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Sunday, November 14, 2021

सपनों का आँचल

 



आँचल उसके सपनों का था ,
आँचल में सितारे हसरतों के टंके थे ,
किरण मुरादों की लगी थी ,
इन्द्रधनुषी सतरंगी फूल उसकी उम्मीदों के थे !
अपने ख़्वाबों खयालों की दुनिया में
उस सतरंगी चूनर को ओढ़
वह सारी रात खोई रहती थी
अपने सपनों के राजकुमार की प्रतीक्षा में
जो उसे सफ़ेद अश्व पर बैठा कर
ले जाएगा किसी दूर देश में
जहाँ न दुःख होगा, न ग़रीबी,
न भूख, न बीमारी, न जिल्लत, न जहालत,
न आँसू, न अपमान !
होगा तो बस प्यार !
प्यार प्यार और सिर्फ प्यार !
लेकिन भोर की पहली किरण के साथ
जैसे ही उसकी आँख खुलती है
खुली आँखों से उसके सारे सपने
आँसू की तरह नीचे ढुलक जाते हैं
सपनों का आँचल सर से सरक जाता है
और वह बन जाती है
चाबी भरी पुरानी धुरानी
एक टूटी फूटी गंदी सी गुड़िया
जो अपनी जर्जर साड़ी को
कस कर कमर में लपेट कर
निरत हो जाती है रोज़ की नीरस दिनचर्या में
और सुनती रहती है सबके ताने,
पीती रहती है अपमान के घूँट
और सूनी आँखों से प्रतीक्षा करती रहती है
रात के आगमन की
जब फिर उसके सर पर
सपनों का आँचल होगा
और सफ़ेद अश्व पर सवार होकर
उसका राजकुमार उसके पास आयेगा
और उसे प्यार के गीत सुनाएगा
और जी लेगी वह एक सच्ची खुशी
उस झूठी सी एक रात में !


साधना वैद

Sunday, November 7, 2021

महारास




सुनो न कृष्ण

जब तुम आस पास होते हो,

जब गोकुल की गलियों में

तुम्हारी मुरली की मधुर धुन

सुनाई देने लगती है,

जब यमुना के तट पर गोपियों की

आह्लादित ठिठोलियों के स्वर

हवा में गूँजने लगते हैं

तब प्रकृति भी उल्लसित हो

उनके साथ संगत देने लगती है !

घटाओं की ताल पर बारिश की

रिमझिम बरसती बूँदें मधुर गीत

गुनगुनाने लगती हैं,

यमुना की चंचल लहरें तरंगित हो

गोपिकाओं के आँचल से

उलझने लगती हैं !

हवाओं के साथ तुम्हारी मुरली की तान

कुंज वन के कोने-कोने तक पहुँच जाती है

और हर पैर थिरक उठता है,

हर मनुज के अंतर में

प्रेम का सितार बज उठता है 

और तब सृजन होता है

उस दिव्य अलौकिक संगीत का

जिसकी लय पर हर गोपिका

तुम्हारी संगति में स्वयं को

राधा समझने लगती है !

फिर रचा जाता है एक महारास

जिसकी गूँज युगों युगों तक

इस धरा पर सुनाई देती है !

साधना वैद


Tuesday, October 26, 2021

मन की बातें - सायली छंद


 


पुकारूँ

नित्य तुम्हें

कहाँ छिपे हो

मेरे प्यारे

गिरिधारी !

 

जब

मैं बुलाऊँगी

तुम आओगे ना

वादा करो

मुझसे !

 

लगता

कितना प्यारा

तुम्हारा सुन्दर मुखड़ा

बलिहारी जाऊँ

मैं !

 

खिले

रंग बिरंगे

फूल उपवन में

हवा लहराई

मदभरी !

 

विसंगति

कैसी अघोर

कविता कोमल तुम्हारी

किन्तु हृदय

कठोर !

 

जीतना

होगा इसे 

किसी भी तरह  

हारेगा नहीं

मन !  


चित्र - गूगल से साभार  

साधना वैद   

Sunday, October 17, 2021

सच्चा दशहरा

 



स्वागत है राम तुम्हारा

तुम्हारी अपनी अयोध्या में !

दशहरे के पावन अवसर पर

लंकाधिपति रावण को पराजित कर

तुम सगर्व सीता को अपने घर

सुरक्षित लौटा तो लाये हो !

लाखों दीप प्रज्वलित कर अयोध्यावासियों ने

दीवाली भी मना ली है !

लेकिन सच कहना राम क्या तुम

वास्तव में पूरी तरह से आश्वस्त हो कि

रावण का वध हो गया है ?

अब इस संसार में कोई भी रावण शेष नहीं ?

अगर ऐसा है राम तो वह कौन था

जिसने अप्रत्यक्ष रूप से

गर्भवती सीता का हरण कर लिया ?

तुम्हारे ही हाथों उसे निष्कासित करवा

दर दर जंगलों में भटकने के लिए और

दुष्कर जीवन जीने के लिए विवश कर दिया ?

क्या वह रावण का प्रतिरूप नहीं था ?  

नहीं राम तुम भ्रमित हो !

रावण एक शरीर नहीं जिसका वध कर

तुम आश्वस्त हो जाओ कि

अब इस संसार में कोई रावण नहीं बचा !

रावण तो एक दूषित मानसिकता है

एक भ्रमित विचारधारा है

जिसने नारी को केवल भोग्या ही माना

न कभी उसका सम्मान किया

न ही कभी उसे उचित संरक्षण दिया !

यह दूषित विचारधारा हर युग में

हर समाज में पैदा होती रहती है !

और इसके विनाश के लिए राम तुम्हें

हर घर में हर परिवार में

अपना एक प्रतिरूप पैदा करना होगा

ताकि समाज के कोने कोने में साँस ले रहे

रावणों का खात्मा हो सके और नारी को

उसकी गरिमा के अनुकूल उचित

संरक्षण और सम्मान प्राप्त हो सके !

जिस दिन समाचार पत्र में

किसी भी स्त्री के शोषण का समाचार नहीं होगा

उसी दिन मेरे लिए सच्चा दशहरा होगा राम

और तब ही तुम्हारे स्वागत में

पूरी श्रद्धा से मैं दीवाली के दीप जला पाउँगी !  

 

साधना वैद  


Wednesday, October 13, 2021

गुलामी

 



सदियों से गुलामी रही है

किस्मत भारत की !

एक बार विदेशी आक्रान्ताओं के सामने

पराजय का विष पीकर

युगों तक गुलामी के जुए के नीचे

गर्दन डाले रखने को विवश रहा है भारत !

पहले विदेशी आक्रमणकारियों की

गिद्ध दृष्टि का निशाना बना भारत !

फिर मुगलों ने इसे लूटा और

इस पर अधिकार जमाया  !

फिर यहाँ के वैभव और समृद्धि ने

अंग्रेजों की आँखों को चौंधियाया

और भारत सदियों तक

खिलौना बना रहा कभी इस हाथ का

तो कभी उस हाथ का !

लेकिन भारत के दुर्भाग्य का भी

एक दिन अंत तो होना ही था !

गुलामी की युगों लम्बी स्याह रात का

एक दिन तो खात्मा होना ही था !

अनेकों युगांतरकारी नेताओं, विचारकों,

क्रांतिकारियों, विद्रोहियों की योजनाओं ने

आज़ादी के प्रथम प्रभात की ओर कदम बढ़ाया

और १५ अगस्त १९४७ का बालारुण 

स्वतंत्र भारत के अभिनन्दन का थाल सजाये

पूर्व दिशा में नभ पर अवतरित हुआ !

हम स्वतंत्र हो गए !

गुलामी के बंधन कट गए !

लेकिन क्या सच में ?

क्या इसी लोकतंत्र का सपना देखा था

हमारे नेताओं ने ?

क्या आज भी हम मानसिक रूप से

गुलाम नहीं हैं उन्हीं प्रदूषित विचारधाराओं के

उसी विषैली मानसिकता के और

उसी अन्यायपूर्ण कार्य प्रणाली के ?  

जागना होगा हमें !

और इस बार हमें मुक्त करना होगा

स्वयं को ही अपनी ही

विदेशी मानसिकता की गुलामी से !

 

साधना वैद


Sunday, October 10, 2021

कटी पतंग

 



ज़िंदगी की धूप छाँव में

सिहरती सिमटती चलती ही जा रही हूँ

सुख दुःख की उँगलियाँ थामे !

साँझ के साथ साथ मन में भी

अन्धेरा घिर आया है

चहुँ ओर पसरा मौन सहमा जाता है मुझे

प्रतीक्षा है सवेरा होने की,

पंछियों के कलरव की मधुर आवाज़ की

मंज़िल दूर है और राह लम्बी

थके हुए हौसले को झकझोर कर

कभी स्वप्न आगे खींचते हैं

तो कभी हताशा पीछे से डोर खींचती है 

और मैं उड़ती ही जाती हूँ

डोर से कटी पतंग की तरह

कभी यहाँ तो कभी वहाँ !

साधना वैद


Saturday, October 2, 2021

विसर्जन

 




तुमसे आख़िरी बार मिलने के बाद

उसी नदी के किनारे कर आई हूँ मैं विसर्जन 

उन सभी मधुर स्मृतियों का

जिन्होंने मेरे हृदय में घर बना लिया था,

उन सभी खूबसूरत पलों का

जिनसे हमारी हर सुबह उजली और

हर शाम रंगीन हो जाया करती थी !

कर आई हूँ तर्पण उन वचनों का

जो कभी हमने एक दूसरे का साथ

जन्म जन्मान्तर निभाने के लिए

एक दूसरे का हाथ थाम लिये थे और

कर दिया है श्राद्ध उन सभी सुखानुभूतियों का

जिनके बिना यह जीवन अब एकदम से

बेनूर, बेरंग, बेआस हो जाने वाला है !

तुम्हारी लिखी जिन चिट्ठियों को मैं

अब तक हृदय से लगा कर संजोती आई थी

उनकी राख और चुन चुन कर तुम्हारे दिए

सभी स्मृति चिन्ह और उपहारों के फूल

एक पोटली में बाँध विसर्जित कर आई हूँ

मैं उसी नदी में जिसके किनारे

हमारे प्रेम भरे गीतों के मधुर स्वर

हवाओं में तैरा करते थे !

आज मैं श्राद्ध कर आई हूँ

एक बहुत ही खूबसूरत रिश्ते का

जो मेरे दिल के सबसे करीब था !

 

साधना वैद