों की नहीं, जिनकी संख्या तो वास्तव में बहुत बड़ी है लेकिन क्योंकि वे उन देशों की नागरिकता लेकर वहाँ वोट देने का अधिकार प्राप्त कर चुके हैं इसलिए आज की चर्चा में वे इस सूची में सम्मिलित नहीं हैं ! ऐसे देश, जहाँ एक लाख से अधिक एन. आर. आई. बसे हुए हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं --
-
ऑस्ट्रेलिया ---------२.२५ लाख
बहरीन -------------३.५ लाख
कनाडा -------------२.० लाख
कुवैत --------------६.० लाख
मलेशिया -----------१.५ लाख
नेपाल --------------१.२ लाख
ओमान -------------५.५ लाख
क़तर ---------------५.० लाख
साउदी अरब --------१८.० लाख
सिंगापुर ------------२.७ लाख
यू.ए.ई. -------------१७.० लाख
अमेरिका ----------- ९.३ लाख
यू. के. में १५.० लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं जिनमें से लगभग ४०% एन. आर. आई. हैं !
विदेशों में बसे भारतीय भी अपने देश के महत्वपूर्ण मतदाता हैं और वास्तव में वे भारत की समस्याओं और राजनीति को पूरी तरह से समझते हैं ! अमेरिका में बसे अपने बेटे के पास कई बार मेरा जाना हुआ है और वहाँ कई अवसर ऐसे आये जब विशिष्ट समारोहों में या घरेलू पार्टीज़ में वहाँ बसे अनेकों भारतीयों से मिलने का मौक़ा मिला ! जिस बात ने सबसे अधिक मुझे प्रभावित किया वह यही थी कि वे भी अपने देश के लिये चिंतित रहते हैं और देश की समस्याएँ उन्हें भी विचलित करती हैं ! यहाँ के सरकारी तंत्र, अर्थ व्यवस्था, सामाजिक एवं राजनैतिक फलक पर सुर्ख़ियों में रहने वाली खबरें उन्हें भी उतना ही उद्वेलित करती हैं जितना यहाँ रहने वाले देशवासियों को ! फिर उनको मतदान के अधिकार से क्यों वंचित रखा जाता है ! क्या हमें भी फ्रांस से प्रेरणा लेकर इस दिशा में आवश्यक कदम नहीं उठाने चाहिये ?
हमको तो अब उस विचार को भी आगे बढ़ा कर कार्य रूप देना चाहिये जिसमें भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों को द्विदेशीय नागरिकता दिये जाने का प्रस्ताव काफी समय से लम्बित पड़ा हुआ है ! विदेशी नागरिकता वाले भारतीयों को भारतीय नागरिकता देने के लिये उसी प्रकार कड़ी खोजबीन की जाये जिस प्रकार हम विदेशियों को वीजा देने से पहले करते हैं ! अनेक देशों में यह व्यवस्था अपनाई जा चुकी है ! इस विषय पर भी निर्णायक विचार विमर्श होना ही चाहिये !

साधना वैद

Saturday, April 14, 2012

दर्दे ज़हर




हम भी चुप थे वो भी चुप थे
सब गाफिल थे अपने में ,
दिल के ज़ख्मों के मरहम को
इक जुमला ही काफी था !

किसने किसको कितना चाहा
नाप तोल कर क्या होगा ,
प्यार की छोटी सी दुनिया को
इक तिनका ही काफी था !

चाह कहाँ थी, मंज़िल तक
जाने की ज़हमत कौन करे ,
राहे वफ़ा पर संग चलने को
एक कदम ही काफी था

फर्क कहाँ पड़ता है
डूबे दरिया में या प्याली में ,
मरने को तो दर्दे ज़हर का
इक कतरा ही काफी था !

सात जनम का साथ भला कब
किसको हासिल होता है ,
करने को इज़हारे मोहोब्बत
इक लम्हा ही काफी था !

साधना वैद