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Tuesday, May 5, 2020

जाने कहाँ गये वो दिन


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बचपन और शरारतों का वैसा ही रिश्ता होता है जैसा पतंग और डोर का ! और इस संयोग को और दोबाला करना हो तो कुछ हमउम्र संगी साथी और भाई बहनों का साथ मिल जाये और गर्मियों की छुट्टियों का माहौल तो बस यह समझिए कि सातों आसमान ज़मीन पर उतार लाने में कोई कसर बाकी नहीं रह जाती ! और तब घर के बड़े बुजुर्गों को भी बच्चों को अनुशासन में रखने के लिये जो नाकों चने चबाने पड़ जाते हैं उसका तो मज़ा ही कुछ और होता है !

सालाना इम्तहान समाप्त होते ही हम बड़ी बेसब्री से अपने मामाजी और चाचाजी के परिवारों से मिलने के लिये अधीर हो जाते थे ! कभी हम तीनों भाई बहन मम्मी बाबूजी के साथ उन लोगों के यहाँ चले जाते तो कभी वे सपरिवार हम लोगों के यहाँ आ जाते ! पाँच बच्चे मामाजी के, पाँच बच्चे चाचाजी के और हम तीन भाई बहन और साथ में आस पड़ोस के बच्चों की मित्र मण्डली, बस पूछिए मत कितना ऊधम, कितना धमाल और कितना हुल्लड़ सारे दिन होता था ! लड़कियों का ग्रुप अलग बन जाता और ज़माने भर के लोक गीतों और फ़िल्मी गीतों के ऊपर सारे-सारे दिन नाच-नाच कर कमर दोहरी कर ली जाती ! उधर लड़कों का ग्रुप अलग बन जाता जो कभी तो छत पर चढ़ कर पतंग उड़ाने में और पेंच लड़ाने में व्यस्त रहते तो कभी इब्ने सफी बी.ए. के जासूसी उपन्यासों से प्रेरणा ले विनोद हमीद की भूमिका ओढ़ झूठ मूठ के केसों की छानबीन में लगे रहते ! दिन में धूप में बाहर निकलने की सख्त मनाही होती थी ! उन दिनों कूलर और ए सी का ज़माना नहीं था ! खस की टट्टियाँ दरवाजों पर और खिड़कियों पर लगा कर कमरों को ठंडा रखा जाता था ! दिन भर कमरे में हम लोग या तो कैरम, साँप सीढ़ी, लूडो और ताश आदि खेलते या फिर मम्मी सब लड़कियों को कढ़ाई करने के लिये मेजपोश या तकिये के गिलाफों पर डिजाइन बना कर दे देतीं कि जब तक बाहर का मौसम अनुकूल ना हो जाये कमरे रह कर कुछ हुनर की चीज़ें भी लड़कियों को सिखा दी जायें ! सबसे सुन्दर कढ़ाई करने वाले के लिये आकर्षक इनाम दिये जाने की घोषणा भी की जाती ! बस फिर क्या था हम सभी बहनें स्पर्धा की भावना के साथ जुट जातीं कि यह इनाम तो हमें ही जीतना है ! दिन भर बच्चों के लिये कभी फालसे या बेल का शरबत तो कभी कुल्फी और आइसक्रीम या कभी आम और खरबूजे के खट्टे मीठे पने का चुग्गा डाल कर मम्मियाँ हम लोगों को कमरे में ही टिकाये रखने के लिये सारे प्रयत्न करती रहतीं ! बीच-बीच में बच्चों की ड्यूटी बाहर जाकर खस के पर्दों की तराई करने के लिये भी लगा दी जाती ! कमरे में खूब हो हल्ला मचा रहता ! कभी अन्त्याक्षरी का शोर मचता तो कभी कोरस में नये पुराने फ़िल्मी गीतों को फुल वॉल्यूम पर गाने का शोर मचता ! कभी-कभी बड़े लोग भी हमारे इस खेल में शामिल हो जाते अन्त्याक्षरी के खेल में हारने वाली टीम के कानों में गाने बता कर उन्हें जीतने में मदद करने लगते ! उस समय ‘चीटिंग-चीटिंग’ का बड़ा शोर मचता और ‘शेम-शेम’ की गगन भेदी चीत्कारों के साथ खेल वहीं समाप्त कर दिया जाता !  

यूँ तो लड़के अपना ग्रुप अलग ही बना कर रखते थे लेकिन जब उन्हें अपनी पतंगों के लिये ‘माँझा’ बनाने की ज़रूरत होती थी तो उन्हें हमारे सहयोग की बड़ी ज़रूरत होती थी ! उसके लिये घर के कबाड़े में से पुरानी काँच की शीशियों को जमा कर, तोड़ कर, कूट पीस कर और कपड़े से छान कर उसका पाउडर बनाना पड़ता था ! उसके बाद काँच के उस महीन पाउडर को गोंद में मिला कर उसका लेप तैयार करना पड़ता था ! फिर बगीचे के किसी एक पेड़ से धागे के एक सिरे को बाँध कर दूसरा सिरा सबसे दूर वाले पेड़ से बाँधा जाता था ! फिर गोंद में मिले उस लेप को धागे पर अच्छी तरह से लपेटा जाता था ! निगरानी भी करनी पड़ती थी कि जब तक धागा पूरी तरह से सूख ना जाये कोई बच्चा उसके पास जाकर घायल ना हो जाये ! अपने इस बहुमूल्य सहयोग की मोटी कीमत भी वसूलते थे हम अपने भाइयों से ! वे बड़े थे तो कभी हम लोगों को मम्मी बाबूजी की इजाज़त लेकर बाहर पार्क में घुमाने ले जाते थे जहाँ पूरी शाम हम लोग झूलों, शूट, सी सौ आदि पर जमे रहते थे और ‘आई स्पाई’ और ‘बोल मेरी मछली कितना पानी’ खेला करते थे या कभी-कभी वे लोग हमें पिक्चर हॉल में बच्चों की कोई फिल्म दिखाने के लिये ले जाते थे ! कई अच्छी फ़िल्में जैसे जागृति, बूट पॉलिश, हम पंछी एक डाल के, कैदी नंबर नौ सौ ग्यारह, मासूम, प्यार की प्यास, तूफ़ान और दिया आदि हमने इसी तरह देखी थीं ! शाम होते ही आँगन में पानी का छिड़काव और छिड़काव के बहाने एक दूसरे को पानी से सराबोर करने की शरारतें तो अंतहीन होती थीं ! जब तक ठन्डे पानी से बदन काँपने नहीं लगता था और मम्मी बाबूजी की  डाँटने की आवाज़ सुनाई नहीं पड़ती थी यह सिलसिला थमने का नाम नहीं लेता था !

कितने सुहाने दिन थे वे ! जहाँ सिर्फ मस्ती थी, मौज थी, बेफिक्री थी और थीं ढेर सारी खुशियाँ ही खुशियाँ ! उन्हें याद करके आज भी मन यही कहता है !

‘जाने कहाँ गये वो दिन !

साधना वैद 

Friday, May 1, 2020

शोहरत का दर्द



जब नयी नयी शोहरत मिलती है,
प्रशंसकों की भीड़ घेरती है ,
लोग ऑटोग्राफ लेने के लिए
धक्कामुक्की करते हैं ,
दूर से देख कर ही लोग
खुशी के मारे पागल से हो जाते हैं
बड़ा अच्छा लगता है !
हम कुछ ख़ास हैं
लोगों की नज़रों में चढ़ चुके हैं
उनके दिल के बिलकुल पास हैं
यह अहसास अच्छा लगता है !  
लेकिन यही शोहरत जब
कुछ पुरानी हो जाती है
तो गले की फाँस बन जाती है  
हम कुलीन जनों के शिष्टाचार की
औपचारिकताओं में घिर जाते हैं,
हमारी मौज मस्ती के सारे रास्ते
बंद हो जाते हैं और हम
अपने सुरक्षाकर्मियों से घिरे
बेबस कैदी से बन कर रह जाते हैं !
अब हम मशहूर जो हो गए हैं
आम जन से ख़ास जन हो गए हैं
अब हम ठेल पर खड़े हो
मज़ेदार मिसल पाव नहीं खा सकते ,
ढाबे पर मिट्टी की हाँडी में पका सौंधा सौंधा
चने का साग मक्की की रोटी नहीं खा सकते,
समंदर के किनारे चना ज़ोर गरम और
चुस्की का लुत्फ़ नहीं उठा सकते,
लोकल ट्रेन में पायदान पर लटक
आम लोगों के साथ सफ़र नहीं कर सकते,
स्टेशन पर बर्फ का रंगीन गोला
चाट चाट कर नहीं खा सकते,
बारिश में बिना छाते के भीगते हुए   
बीच सड़क पर दौड़ नहीं लगा सकते
ठेले पर गुड़ अदरक की गरमागरम चाय
और टोस्ट का आनंद नहीं उठा सकते !
क्यों ?
क्योंकि अब हम मशहूर हो गए हैं
हमारी शोहरत आड़े आ जाती है
हम आम आदमी से ख़ास बन गए हैं
हमारी यही नामुराद खासियत
हमारी खुशियों के रास्ते में आ जाती है !
कोई ले लो यह शोहरत, ये नाम,
ये रुतबा, ये ऐशो आराम, ये पैसा
और बना दो मुझे एक गुमनाम
भीड़ का मामूली सा चेहरा,
और पूरी शिद्दत से जी लेने दो मुझे
ज़िंदगी का हर एक पल
कौन जाने ज़िंदगी का ये चमन
किसी दिन बन के रह जाए
एक तपता धधकता रेत का सेहरा !

साधना वैद



Tuesday, April 28, 2020

मुखौटा




मिथ्या बौद्धिकता,
झूठे अहम और छद्म आभिजात्य
के मुखौटे के पीछे छिपा
तुम्हारा लिजलिजा सा चेहरा
मैंने अब पहचान लिया है
और सच मानो
इस कड़वे सत्य को
स्वीकार कर पाना मेरे लिए
जितना दुष्कर है उतना ही
मर्मान्तक भी है !
मुखौटे के आवरण के बिना
इस लिजलिजे से चहरे को
मैंने एक बार
पहले भी देखा था
पर किसी भी तरह उसे
तुम्हारे लोकरंजित
गरिमामय व्यक्तित्व के साथ
जोड़ नहीं पा रही थी
क्योंकि मैं यह विश्वास
कर ही नहीं कर पा रही थी
कि एक चेहरा तुम्हारा
ऐसा भी हो सकता है !
मेरे लिए तो तब तक
तुम्हारा मुखौटे वाला
चेहरा ही सच था न
और शायद इसीलिये खुद को
छल भी पा रही थी कि
यह लिजलिजा सा चेहरा
तुम्हारा नहीं
किसी और का होगा !
लेकिन अब जब
सारी नग्न सच्चाइयाँ
मेरे सामने उजागर हैं
खुद को छलना मुश्किल है !
और उससे भी मुश्किल है
अपनी इस पराजय को
स्वीकार कर पाना
कि जीवन भर मैंने जिसे
बड़े मान सम्मान,
श्रद्धा और आदर के साथ
अपने अंतर्मन के
सर्वोच्च स्थान पर
स्थापित किया
अपना सबसे बड़ा आदर्श
और पथदर्शक माना
वह सिर्फ और सिर्फ
माटी का एक
गिलगिला सा ढेला है
इससे अधिक कुछ भी नहीं ! 


साधना वैद

Saturday, April 25, 2020

चूल्हा




चूल्हे के नाम से ही
माँ याद आ जाती हैं
रसोईघर में चूल्हे के पास पटे पर बैठीं
साक्षात अन्नपूर्णा सी माँ !
जलती लकड़ियों की आँच से तमतमाया
उनका कुंदन सा दमकता चेहरा,
माथे पर रह रह कर उभरते श्रम सीकर,
आँखों में अनुपम अनुराग और
चहरे पर तृप्ति की अनुपम कांति !
हम बच्चों को चूल्हे पर औंटे सौंधे सौधे
गुलाबी दूध के गिलास थमाती माँ !
चूल्हे पर चढ़ी लोहे की भारी सी कढ़ाही में
करारी करारी पूरियाँ कचौड़ियाँ उतारती माँ !
चूल्हे की मद्धम आँच पर लकड़ी से टिका कर
फूली फूली कुरकुरी रोटियाँ सेकती माँ !
बटलोई में खदर बदर की आवाज़ सुन
दक्षता से दाल सब्जी को चलाती माँ
चूल्हे की लकड़ी से बने अंगारों पर
चावलों को दम करती माँ !
कड़कड़ाती ठण्ड में भी माथे पर छलक आये
पसीने को आँचल से सुखाती माँ !
चूल्हे की धीमी आँच में भूनने के लिए
कभी बैंगन, कभी आलू तो कभी बाटियाँ
बड़े ही करीने से दबाती माँ !
सुस्वादिष्ट बैंगन का भरता,
आलू की चाट और दाल बाटी चूरमा
तैयार कर बड़े ही प्यार से परोसती माँ !
माँ ने अपने जीवन में कभी रसोई के
आधुनिक उपकरण नहीं देखे
लेकिन चूल्हे पर ही जितने लाजवाब
व्यंजन उन्होंने पका कर खिलाये
संसार का कोई भी मास्टर शेफ
उनकी बराबरी नहीं कर सकता
माँ तो साक्षात अन्नपूर्णा का रूप थीं
कोई उनसे उनका यह तमगा
नहीं छीन सकता !

साधना वैद 

Friday, April 24, 2020

स्याही से लिखी तहरीरें



बचपन में जब लिखना सीख रही थी
स्लेट पर बत्ती से जाने क्या-क्या
उल्टा सीधा लिखती थी  
फिर उन विचित्र अक्षरों और
टेढ़ी मेढ़ी आकृतियों को देख
खूब जी खोल कर हँसती थी !
अपना ही लिखा जाने कितनी बार
मिटाया करती थी
फिर गीले कपड़े से पोंछ कर स्लेट को
खूब चमकाया करती थी !  
नए सिरे से जमा-जमा कर
सुन्दर अक्षरों में फिर से कुछ
नया लिख देती थी
और अपनी अनगढ़ अधकचरी
कलाकृतियों को देख खुद ही
खूब खुश हो लेती थी !  
कुछ बड़ी हुई तो कॉपी पर
पेन्सिल से लिखना शुरू हुआ
बार-बार गलत लिखा मिटाने से
जर्जर होते पन्नों की दशा देख
मलिन मन होने का
सिलसिला शुरू हुआ !
उस पन्ने पर कुछ भी दोबारा
लिखना मुश्किल हो जाता
बार-बार कोशिश करने से
पन्ना ही बिलकुल फट जाता !
धीरे-धीरे समझ में आ गया
गलतियों को दोहराने की
उम्र अब बीती जा रही है
सुलेख लिखना अब आसान नहीं रहा
भूल सुधार की गुंजाइश  
कम होती जा रही है !
समय के साथ जल्दी-जल्दी कदम बढ़ा
उम्र भी आगे बढ़ती रही
कल्पनाओं, सपनों, भावनाओं के
फलक को नापती टटोलती  
दीवानगी भी साथ चलती रही !
स्लेट बत्ती, रबर पेन्सिल के
बचकाने खेल सब पीछे छूट गए
हाथों में आ गयी सुनहरी डायरी
खूबसूरत कलम और स्याही की दवात
जो पता नहीं कब और कैसे
दिनों का चैन और रातों की नींद
सब लूट ले गए !
अब वक्त के सफों पर गहरी स्याही से
जो तहरीरें लिखनी होतीं उनका
पाबंदी के साथ एक ही बार में
सत्य शिव और सुन्दर होना
परम आवश्यक हो गया !
असावधानीवश कुछ भी लिख देना और
खाम खयाली में डूब पन्नों पर
कुछ भी उकेर देना जैसे
अब गुनाह सा हो गया !
लेकिन जैसा होना चाहिए
वैसा होता कहाँ है
जो लिख दिया सही गलत
वह मिटता कहाँ है !
ज़िंदगी की डायरी के हर पन्ने पर उकेरी हुई
जाने कितनी कटी पिटी लाइनें हैं,
जाने कितनी आधी अधूरी कवितायें हैं,
जाने कितने आधे अधूरे किस्से हैं
जो किसी अंजाम तक
या तो पहुँच ही नहीं पाए
या जहाँ पहुँच गए वहाँ से
यह जानते हुए भी कि
वो उनके मुकाम न थे
लौट नहीं पाए !
जो लिख गया सब गलत हो गया  
सारा अर्थ का अनर्थ हो गया !
सोचती ही रह जाती हूँ
गहरी स्याही में लिखी इन
गलत सलत तहरीरों को मिटाने के लिए
कोई तो चमत्कारिक साबुन मिल जाए
कि यह सब धुल पुँछ कर
पहले सा नया हो जाए
या फिर किसी भी जतन से
मेरी डायरी का हर कटा पिटा शब्द
किसी जादू से छूमंतर हो जाए
प्रभु की मुझ पर
बस इतनी सी दया हो जाए !


साधना वैद   

Monday, April 20, 2020

दो पंछी



कल सुबह अपने कमरे की
खिड़की से बाहर देखा था मैंने  
धरा से गगन का असीम विस्तार
नापने को तैयार
दो बेहद सुन्दर और ऊर्जावान पंछियों को
हौसलों की उड़ते भरते हुए
देखा था मैंने !

बिल्कुल सम गति सम लय में
समानांतर उड़ रहे थे दोनों,
मधुर स्वर में चहचहाते हुए
कुछ जग की कुछ अपनी
एक दूजे को सुनाते हुए
बड़े आश्वस्त से पुलकित हो   
उड़ रहे थे दोनों !

कुछ देर बाद एक ऊँची सी उड़ान भर
यूकेलिप्टस की पत्रहीन
ऊँची ऊँची दो डालियों पर
आमने सामने बैठ गये वे दोनों  
शायद कुछ सुस्ताने को या फिर
कुछ अनकही कुछ अनसुनी रह गयीं
बातें फिर से दोहराने को
आमने सामने बैठ गये वे दोनों !

तार सप्तक में चह्चहाने की
एक दूजे के स्वर में स्वर मिलाने की 
दोनों की आवाजें सुन रही थी मैं
वो गा रहे थे या लड़ रहे थे  
उग्र थे या उल्लसित
खुश थे या नाखुश
समझ नहीं पा रही थी मैं !

थोड़ी देर के बाद
एक पंछी अपनी डाल छोड़ 
अनंत आकाश में उड़ कर
दूर कहीं बहुत दूर चला गया,
मुझे विश्वास था कि वह लौट कर
अपने साथी के पास ज़रूर आएगा
लेकिन देर तक प्रतीक्षा करने के बाद
मेरा विश्वास छला गया ! 
  
दूसरा पंछी मौन उदास अनमना सा
अपनी डाल पर ही बैठा रह गया
जीवन साथी के चले जाने के बाद
इस अनंत असीम व्योम में वह
नितांत अकेला रह गया ! 

मेरे दिल में जैसे कहीं कुछ
छन्न से टूट गया
शिथिल हुई मेरी पकड़ से
उँगलियों में लिपटा ऊन का
अधबना गोला धरा पर छूट गया ! 

नहीं जानती
यूकेलिप्टस की शाख पर बैठे
उस पंछी को वाकई में थी या नहीं
पर मुझे बड़ी व्यग्रता से प्रतीक्षा थी
उस पंछी के लौट आने की
जो उसे छोड़ कर चला गया था
पता नहीं क्यों
उस पंछी के साथ साथ वह मुझे भी
एक अकथनीय पीड़ा के
अनंत अथाह सागर में
डुबो कर चला गया था !

साधना वैद