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Sunday, November 10, 2013

‘सत्यमेव जयते’
















‘सत्यमेव जयते’
लिखने पढ़ने में यह नारा
कितना अच्छा लगता है,
‘सत्य का आभामण्डल
बहुत विशाल होता है’
कहने सुनने के लिये
यह कथन भी
कितना सच्चा लगता है !
लेकिन नायक
वर्तमान परिस्थितियों में
‘सत्य’जिन रूपों में समाज में
उद्घाटित प्रकाशित हो रहा है
उसे देख कर
क्या तुम कह पाओगे
कि इसी ‘सत्य’ की जीत हो,
क्या तुम सह पाओगे कि
इसी ‘सत्य’ के साथ
सबकी प्रीत हो ?
बोलो नायक
क्या यह सच नहीं कि
हमारे देश के कर्णधार
मासूम जनता के कान उमेठ
अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं,
और भोली जनता को लूट कर
अपनी तिजोरियाँ भर रहे हैं ?
क्या यह सच नहीं कि
पेट की आग बुझाने के वास्ते
कहीं एक गरीब माँ
चंद मुट्ठी अनाज के बदले
अपनी ममता का सौदा
करने के लिये विवश है
तो कहीं अनेक लाचार बहनें
अपने जिस्म की नुमाइश लगा
अपनी अस्मत को गिद्धों के सामने
परोसने के लिये अवश हैं ?
क्या यह सच नहीं कि
आज भी मंदिरों में
देवी की मूर्ति के सामने
मिथ्या भक्ति का ढोंग रचाने वाले
पाखंडी 'सदाचारी' लोग 
निर्बल असहाय नारी को
अकेला देख उस पर
वहशी दरिंदों की तरह
टूट पड़ते हैं,
और अपनी घिनौनी करतूतों से
इंसानियत के मुख पर
एक के बाद एक करारे
थप्पड़ से जड़ते हैं ?
बोलो नायक 
क्या यह सच नहीं कि
आज हमारे समाज में
किस्म-किस्म के भ्रष्टाचार,
अनाचार, दुराचार, व्यभिचार,
पापाचार और अपराध
अपने पूर्ण यौवन पर हैं,
और इन सबको खुले आम  
अंजाम देने वाले बहुत सारे
असामाजिक तत्व
अपनी सत्ता और सामर्थ्य
के मद में चूर
समाज के शिखर पर हैं ?
बोलो नायक
क्या अपने ‘सत्य’ के ऐसे ही
आभामण्डल पर
तुम मंत्रमुग्ध हो
या फिर अपने ‘सत्य’ का ऐसा
वीभत्स रूप और पतन देख
तुम भी अपने मन में
कहीं न कहीं  
आहत और क्षुब्ध हो ?
यदि ऐसे तामसिक सत्य का
न्याय करने के लिये
न्याय तुला
तुम्हारे हाथ में होती
तो तुम क्या करते नायक ?
क्या ‘सत्यमेव जयते’
उच्चारण करते हुए
तुम्हारा कंठ अवरुद्ध नहीं होता ?
या तुम्हारे अधर नहीं काँपते ?
या फिर तुम शतुरमुर्ग की तरह
आँखे मूँद सब अनदेखा कर देते
और बस केवल आदतन  
बिना सोचे समझे ही
दोहरा देते,
‘सत्यमेव जयते’....???????


साधना वैद  
  

      

Wednesday, November 6, 2013

कोई आस-पास है............













एक आवारा सा ख़याल,

एक बेतरतीब सी सोच,

एक ज़िद्दी सी याद,

एक अनगढ़ सी मूरत,

वक्त के एल्बम में

पीली पड़ी ढेर सारी

धुँधली तस्वीरों में

एक बिलकुल साफ़ ताज़ी

चमकती सी तस्वीर,

जाने क्यों गाहे बेगाहे

फुसफुसा कर कानों में

जीने का मन्त्र सा

फूँक जाती है,

नयनों की कोरों में

खुशी का उजास

भर जाती है,

बरसों से मौन पड़े कंठ में

एक सुरीली तान के

मधुर सुरों की

सरगम को जगा जाती है,  

उदासी से विवर्ण मुख पर

आस और विश्वास के

प्रसाधन लगा

चहरे को चमका जाती है

और मुद्दत से भिंचे

मौन रहने के आदी अधरों पर

एक मीठी सी मुस्कान को

आमंत्रित कर जाती है !

ऐसा लगता है जैसे

कोई आस पास है !




साधना वैद  





Saturday, November 2, 2013

आज खुशियों भरी दीवाली है

दीपावली की हार्दिक शुभकामनायें !


हर घर के स्वागत द्वार पर
छोटे-छोटे दीपों का हार है
प्रभु की स्नेहिल अनुकम्पा का
यह अनुपम उपहार है !
उर अंतर का हर कोना
आज खुशियों के उजास से
जगमगा रहा है
दीप मालिकाओं का
उज्जवल प्रकाश
घनघोर तिमिर को परास्त कर
गगन के सितारों को भी
लजा रहा है !
आज मन से यही दुआ
उच्छ्वसित होती है कि
हर घर झिलमिल दीपों की
रोशनी में नहाया हो   
हर हृदय ने हर्ष और उल्लास से
आनंद के छोर को गहाया हो !  
हर अधर पर खुशी के तराने हों  
मन में बसे दुःख, अवसाद
हताशा और अन्धकार को
जला डालने के सारे बहाने हों !
उठी मेरे भी मन में
यही कामना मतवाली है
हर्ष और उत्साह से
सब त्यौहार मनायें
आज खुशियों भरी दीवाली है !

साधना वैद





Monday, October 28, 2013

इंतज़ार




तुम ज़मीं पर सितारों से मिलते रहे
मैं फलक के सितारों को गिनती रही
तुम बहारों में फूलों से खिलते रहे    
मैं खिज़ाओं में शूलों को चुनती रही 
न बुलाया ही तुमने न दस्तक ही दी  
मैं खलाओं में तुमको ही सुनती रही  
वो जो ख़्वाबों खयालों में मिलना हुआ 
मैं उन्हीं चंद लम्हों में जीती रही 
कि जिन राहों से होकर गुज़रते थे तुम
मैं वहीं नक्शे कदमों को तकती रही 
बेसबब यूँ सवालों में उलझे रहे
कशमकश में उमर यूँ ही कटती रही 
कि न साहिल पे रुकना गवारा हुआ
मैं समंदर की लहरों पे चलती रही ! 

साधना वैद