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Saturday, October 18, 2014

जो तुम साथ दो


जो तुम साथ दो 


व्यर्थ की वर्जनाओं के तिलस्म को तोड़ना है

टूटे हुए सिलसिले के छिटके सिरों को जोड़ना है

मन पर पसरे पूर्वाग्रह के दामन को छोड़ना है 

विपरीत दिशा में बहती धाराओं को मोड़ना है

जो तुम साथ दो ! 


बेसुर हुए सुरों को प्रार्थना के गीत में ढालना है

आस्था की बुझती ज्योत को मंदिर में बालना है

भावना के बिखरे मनकों को एक सूत्र में डालना है

तुम्हारी अनुकम्पा की टूटी आस को हृदय में पालना है

जो तुम साथ दो !


अपने पैरों से धरा के अलंघ्य विस्तार को नापना है

नन्हे नन्हे पंखों से व्योम की सीमाओं को मापना है

अपने बाजुओं में इन बेलगाम हवाओं को बाँधना है

दुनिया भर की दुश्वारियों को अपने अंतर में साधना है

जो तुम साथ दो ! 


अथाह सागर की उत्ताल तरंगों को मुट्ठी में समेटना है

बालारुण की उजली रश्मियों को उँगलियों में लपेटना है

उत्तुंग शिखरों के प्रशस्त भाल पर विजयाभिषेक करना है

हर कठिन लक्ष्य की दुर्गम डगर पर दृढ़ता से पग धरना है

जो तुम साथ दो !  


उपवन में खिले फूलों के सुखकर सौरभ को बिखेरना है

मन में आकार लेती कल्पना को कागज़ पर उकेरना है

सच्चिदानंद के मधुर रस के लिये कड़वाहट को पेरना है

सत्यम् शिवम् सुन्दरम् के मनकों की माला को फेरना है

जो तुम साथ दो ! 





साधना वैद



Saturday, October 11, 2014

चलनी में चाँद






करवा चौथ की सभी बहनों को हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई ! 

भारतीय महिलाएं अपने सारे तीज त्यौहार पारंपरिक तरीके से ही मनाना पसंद करती हैं इसमें कोई दो राय नहीं हैं ! फिर बात अगर सुहाग के व्रत की हो तो उनकी भक्ति भावना, निष्ठा और समर्पण की बानगी ही कुछ और होती है ! परम्पराओं और नियमों के पालन में कोई कमी न रह जाए, हर अनुष्ठान हर विधि विधान पूरी सजगता सतर्कता के साथ संपन्न किया जाए इसका वे विशेष ध्यान रखती हैं ! आखिर अपने प्रियतम की दीर्घायु, सुख व सान्निध्य की कामना जो जुड़ी रहती है इस व्रत के साथ ! इन त्यौहारों का आकर्षण और लोकप्रियता बढ़ाने में फिल्मों और टी वी ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है इससे इनकार नहीं किया जा सकता ! यह इसी बात से सिद्ध होता है कि धार्मिक मान्यताओं को परे सरका कर इन त्यौहारों को मनाने वालों की संख्या हर साल बढ़ती ही जा रही है !

कल करवा चौथ का त्यौहार है ! उत्तर भारत में यह त्यौहार बड़े जोश खरोश के साथ मनाया जाता है ! सुहागन स्त्रियाँ अपने पति की लंबी आयु व मंगलकामना के लिये सूर्योदय से चंद्रोदय तक निर्जल निराहार व्रत रखती है और संध्याकाल में सारे विधि विधान के साथ पूजा अर्चना कर चन्द्रमा के निकलने की आतुरता से प्रतीक्षा करती हैं ! जब आसमान में चाँद निकल आता है तब चाँद को अर्घ्य दे अपने पति के हाथ से पानी पीकर अपना व्रत खोलती है ! पति के लिये इस तरह का अनन्य प्रेम, सद्भावना और भावनात्मक लगाव सभीको प्रभावित करता है ! मुझे बहुत प्रसन्नता हो रही है आप सबसे यह बात साझा करते हुए कि हमारे शहर आगरा में गत वर्ष कई मुस्लिम बहनों ने भी इस व्रत को रखा ! उनका कहना था कि अपने पति की मंगलकामना के लिये तो वे भी यह व्रत रख सकती हैं ! इसमें धर्म को कहीं से आड़े नहीं आना चाहिये !

बात विषय से कुछ हट गयी है ! दरअसल इस पोस्ट को लिखने का मेरा आशय केवल इतना जानना था कि फिल्मों और टी वी को देख कर चलनी में चाँद देखने की यह जो नई परम्परा चल पड़ी है उसका औचित्य क्या है ? करवा चौथ की कहानी के अनुसार सात भाइयों की इकलौती लाड़ली बहन को चलनी में जो चाँद दिखाया गया था वह तो नकली था ! और चलनी के आर पार उस नकली चाँद की पूजा करने के बाद उसे नुक्सान भी उठाना पड़ा था ! गगन का चाँद तो स्पष्ट गोल दिखाई दे ही जाता है फिर चलनी की आवश्यकता क्यों पड़ती है ? कहानी कहती है कि व्रत के कारण भूख प्यास से आकुल व्याकुल बहन की हालत भाइयों से जब देखी ना गयी तो उन्होंने पेड़ पर चढ़ कर मशाल जला कर चलनी के पीछे से नकली चाँद बना कर बहिन को दिखा दिया और उसे कह दिया कि चाँद को अर्घ्य देकर वह अपना व्रत खोल ले ! पेड़ के पत्तों के पीछे चलनी के अंदर गोलाई में मशाल का प्रकाश देख बहन को विश्वास हो गया कि चाँद सच में निकल आया है और उसने उस नकली चाँद को अर्घ्य देकर अपना व्रत खोल लिया ! इस तरह इस कहानी के अनुसार चलनी के माध्यम से जो देखा गया था वह तो नकली चाँद था फिर स्त्रियों का अपनी असली पूजा में चलनी के पीछे से चाँद देखने का क्या औचित्य है ? क्या हम गलत परम्परा को खाद पानी नहीं डाल रहे हैं या फिर हम इस परम्परा को सिर्फ इसलिए मानने मनाने लगे हैं क्योंकि फिल्मों में और धारावाहिकों में बड़े ही भव्य तरीके से इस परम्परा की स्थापित किया जाने लगा है जहाँ सजधज कर और चित्ताकर्षक अदाओं के साथ नायिका आसमान के चाँद के बाद नायक का चेहरा चलनी में देखती है और नायक अत्यंत रूमानी तरीके से पानी पिला कर नायिका का व्रत खुलवाता है ! मुझे याद है अपने मायके ससुराल में किसीको भी मैंने चलनी के माध्यम से चन्द्र देव के दर्शन करते हुए नहीं देखा ! न ही बाज़ार में इस तरह से सजी हुई चलनियाँ मिला करती थीं ! बाज़ारवाद की परम्पराएँ तो केवल हानि लाभ के सिद्धांतों से परिचालित होती हैं लेकिन धार्मिक विश्वास और आस्थाएं जिन रीति रिवाजों से पालित पोषित होते हैं क्या उनका तर्क की कसौटी पर खरा उतरना आवश्यक नहीं ? अधिकाँश महिलायें अब चलनी के माध्यम से चाँद क्यों देखने लगी हैं मैं इसका उत्तर जानना चाहती हूँ ! आशा है मेरी शंका का समाधान कर मेरा ज्ञानवर्धन आप में से कोई न कोई अवश्य करेगा !

सभी बहनों को करवाचौथ की हार्दिक शुभकामनायें एवं बधाई !



साधना वैद



Tuesday, October 7, 2014

एक रिश्ता पुराना सा



यूँ ही इस दर्द से रिश्ता मेरा पुराना है
छू के हर नक्श एक दूसरे को जाना है ! 

बड़े दिनों से इससे दोस्ती है, निस्बत है
बड़े दिनों से इसका घर में आना जाना है !

न कभी भूले से भी साथ इसने छोड़ा है
गवाही देने को तैयार ये ज़माना है ! 

ज़माने भर में भले छाई हो बहार-ए-चमन
हमारे दिल में तो सहरा सा ये वीराना है !

यूँ ही रो लेने की हमको तो महज़ आदत है
तेरे ना आने का तो बस फकत बहाना है !

हैं दिल में ज़ख्म कई नश्तरों के चुभने से
वो किसके हाथ थे इस दर्द ने पहचाना है !

बस यही एक है हमदर्द इस ज़माने में
सिवाय इसके यहाँ हर कोई बेगाना है ! 

भुला दिये जो कभी हमने दोस्ती के उसूल
सिखाये इसने ही कैसे इन्हें निभाना है ! 

कहाँ मिलेगा ऐसा दोस्त सारी दुनिया में
लिये चिराग फिरा करता ये दीवाना है !

बने हैं दोनों ही हम एक दूसरे के लिये
ना हमें ठौर ना उसको कहीं ठिकाना है !

साधना वैद
 

Saturday, October 4, 2014

मैं तुम्हारा ही अंश हूँ, माँ !


अपने छोटे से हृदयालय की
नन्ही सी खिड़की से बाहर
सुदूर सपनों के
विस्तीर्ण आकाश में
दमकते महत्वाकांक्षा के
प्रखर सूरज की
उजली सुनहरी
उम्मीदों की किरणों को
अपनी नन्ही सी
उँगलियों से लपेट कर
मैंने विश्वास का 
एक छोटा सा गोला
बना लिया है माँ
जिससे मैं संसार में
आने के बाद अपनी
मेहनत और लगन की
सलाइयों पर
अपने नवीन विचारों
और ख्यालों से ढेर सारे
अभिनव, अनुपम और
बहुत-बहुत-बहुत सुन्दर
वस्त्र बुनना चाहती हूँ
तुम्हारे लिये, अपने लिये,
और सभी के लिये !
बस जो केवल तुम मुझे
इस संसार में आने का
अवसर दे दो माँ !
अन्य घरों की कन्याओं को
साल में बारम्बार  
पूजने वाली मेरी माँ
तुम अपने शरीर के
इस अंश के साथ तो
कोई अन्याय नहीं
होने दोगी ना माँ ?
मुझमें भी तो
उसी देवी का वास है !
है ना माँ ?

साधना वैद