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Saturday, March 31, 2018

बेस्वाद ज़िंदगी



कैसी विचित्र सी मनोदशा है यह ! 
भूलती जा रही हूँ सब कुछ इन दिनों ! 
इतने वर्षों का सतत अभ्यास 
अनगिनत सुबहों शामों का 
अनवरत श्रम 
सब जैसे निष्फल हुआ जाता है 
अब अपनी ही बनाई रसोई में 
कोई स्वाद नहीं रहा 
मुँह में निवाला देते ही 
खाने वालों का मुँह 
किसकिसा जाता है !
कितने भी जतन से मिष्ठान्न बनाऊँ 
जाने कैसा कसैलापन 
जिह्वा पर आकर 
ठहर जाता है ! 
नहीं जानती मैं ही सब कुछ 
भूल चुकी हूँ या 
खाद्य सामग्री मिलावटी है 
या फिर पहले बड़े सराह-सराह कर 
खाने वालों के मुँह का 
ज़ायका बदल गया है ! 
पकवानों की थाली की तरह ही 
ज़िंदगी भी अब उतनी ही 
बेस्वाद और फीकी हो गयी है जैसे ! 
बिलकुल अरुचिकर, नीरस, निरानंद !


साधना वैद

चित्र - गूगल से साभार

Wednesday, March 28, 2018

मैं एकाकी कहाँ





ये तनहाइयाँ अब कहाँ डराती हैं मुझे !
क्योंकि अब 
मैं एकाकी कहाँ !


जब भी मेरा मन उदास होता है
अपने कमरे की
प्लास्टर उखड़ी दीवारों पर बनी
मेरे संगी साथियों की
अनगिनत काल्पनिक आकृतियाँ
मुझे हाथ पकड़ अपने साथ खींच ले जाती हैं,
मेरे साथ ढेर सारी मीठी-मीठी बातें करती हैं,
और उनके संग बोल बतिया कर
मेरी सारी उदासी तिरोहित हो जाती है !
फिर मैं एकाकी कहाँ !


जब भी मेरा मन उत्फुल्ल हो
सजने सँवरने को लालायित होता है
शीतल हवा के नर्म, मुलायम,
रेशमी दुपट्टे को लपेट ,
उपवन के सुगन्धित फूलों का इत्र लगा
मैं अपनी कल्पना के संसार में
विचरण करने के लिये निकल पड़ती हूँ,
जहाँ कोई अकुलाहट नहीं,
कोई पीड़ा नहीं,
कोई छटपटाहट नहीं
बस केवल आनंद ही आनंद है !
फिर मैं एकाकी कहाँ !


जब भी कभी सावन की घटाएं
मेरे हृदय के तारों को झंकृत कर जाती हैं,
टीन की छत पर सम लय में गिरती
घनघोर वृष्टि की थाप पर
मेरा मन मयूर थिरक उठता है,
खिड़की के शीशे पर गिरती
बारिश की बूँदों की संगीतमय ध्वनि
मेरे मन को आल्हादित कर जाती है
और उस अलौकिक संगीत से
मेरे अंतर को
निनादित कर जाती है !
फ़िर मैं एकाकी कहाँ !


जब भी कभी मेरा मन
किसी उत्सव समारोह में सम्मिलित होने को
उतावला हो जाता है
मैं अपने ह्रदय यान पर सवार हो
सुदूर आकाश में पहुँच जाती हूँ
जहाँ सितारों की रोशनी से
सारा उत्सव स्थल 
जगमगाता सा प्रतीत होता है,
जहाँ घटाओं की मृदंग
और बिजली की धार पर
दिव्य अप्सराओं का नृत्य हो रहा होता है
और समस्त ग्रह नक्षत्र झूम-झूम कर
करतल ध्वनि से उनका
उत्साहवर्धन करते मिल जाते हैं !
फिर इन सबके सान्निध्य में
मैं एकाकी कहाँ !



साधना वैद

Monday, March 26, 2018

“ बताओ ना मम्मा “



“ बताओ ना मम्मा “

मेरा मन आज बहुत विचलित है ! मेरी छोटी बेटी शलाका ने आज मुझसे जो सवाल पूछे उनके जवाब मेरे पास नहीं हैं ! आज यह पोस्ट मैं आप सभी प्रबुद्ध पाठकों के सामने इसी प्रत्याशा से रख रही हूँ कि आप शायद उसके प्रश्नों का समुचित जवाब दे पायें और उसके नन्हे मन की अनंत जिज्ञासाओं को शांत कर सकें ! उसके सवालों का रेपिड फायर राउण्ड तब शुरू हुआ था जब नव रात्रि के व्रत के समापन के अवसर पर उसके लिए अष्टमी के दिन पड़ोस के वर्माजी के यहाँ से कन्या पूजन का बुलावा आया था ! साल में दो बार कोलोनी की सारी छोटी छोटी बच्चियों के लिए यह अवसर सामूहिक पिकनिक की तरह हुआ करता है जब सबको एक साथ कई कई घरों से आमंत्रण मिलता है और उन्हें बड़े आदर मान के साथ खिला पिला कर रोली टीका करके भेजा जाता है ! और ऐसे ही अवसरों पर उनके ‘सामान्य ज्ञान’ में कितनी वृद्धि हो जाती है और हर परिवार की छोटी बड़ी सभी बातों की वे किस प्रकार संवाहक बन जाती हैं इसकी कल्पना भी करना मुश्किल है ! शलाका वर्माजी के यहाँ से लौट कर आयी थी !
“ मम्मा लड़कियों को क्यों बुलाते हैं पूजा के लिए ? “
मैंने बड़े प्यार से उसे समझाना चाहा , “ बेटा इसलिए क्योंकि लड़कियों को देवी का रूप माना जाता है और इसीलिये छोटी बच्चियों को बुला कर उनकी पूजा करते हैं, उन्हें भोजन कराते हैं और फल-फूल, वस्त्र उपहार आदि देकर विदा करते हैं ! “
बस यहीं गड़बड़ हो गयी ! शलाका की बैटरी चार्ज हो गयी थी !
“ मम्मा लड़कियों को देवी क्यों मानते हैं ?”
“ अगर लड़कियाँ देवी होती हैं तो वर्मा आंटी के यहाँ जब दिव्या की छोटी बहिन आयी थी तो उसकी दादी गुस्सा क्यों हो रही थीं और आंटी क्यों रो रही थीं ? “
“ मम्मा कल के अखबार में न्यूज़ थी ना कि कचरे के ढेर पर पडी हुई ज़िंदा लड़की मिली ! मम्मा क्या ‘देवी’ को कचरे में फेंक देते हैं ? “
“ मम्मा वो आंटी भी तो अष्टमी के दिन लड़कियों को अपने घर बुलाती होंगी ना पूजा के लिए जिन्होंने अपनी बेटी को कचरे में फेंका होगा ! फिर उन्होंने अपने घर की ‘देवी’ को क्यों फेंक दिया ? “
“ मम्मा अगर उस लड़की को कोई कुत्ता या बन्दर काट लेता तो ? “
“ मम्मा ऐसे बच्चों को कौन ले जाता है ? “
“ मम्मा क्या लड़कों को भी देवता मानते हैं ? “
“ मम्मा क्या लड़कों को भी ऐसे ही घूरे पर फेंक देते हैं ? “
“ मम्मा सब लड़कियों के हक की बात क्यों करते हैं ? क्या लड़कों का कोई हक नहीं होता ? “
“ मम्मा लड़कियां कमजोर कैसे होती हैं ? मेरे क्लास में तो लड़कियां ही फर्स्ट आती हैं !”
“ मम्मा टी वी पर लड़कियों को ही पढ़ाने के लिए क्यों कहते हैं ? क्या लड़कों को पढ़ने की ज़रूरत नहीं होती ? “
“ मम्मा वंश बढ़ाने का क्या मतलब होता है ? “
“ मम्मा क्या सिर्फ लड़कों से ही वंश बढता है ? “
“ मम्मा लड़कियाँ भी तो अपने मम्मी पापा की संतान होती हैं तो फिर उनसे वंश क्यों नहीं बढ़ता ? “
“ बस शलाका बस ! बाहर जाकर खेलो और मुझे काम करने दो ! “
मैं झुंझला कर बोली ! शलाका मेरा चेहरा देख कुछ सहम गयी और अपने अगले सवाल को मुंह में ही दबाये बाहर चली गयी ! मेरा धैर्य चुक गया था इसलिए नहीं कि शलाका एक के बाद एक सवाल दागे जा रही थी बल्कि इसलिए कि इन सवालों के जवाब मैं स्वयं ढूँढ रही हूँ वर्षों से ! मैंने उसकी जिज्ञासा पर अस्थाई ब्रेक ज़रूर लगा दिया था ! लेकिन मेरे मन मस्तिष्क में उसका हर प्रश्न हथौड़े की तरह चोट कर रहा था ! मेरे पास उसके किसी सवाल का यथोचित जवाब नहीं था जो उसके मन की शंकाओं का तर्कपूर्ण ढंग से निवारण कर पाता ! इसीलिये आज आप सबकी शरण में आयी हूँ सहायता एवं मार्गदर्शन की प्रत्याशा से कि शायद आप उसे समाज में व्याप्त इन निर्मम विसंगतियों के लिए कोई माकूल जवाब दे सकें ! अंत में इस क्षणिका के साथ मैं यह आलेख यहीं समाप्त करती हूँ ताकि आप इसके सूत्र को अपने हाथ में ले सकें !
बना देवी मुझे पूजा दिखाने को ज़माने को,
यह सब छल था तेरा बस एक झूठा यश कमाने को.
कहाँ थी तब तेरी भक्ति दिया था घूरे पे जब फेंक,
मैं तब भी थी वही ‘देवी’ उसे तू क्यों न पाई देख !

साधना वैद

Thursday, March 22, 2018

एहसास



मन के सूने गलियारों में किसीकी
जानी पहचानी परछाइयाँ टहलती हैं ,
दिल की सख्त पथरीली ज़मीन पर
दबे पाँव बहुत धीरे-धीरे चलती हैं !
पलकों के बन्द दरवाज़ों के पीछे
किसीके अंदर होने का अहसास मिलता है ,
कनखियों की संधों से अश्कों की झील में
किसीका अक्स बहुत हौले-हौले हिलता है !
हृदय के गहरे गह्वर से कोई पुकार
कंठ तक आकर घुट जाती है ,
कस कर भिंचे होंठों की कंपकंपाहट
बिन बोले ही बहुत कुछ कह जाती है !
किसीका ज़िक्र भर क्यों मन के
शांत सागर में सौ तूफ़ान उठा जाता है ,
मैं चाहूँ या ना चाहूँ क्यों मेरे स्वत्व को
नित नयी कसौटियों पर कस जाता है !


साधना वैद

Wednesday, March 21, 2018

आक्रोश

आक्रोश





क्यों भला आया है मुझको पूजने
है नहीं स्वीकार यह पूजा तेरी ,
मैं तो खुद चल कर तेरे घर आई थी
क्यों नहीं की अर्चना तूने मेरी ?

आगमन की सूचना पर क्यों तेरे
भाल पर थे अनगिनत सिलवट पड़े ,
रोकने को रास्ता मेरा भला
किसलिये तब राह में थे सब खड़े ?

प्राण मेरे छीनने के वास्ते
किस तरह तूने किये सौ-सौ जतन ,
अब भला किस कामना की आस में
कर रहा सौ बार झुक-झुक कर नमन !

देख तुझको यों अँधेरों में घिरा
रोशनी बन तम मिटाने आई थी ,
तू नहीं इस योग्य वर पाये मेरा ,
मैं तेरा जीवन बनाने आई थी !

मैं तेरे उपवन में हर्षोल्लास का
एक नव पौधा लगाने आई थी ,
नोंच कर फेंका उसे तूने अधम
मैं तेरा दुःख दूर करने आई थी !

मार डाला एक जीवित देवी को
पूजते हो पत्थरों की मूर्ती ,
किसलिये यह ढोंग पूजा पाठ का
चाहते निज स्वार्थों की पूर्ती !

है नहीं जिनके हृदय माया दया
क्षमा उनको मैं कभी करती नहीं ,
और अपने हर अमानुष कृत्य का 
दण्ड भी मिल जायेगा उनको यहीं !


साधना वैद

Thursday, March 15, 2018

बदला






लेना चाहती हूँ बदला तुमसे
हर उस तिरस्कार का,
हर उस अवहेलना का, 
हर उस उपेक्षा का
जो मैंने तुमसे अभी तक पाई है ! 
बुझा दिए हैं मैंने सारे दिये,
तोड़ कर फेंक दी हैं 
सारी मोमबत्तियाँ,
बुझा दी है चाँद की लालटेन 
और टिमटिमाते तारों पर 
छोड़ दिया है आहों का गुबार 
कि उनकी धुंधली रोशनी 
और मंद और मद्धम हो जाये ! 
इस निपट नीरव अन्धकार में 
बस ये जुगनू ही हैं 
जिन पर कोई वश नहीं है मेरा 
ये आनायास ही चमक कर 
चकाचौंध कर जाते हैं 
मेरी आँखों को 
और पानी के ठन्डे छींटे मार जाते हैं 
मेरे हृदय में प्रज्वलित उस आग पर 
जिसमें मैं स्वयं को जला कर 
भस्म कर देना चाहती हूँ 
सिर्फ इसलिये कि 
मेरे यूँ मिट जाने की खबर से 
थोड़ी सी भी नमी 
जो तुम्हारी आँखों में 
बरबस ही आ आयेगी 
मेरी खुशी की शायद 
सबसे बड़ी वजह होगी 
और शायद वही 
मेरे दग्ध हृदय को भी
कुछ तो शीतल कर ही जायेगी !


चित्र - गूगल से साभार


साधना वैद

Sunday, March 11, 2018

आस्था और चढ़ावा




हम सब जानते हैं कि हमारा भारत एक धर्म प्रधान देश है ! और  हम सभी किसी न किसी धर्म के अनुयायी हैं ! मन वचन  कर्म से अपने धर्म के सभी निर्देशोंनीति नियमों और परम्पराओं का यथासाध्य पालन भी करते हैं ! हम में से अनेकों की तो दिनचर्या ही अपने मतानुसार मंदिरमस्जिदगुरुद्वारे या चर्च में प्रार्थना और पूजा अर्चना के साथ शुरू होती है ! जानती हूँ कि सभी यथाशक्ति अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे या चर्च की दान पेटिका में प्रतिदिन दान स्वरुप कुछ न कुछ धन राशि भी अवश्य ही भेंट करते होंगे !

संशय की तो इसमें कोई बात ही नहीं है क्योंकि विशिष्ट त्यौहारों पर जब इस चढ़ावे की धन राशि का व्यौरा सार्वजनिक किया जाता है तो कीमती रत्न जड़ित सोने चाँदी के अनेकों बहुमूल्य आभूषणों के अलावा करोड़ों रुपयों की नकद धन राशि की जानकारी भी मिलती है ! भारत में लाखों मंदिर हैं ! छोटे बड़े हर मंदिर में दान पेटिका अवश्य रखी होती है ! और भक्तों श्रद्धालुओं के हाथ वहाँ पहुँचते ही बरबस अपनी जेबों में और पर्स में प्रवेश कर जाते हैं और जो मिलता है वह फिर दान पेटिका के अन्दर चला ही जाता है !

विशिष्ट अवसरों पर जैसे संतान के जन्म, मुंडन, नामकरण, विवाह आदि किसी भी मांगलिक संस्कार पर या परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु या श्राद्ध के अवसर पर श्रद्धालु यजमान स्वयं ही अपनी सामर्थ्य व विधि विधान के अनुसार पूजा अर्चना कर अभिषेक या महाभिषेक की मन्नत मानते हैं एवं मंदिरों में जाकर सैकड़ोंहज़ारोंलाखों रुपये भगवान् के चरणों में अर्पित कर स्वयं अपने महाप्रस्थान के समय स्वर्ग के द्वार खुले रखे जाने की गारंटी प्राप्त कर लेते हैं ! चलिए यह तो अपनी-अपनी आस्था  और विश्वास की बात है !  समाज में जिसकी जैसी हैसियत,  सामर्थ्य और बैंक बेलेंस उसीके अनुसार दान धर्म की राशि के आगे शून्य जुड़ते चले जाते हैं !

मैं लोगों की इतनी गहरी आस्था, निष्ठा और समर्पण की भावना देख कर चकित हो जाती हूँ ! कभी-कभी पूछने का मन होता है उनसे क्या सच में उन्हें इस बात पर विश्वास होता है कि अपने गाढ़े पसीने की जो कमाई वे दान पेटिका में डाल रहे हैं उसमें से एक पैसा भी भगवान् वास्तव में स्वीकार करेंगे ? जिस भगवान् की हम उपासना कर रहे हैं क्या सच में उसका कोई स्वरुप है या वह एक निराकार शक्ति मात्र है ? सारे संसार को चलाने वाले सर्व शक्तिमान भगवान् को क्या वाकई आपके दान के उन पैसों की ज़रुरत है जिनसे आप किसी बीमार का इलाज करा सकते हैं, किसी भूखे को खाना खिला सकते हैं, किसी निर्धन बालक की फीस जमा कर सकते हैं या किसी अपंग असहाय की सहायता कर सकते हैं ? आप जिस धन को भगवान् के नाम पर दान पेटिका में डाल आते हैं उसे भगवान् ही ग्रहण करते हैं या वह पैसा उन मंदिरों के मठाधीशों की जेब में चला जाता है और वे ज़रूरतमंद जिन्हें सच में संकट निवारण के लिए उस धन की ज़रुरत है कष्ट भोगते रह जाते हैं जो पैसा बैंकों में जमा होता है वह तो फिर भी जनता को लोन के रूप में मिल जाता है लेकिन मंदिरों में चढ़ाए गए रुपयों का कहाँ क्या उपयोग होता है और वे किस खाते में जाते हैं इसकी जानकारी कम से कम सर्व साधारण को तो नहीं होती ! एक बात लेकिन निश्चित रूप से तय है कि इस लाखों करोड़ों की धन राशि में से हमारे सर्व व्यापी सर्व शक्तिमान भगवान् स्वयं अपने लिए तो एक रुपया भी नहीं उठाते !

ऐसा नहीं है कि सभी मंदिरों में चढ़ावे के इस धन का दुरुपयोग ही हो रहा है ! देश के अनेकों बड़े-बड़े मंदिरों में ट्रस्ट की व्यवस्था है और वहाँ के व्यवस्थापक इस धन का सदुपयोग सर्वसाधारण के लिए अस्पतालविद्यालयलाइब्रेरीज़ इत्यादि उपलब्ध कराने के लिए करते हैं ! कहीं-कहीं मेधावी छात्रों को इस धन से छात्रवृत्ति बाँटने की भी व्यवस्था है ! लेकिन यह व्यवस्था भी दक्षिण भारत के बड़े-बड़े मंदिरों में और उत्तर भारत के चंद प्रसिद्ध मंदिरों में ही है जिनकी व्यवस्था में प्रशासन का भी हाथ है ! इस सत्कार्य में जितना धन व्यय हो रहा है वह उस धन राशि की तुलना में अत्यंत नगण्य है जो चढ़ावे के रूप में जमा हो रही है ! मंदिरों की आमदनी का तो कोई हिसाब किताब है ही नहीं ! हर शहर हर गाँव हर गली मोहल्लों में कितने मंदिर हैं इनकी तो गिनती भी कोई ठीक से नहीं जानता !

आस्थाविश्वासभक्ति अपनी जगह है लेकिन यह धन जो सर्व साधारण की जेब से निकल कर जमा हो रहा है इसका उपयोग कहाँकिस प्रकार और किस काम के लिए हो रहा है इसे जानने का अधिकार हर नागरिक को होना चाहिए ! हर मंदिर के रख रखाव, वहाँ के कर्मचारियों के वेतन इत्यादि में खर्च हुई राशि के बाद बाकी धन का कहाँ सदुपयोग हुआ इसे जानने का अधिकार आम जनता को होना चाहिए ! इस सन्दर्भ में एक बिल्कुल स्वच्छ पारदर्शिता की ज़रुरत है ताकि आम जनता का विश्वास कम से कम अपने भगवान् पर से तो ना उठे !   


साधना वैद