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Friday, August 19, 2016

फैशनपरस्त



आज कामवाली को आने में देर हो गयी थी ! अम्मा जी का मूड खराब था ! बहू सरिता किचिन में सबका नाश्ता बनाने में व्यस्त थी ! रात के बर्तन मँजे ना होने से उसे असुविधा हो रही थी ! अम्मा जी को अपने चाय नाश्ते का इंतज़ार था ! तभी ऊँचा सा स्लीवलेस टॉप पहने ढीली-ढीली जींस को ऊपर खिसकाती काम वाली की बेटी पुनिया ने घर में कदम रखा ! पुनिया पर नज़र पड़ते ही अम्मा जी का पारा हाई हो गया !

“आ गईं महारानी ! सिंगार पटार से फुर्सत मिले तो काम की सुध आये ना ! घड़ी देखी है क्या टाइम हुआ है ? और क्यों री, ये कैसे बेढंगे कपड़े पहन कर आई है ! आग लगे इस फैशन को ! ढंग के कपड़े नहीं हैं तेरे पास ?”

सहमी सी पुनिया बिना कुछ बोले जल्दी से रसोई में घुस गयी ! जींस के लूप्स में उसने मुट्ठी में बंद सुतली डाल उसे कस कर बाँध लिया और सिंक में पड़े बर्तनों को धोने लगी ! अम्मा जी की फटकार से सरिता का ध्यान पुनिया के कपड़ों की ओर चला गया ! उसे याद आया कि पुनिया ने जो जींस और टॉप पहन रखा था उसकी बेटी श्रेया का था जिसे उसने पिछली होली पर पहना था और बाद में उसने वह कपड़े काम वाली को दे दिए थे ! वह चुप ही रही ! कुछ भी कहती तो अम्मा जी और गरम हो जातीं ! जल्दी से गरमागरम मैथी का पराँठा और अम्मा जी की फेवरेट गुड़ अदरक की चाय उसने अम्मा जी के सामने रख दी ताकि उनका ध्यान भी बँट जाए और गुस्सा भी शांत हो जाए !

तभी पुनिया की माँ कमला ने घर में प्रवेश किया ! जल्दी से झाडू उठा उसने कमरे की सफाई शुरू की !  

“पलंग के नीचे ज़रा ढंग से झाडू लगाना ! बच्चों की रबर पेन पेन्सिल गिर जाती हैं तो मिलती ही नहीं हैं ! बस सामने-सामने झाडू लग जाती है ! कमर ना झुकानी पड़ जाए कहीं !” अम्मा जी फिर भड़कीं !

कमला ने लगभग लेट कर डबल बेड के नीचे झाडू घुमाई ! आँचल सिर से हट गया और आधुनिक शैली का बदन दिखाऊ ब्लाउज अम्मा जी की क्रोधाग्नि में और अधिक आहुति देने लगा !

“देखो तो ज़रा ! कैसे कपड़े पहन कर आई हैं दोनों माँ बेटी ! सारा फैशन इन्हीं लोगों के सिर चढ़ा है ! लाज शर्म तो सब चूल्हे में झोंक आई हैं दोनों !”

कमला रुआँसी हो गयी !                  

“ऐसा काहे को बोलती हो अम्मा जी ! हमारी क्या औकात कि हम फैशन करें ! पुनिया के कपड़े बहूजी ने दिए थे ! और मेरा साड़ी ब्लाउज बगल वाले भल्ला जी वाली बीबी जी ने दिए हैं ! इतनी मंहगाई में बच्चों को भरपेट रोटी तो खिला नहीं पाते फैशन कहाँ से करेंगे ! हम लोगों की ज़िंदगी तो आप लोगों की उतरन पहन कर ही गुज़र जाती है ! नये कपड़े खरीदने को पैसे कहाँ हैं हमारे पास अम्मा जी !” चेहरा लकाये वह झाडू से कूड़ा बटोरने लगी !

हतप्रभ सरिता सोच रही थी बेचारी कमला और पुनिया किसके हिस्से की डाँट खा रही हैं !



साधना वैद

Saturday, August 13, 2016

मिली आज़ादी



मंहगी पड़ी
बड़ा मोल चुका के
मिली आज़ादी !

टुकड़े हुए
बँट गया वतन
रोया भारत !

आज़ादी आई
ढेर सा अवसाद
साथ में लाई !

भागे अँग्रेज़
उग्र था आंदोलन
विदेशी जो थे !

कैसे निपटें 
देशी कुशासन से
त्रस्त जनता !

युद्ध आसान
बाहर के बैरी से
हारें खुद से !

देख रवैया
शर्मिन्दा भारत माँ
कर्णधारों का !

वृद्ध हो चुकी
है आज भी हताश
माँ स्वाधीनता !

कैसे मनाएं
स्वतन्त्रता दिवस
क्षुब्ध मन से !

दंगे फसाद
घोर अराजकता
कसैला स्वाद !

लोभी नेतृत्व
सुस्त सी सरकार
दुखी जनता !

कोई तो पल
दे दो सुशासन का
खुश हो प्रजा ! 


साधना वैद





Thursday, August 11, 2016

कितना मुश्किल है




बीते लम्हों को जी लेना मुश्किल है

पलकों से आँसू पी लेना मुश्किल है !


मीलों लंबे रेत के जलते सहरा में

नंगे पैरों चलते रहना मुश्किल है ! 


तुम होते तो कुछ दोनों कहते सुनते

खुद ही खुद से दिल की कहना मुश्किल है ! 


दूर तलक पसरी सूनी इन राहों में

हमकदमों के साये मिलना मुश्किल है !


पैने नश्तर के गहरे इन ज़ख्मों को

जादू सा वो मरहम मिलना मुश्किल है !


दिल के दामन के उधड़े पैबंदों को

अश्कों के धागों से सिलना मुश्किल है ! 


अनजान अपरिचित लोगों की इस दुनिया में

एक किसी हमदर्द का मिलना मुश्किल है !


चीख भरी इन आवाजों के दंगल में

इसकी उसकी सबकी सुनना मुश्किल है ! 


सदियों का था साथ निभाने का वादा

चार कदम भी संग में चलना मुश्किल है !


एक बार तो उस जैसा बन कर देखो

दोधारी तलवार पे चलना मुश्किल है ! 


माफ कर दिये जिसने अनगिन पाप तेरे

उसके जैसा रहबर मिलना मुश्किल है ! 




साधना वैद




Friday, August 5, 2016

नेह दीप



एक नेह दीप 
जिसे उर अंतर के 
उज्ज्वल प्रेम की बाती 
और अनन्य विश्वास के घृत से
निश्छल निष्ठा और
सम्पूर्ण समर्पण के साथ
वर्षों पहले बड़े प्यार से
हम दोनों ने बाला था  
और जिसे तुम वक्त की
चुनौतियों से हार कर
यूँ ही छोड़ आये थे
एक नितांत निर्जन वीराने में
बुझ जाने के लिये !
उसी दीप को
अनेकों आँधियों तूफानों से
हाथों की ओट दे मैंने
अपने मन मंदिर में
अभी तक प्रज्वलित रखा है
ना कभी उसकी बाती को 
चुकने दिया
ना ही कभी उसकी लौ को 
मद्धम पड़ने दिया !
भूले से जो तुम्हारे कदम
इस राह पर पड़ गये थे
तो मेरे हृदय गवाक्ष से
अंदर झाँक कर तुमने इस
प्रखर प्रज्वलित दीप को
देख तो लिया था ना ?
लेकिन इस नेह दीप का
बुझना अब तय है
क्योंकि उज्ज्वल प्रेम की
यह बाती अब चुकने लगी है
और विश्वास का घृत तो
उसी दिन से घट चला था
जिस दिन तुम इसे हमारे
पवित्र प्रेम के समाधि स्थल पर
उपेक्षित छोड़ आये थे !
तुम्हें फिर दोबारा
मेरे हृदय गवाक्ष में झाँकने का
अवसर मिले न मिले
लेकिन आज इसकी लौ
पहले भी कहीं अधिक  
प्रखर और सुन्दर है
ठीक वैसे ही जैसे किसी
मरणासन्न व्यक्ति की चेतना
उसकी मृत्यु से कुछ क्षण पूर्व 
और अधिक चैतन्य और
अधिक जीवंत हो जाती है !



साधना वैद  


Wednesday, August 3, 2016

'संवेदना की नम धरा पर'... आदरणीय आर एन शर्मा जी की नज़र से


संवेदना की नम धरा पर...

मैंने साधना वैद, जो इस खूबसूरत काव्य संकलन की रचयिता हैं और जिनसे मेरी पहचान फेसबुक के माध्यम से हुई , से इस संकलन को पढ़ने की इच्छा व्यक्त की थी और जानना चाहा था की ये कहा से प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने खुद ही इसकी एक स्वहस्ताक्षरित प्रति मुझे भेज दी जो मुझे 30 अप्रैल को बरेली में प्राप्त हुई।
इसमें की कुछ कवितायें मैंने वहीँ पढ़ लीं थी और बाकी यहाँ मुम्बई लौटने के उपरान्त पढ़ी। हालांकि की मुझे समय काफी लग गया।
इस संकलन में 151 कवितायें है। इन कविताओं में हमारे जीवन का कोई भी रंग अछूता नहीं रहा है। साधना जी ने बड़े सच्चे ह्रदय से इन कविताओं के माध्यम से हमारे चारो ओर जो घट रहा है के विषय में बगैर किसी लाग लपेट के अपनी बात रखी है। कविताएं एकदम सीधी और सच्ची है। न ये बनावटी हैं न सजावटी। पढ़ते समय हमेशा साधना जी की मासूमियत, स्पष्टवादिता और उनके कवि ह्रदय की परिपक्वता सामने आती रही।
कुछ पंक्तियां जो याद रह गईं और जिनमे कविमन की सच्चाई और परिपक्वता झलकती है ये रहीं:
" लो अब अमृत घट छलक रहा
कुछ तुम पी लो कुछ मैं पी लूँ
जीवन की गाथा व्यथा बनी
अंतर में घोर अँधेरा है
जो फिर ये जीवन मिल जाए
कुछ तुम जी लो कुछ मैं जी लूँ।"
...

" कहीं कोई बेहद नाज़ुक ख्याल
चीख कर रोया होगा"
...

" अधिकारों के प्रश्न खड़े हैं
काम बंद, सन्नाटा है"
...

" उस अर्जुन की दुविधा तुमने खूब मिटाई
आज करोड़ों अर्जुन दुविधाग्रस्त खड़ें है"
...

" पर उस स्पर्श में वो स्निग्धता
कहाँ होती है माँ,
जो तुम्हारी बूढी उँगलियों की छुअन में
हुआ करती थी"
...

" मेरी अहमियत
तुम्हारे घर में,
तुम्हारे जीवन में
मात्र एक मेज या कुर्सी की ही है"
...

महज़ ये ही नहीं, बल्कि संकलन की सभी कविताओं में जो आवाज़ सामने उभर के आती है वो इस बात का प्रमाण है कि साधना जी खुद अपने आस पास घट रहीं घटनाओं की साक्षी रहीं हैं। उनकी कल्पना और प्रतीकात्मकता ने कविता में जैसे समाज की वो कड़वी सच्चाई उजागर की है जिसे हम देखते तो रोज़ हैं पर उसे अनदेखा कर देतें हैं। बात चाहे रिश्तों की हो या अभावग्रस्त तबके की, अकेलेपन की हो या समाज में स्त्री के दमन की या फिर कुछ और, कोई भी रंग अछूता नहीं रहा है उनसे। कम शब्दों में इतना कुछ कह जाना बिलकुल ऐसा ही है जैसे एक छोटे कैनवास पे सारी कायनात दिखा दी गयी हो।
उनकी कविताओ में यथार्थवाद तो है ही , प्रयोगवाद का भी बाहुल्य है। निष्कर्षतः ये संकलन कवी के कंचन जैसे पाक साफ हृदय से निकली कविताओं का एक अनमोल खजाना है। बस उनके जैसा ही संवेदनशील पाठक चाहिए उनका निचोड़ समझने के लिए। वैसे ऐसे संवेदनशील लोग ही कविता समझते भी हैं और पढ़ते, सुनते भी है।
"संवेदना की नम धरा पर" जो नाम है इस काव्य संकलन का वो भी सटीक है और उसका परिचय इसी नाम की एक कविता की निम्न पंक्तियों से मिल जाता है:
" और फिर एक दिन
संवेदना की नम धरा पर
भावनाओं का खूब सारा
खाद पानी डाल
अपने सारे कौशल के साथ
मैंने इन्हें बो दिया
लेकिन इनमें फूल कम
कांटे ज्यादह निकलेंगे
ये कहाँ जानती थी"...

Her voice and random thoughts emerge as that of a sensitive poet that Sadhna ji definitely is...


आपका बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार आदरणीय शर्मा जी कि आपने मेरी इन कविताओं को इतने ध्यान से पढ़ा और उन पर अपनी बहुमूल्य प्रतिक्रिया व्यक्त की ! आपकी समीक्षा ने नि:संदेह रूप से मेरे इस काव्य संकलन के सौंदर्य और महत्व को और निखारा है और इसके लिये मैं आपकी सदा ऋणी रहूँगी ! 

साधना वैद