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Monday, April 30, 2018

नभ के चंदा



आसमान में
झिलमिल करता
चमका चन्दा

तारों के संग
दूर क्षितिज तक
दमका चन्दा

शीतल चंदा
गगन से उतरी
अमृत धारा

प्लावित होता
तृषित अवनि का
अंतर सारा

विहँँस उठा
सम्पूर्ण प्रकृति का
हरेक छौना

दमक उठा
सम्पूर्ण जगति का
हरेक कोना

झूम उठी है
धरा मुदित मन
इठलाई सी

शुभ्र वस्त्र में
नख से शिख तक
इतराई सी

माना तुमको
प्रियतम इसने
नभ के चन्दा

मिले कभी ना
बेहतर इससे
तुमको चन्दा



साधना वैद










Friday, April 27, 2018

मेरा वजूद


ढूँढती आ रही हूँ
बचपन से अपने वजूद को
ज़िन्दगी के हर कोने में झाँक आई
लेकिन अभी तक वो जगह नहीं मिली
जहाँ मैं अपने आप से
दो घड़ी के लिए ही सही
कभी मिल पाती !

बचपन में माँ की लोरियों में
ममता भरी थपकियों में
प्यार भरी मनुहारों में ढूँढा खुद को
बहुत कुछ मिला वहाँ
लेकिन मैं कहाँ थी !  
बाबूजी की अनुशासन में पगी हिदायतों में
भैया की संरक्षणात्मक वर्जनाओं में
दीदी की दुलार भरी झिड़कियों में भी
बहुत खोजा अपने वजूद को
लेकिन वहाँ भी चाबी से चलने वाली
एक खूबसूरत गुड़िया ही दिखी बस !
मैं कहाँ थी !

विवाहोपरांत जब बाहर निकली
उस विराट वटवृक्ष की छाया से
तो मन में अटूट विश्वास था कि
अपने अस्तित्व को अब तो मैं
ज़रूर पा सकूंगी लेकिन
गृहस्थी की शतरंज की बिसात पर
मेरी हैसियत उस अदना से प्यादे की थी
जिसके कर्तव्य तो अनंत होते हैं
लेकिन अधिकार अत्यंत सीमित !
परिवार के हर सदस्य की सुख सुविधा,
आवश्यकता, इच्छा की पूर्ति करते हुए
चलती रही दिन रात इधर से उधर 
शतरंज के चौंसठ खानों में और  
ढूँढती रही अपने टूटे सपनों की किरचों 
और धज्जी हुए अरमानों के रेशों में 
अपने खोये हुए अस्तित्व को 
लेकिन कहाँ पा सकी उसे वहाँ भी !

जीवनसाथी के
कभी मृदुल तो कभी कठोर
कभी मधुर तो कभी तिक्त
आदेशों के अनुपालन में 
तो कभी उनके चुने हुए मार्ग पर
एक आदर्श जीवनसंगिनी की तरह  
उनका अनुगमन करते रहने में  
सारा जीवन यूँ ही बीत गया  
लेकिन मेरा अस्तित्व, 
वह कहाँ मिला मुझे ?
जिससे भेंट हुई वह तो बस
एक जीती जागती
कठपुतली मात्र थी !
 
अब वृद्धाश्रम के निर्जन निसंग कोने में
धुँधलाती दृष्टि से अपनों की राह तकती
और काँपते हाथों से माला फेरती
इस बेआस जर्जर काया में
मैं अपना अस्तित्व ढूँढने का
प्रयास कर रही हूँ तो मेरे हाथ
यहाँ भी निराशा ही लगनी है !
क्योंकि बुझी आग पर भी कभी
रसोई पका करती है !


साधना वैद


  

Tuesday, April 24, 2018

तब और अब






तब भी कहीं ठहरी थी ज़िंदगी
कहीं रुक के मैंने भी
छाँह तलाशी थी !
तब हवाओं में खुशबू थी
गुलों में ताज़गी थी
मन में आशा थी
नैनों में सुनहरे सपने थे
कंठ में मुखरित होने को बेचैन
न जाने कितने मधुर
गाये अनगाये गीत ठहरे थे !
जाने कैसा विश्वास था
मैं पुकारूंगी तुम्हें और
तुम किसी देवपुरुष की भाँति
अनायास ही मेरे सामने
तुरंत ही प्रकट हो जाओगे
और आनन् फानन में
मेरी हर इच्छा पूरी कर दोगे !
ठहरी तो अभी भी है ज़िंदगी
जीवन की शाम भी ढल चुकी है !
और ज़िंदगी का पहिया भी
अब जाम हो चुका है !
ना कहीं हवाओं में खुशबू है
ना मुरझाये फूलों में कोई
ताज़गी ही बची है !
मन आस निरास की
आँख मिचौली से अब जैसे
बिलकुल विरक्त हो चला है !
नैनों के सपने
साकार होने से पहले ही
टूट चुके हैं !
कंठ में अवरुद्ध गीत वहीं
घुट कर खामोश हो गए हैं !
और विश्वास ?
तुमसे मिलने के बाद
इस शब्द की परिभाषा, मायने,
सन्दर्भ, प्रसंग सब बदल चुके हैं !
अब बस जीवन में जो कुछ
शेष रह गया है
वह एक प्रतीक्षा ही है
चिरंतन लक्ष्य तक 
पहुँचने की प्रतीक्षा
आतुर प्रतीक्षा 
कब...कैसे...और...किस दिन...!


चित्र -- गूगल से साभार 


साधना वैद




Saturday, April 21, 2018

हैवानियत की हद



समझ में नहीं आता हम विकास के किस पथ पर अग्रसर हैं ! अभी तक नाबालिग बच्चियों के साथ दिल दहलाने वाली दुष्कर्म की ख़बरें सुनाई देती थीं ! अब तो दुधमुंही चार माह और आठ माह की बच्चियों के साथ हैवानियत की ख़बरें सुनाई देने लगी हैं ! सख्त क़ानून बनाने के बाद भी ऐसी घटनाओं में कमी आने की जगह दिनों दिन और वृद्धि होती जा रही है ! इसका सबसे बड़ा कारण है हमारी न्याय व्यवस्था की धीमी गति और लचीलापन ! सालों गुज़र जाते हैं कोर्ट कचहरी में मुकदमे चलते रहते हैं ! अपराधी बेख़ौफ़ रहते हैं ! समय के साथ बात आई गयी हो जाती है ! रोजाना की हज़ारों समस्याओं के चलते लोगों का आक्रोश भी मंद पड़ जाता है ! साक्ष्य मिट जाते हैं या मिटा दिए जाते हैं ! गवाह बिक जाते हैं या मुकर जाते हैं या खामोश कर दिए जाते हैं और कालान्तर में अपराधी या तो बाइज्ज़त बरी हो जाते हैं या मामूली सज़ा काट कर मूंछों पर ताव देते फिर समाज की मुख्य धारा में आ मिलते हैं ! एक बार तो किसी ऐसे अपराधी को जनता के सामने चौराहे पर फाँसी दी जाए ताकि औरों के लिए यह एक सबक बन सके ! कभी तो कोई ऐसा ठोस कदम उठाया जाए कि जनता का भरोसा अपनी न्याय व्यवस्था पर डगमगाने की बजाय और मज़बूत हो सके ! काश...... !

साधना वैद

Tuesday, April 17, 2018

Wednesday, April 11, 2018

डर


डर ?

कैसा डर ?
किससे डर ?
किस बात का डर ?
डरने की वजह ?
और फिर डरना ही क्यूँ ?
क्या खोने का डर है ?

परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाने का डर है ?
मेहनत, लगन और एकाग्र चित्त से
जो अध्ययन किया हो तो
असफल हो जाने का डर कैसा ?  
ज्ञान और विवेक ऐसी पूँजी हैं
जो कितनी भी खर्च करो और
कितनी भी बाँटो कभी कम नहीं होती
ना इसे कोई चोर लूट सकता है
ना समय के साथ इसका क्षय होता है ! 
फिर इसके लुट जाने का कैसा डर ?

फिर क्या धन दौलत, ज़मीन जायदाद,
गहना गुरिया, रुपया पैसा
लुट जाने का डर मन में व्याप्त है ?
ये सब तो वैसे भी हाथ का मैल है
चंचल चित्त ठगिनी माया से कैसा मोह ?
इसकी तो प्रवृत्ति ही यही होती है  
आज हमारे पास है तो कल नहीं
और वो कहते हैं ना ---
सब ठाठ धरा रह जायेगा  
जब लाद चलेगा बंजारा !
फिर इनके छुट जाने का कैसा डर ?

तो क्या रिश्तों के टूट जाने का डर है ?
जहाँ रिश्तों की जड़ें मज़बूत होती हैं
कैसे भी आँधी, तूफ़ान, झंझा, चक्रवात
उसे तिल भर भी डिगा नहीं सकते लेकिन
जिनकी जड़ें ही गहरी न हो सकीं
उन्हें तो एक न एक दिन
उखड़ना होता ही है !
जिन जड़ों को सींचा ही नहीं
साफ़ है कि ना तो तुम्हारे लिए
उनका कोई मोल है ना ही महत्त्व
फिर उनके टूटने उखड़ने की कैसी चिंता
जैसा बोओगे वही तो काटोगे ना !
या यहाँ भी लालच है मन में ?
निवेश धेला कौड़ी का नहीं लेकिन
लाभ पूरा का पूरा चाहिए !

तो क्या फिर अपनों के खो जाने का डर ?
सृष्टि का नियम है कि जो आता है
एक न एक दिन उसका जाना भी
अवश्यम्भावी ही होता है
तो फिर इस बात का डर कैसा ? 
सृष्टि के नियम तो बदलने से रहे
जीवन काल में ही यदि निष्काम भाव से
छोटों को भरपूर प्यार और संरक्षण दिया हो
और बुज़ुर्गों का भरपूर आदर मान 
सेवा सत्कार किया हो तो 
यह अपराध बोध नहीं सालता !

एकदम शुद्ध निर्मल अंत:करण से जिसने
अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया हो
कोई दुश्चिंता, कोई कुंठा, कोई मनोविकार
उसके मन में जड़ें नहीं जमा सकता
और जिसने अपने जीवन में
इतने इम्तहान पहले से ही दे रखे हों  
उसका मन संघर्षों की आँच में तप कर
इस तरह कुंदन सा निर्मल, निर्विकार और
शुद्ध हो जाता है कि फिर उसे
किसी भी परिणाम से डर नहीं लगता !

साधना वैद



Thursday, April 5, 2018

नारी हूँ मैं


तुम क्या जानो
आज की नारी हूँ मैं !

रसोई से बैठक तक 
घर से स्कूल तक 
रामायण से अखबार तक 
मैंने कितनी आलोचनाओं का 
ज़हर पिया है 
तुम क्या जानो ! 

करछुल से कलम तक
बुहारी से ब्रश तक
दहलीज से दफ्तर तक 
मैंने कितने तपते 
रेगिस्तानों को पार किया है 
तुम क्या जानो ! 

 मेंहदी के बूटों से मकानों के नक्शों तक 
रोटी पर घूमते बेलन से 
कम्प्यूटर के बटन तक 
बच्चों के गडूलों से 
हवाई जहाज की कॉकपिट तक 
मैंने कितनी चुनौतियों का 
सामना किया है 
तुम क्या जानो ! 

जच्चा सोहर से जाज़ तक 
बन्ना बन्नी से पॉप तक 
कत्थक से रॉक तक 
मैंने कितनी वर्जनाओं को झेला है 
तुम क्या जानो ! 

सड़ी गली परम्पराओं को 
तोड़ने के लिए 
बेजान रस्मों को 
उखाड़ फेंकने के लिए 
निषेधाज्ञा में तनी 
रूढ़ियों की उंगली 
मरोड़ने के लिए 
मैंने कितने सुलगते 
ज्वालामुखियों की 
तपिश को बर्दाश्त किया है 
तुम क्या जानो !

आज चुनौतियों की उस आँच में तप कर
प्रतियोगिताओं की कसौटी पर 
घिस कर निखर कर
कंचन सी, कुंदन सी अपरूप 
दपदपाती मैं खड़ी हूँ  
तुम्हारे सामने 
अजेय अपराजेय 
मुझे इस रूप में भी 
तुम जान लो 
पहचान लो ! 

हूँ सबल मैं 
जीत लूँगी निराशा 
प्रबल आशा ! 


साधना वैद