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Friday, April 10, 2009

अन्यायपूर्ण न्याय प्रणाली

हमारी न्याय व्यवस्था का पहला उद्देश्य है कि चाहे कोई गुनहगार भले ही छूट जाये लेकिन किसी बेगुनाह को दण्ड नहीं मिलना चाहिये । निश्चित ही यह करुणा और मानवता से परिपूर्ण एक बहुत ही पावन भावना है । लेकिन क्या वास्तव में ऐसा हो पाता है ? क्या इस बात को आधिकारिक तौर पर प्रमाणित किया जा सकता है कि आज भारतीय जेलों में जितने भी कैदी हैं उन पर लगे सारे आरोप बाक़ायदा सिद्ध हो चुके हैं और जो बाइज़्ज़त बरी होकर बेखौफ बाहर घूम रहे हैं वे वास्तव में निरपराध हैं ?
हमारी न्याय व्यवस्था तो इतनी लचर और लाचार है कि जिन लोगों के अपराध सिद्ध हो चुके हैं और जिनको देश की सर्वोच्च अदालत से दण्डित भी किया जा चुका है उनको भी सज़ा देने से डरती है । संसद पर हमला करने वाले अपराधियों को क्या आज तक सज़ा मिल पाई है ? कुछ हमारी न्याय प्रक्रिया धीमी है कुछ सरकार की नीतियाँ दोषपूर्ण हैं जो न्याय प्रक्रिया को बाधित करने के लिये किसी न किसी तरह से आड़े आ जाती हैं ।
अंग्रेज़ी में एक कहावत है Justice delayed is justice denied . अगर यह सत्य है तो हमारे यहाँ तो शायद न्याय कभी हो ही नहीं पाता । एक तो मुकदमे ही अदालतों में सालों चलते हैं दूसरे जब तक फैसले की घड़ी आती है तब तक कई गवाह , यहाँ तक कि चश्मदीद गवाह तक अपने बयानों से इस तरह पलट जाते हैं कि वास्तविक अपराधी सज़ा से या तो साफ साफ बच जाता है या बहुत ही मामूली सी सज़ा पाकर सामने वाले का मुहँ चिढ़ाता सा लगता है । ऐसे में क्या हम सीना ठोक कर यह कह सकते हैं कि फैसला सच में न्यायपूर्ण हुआ है । ऐसे में समाज में न्याय प्रणाली के प्रति असंतोष और आक्रोश की भावना जन्म लेती है । लोगों में निराशा और अवसाद घर कर जाता है और वक़्त आने पर ऐसे चोट खाये लोग खुद अपने हाथों में कानून लेने से पीछे नहीं हटते । गृह मंत्री श्री चिन्दम्बरम पर पत्रकार वार्ता में पत्रकार द्वारा जूता फेंके जाने का प्रसंग इसका ताज़ातरीन उदाहरण है । इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद जिस तरह से उस पत्रकार को आम जनता का समर्थन और शाबाशी मिली वह कहीं न कहीं न्याय व्यवस्था के प्रति लोगों में पनपते अविश्वास और असंतोष को प्रकट करता है ।
भयमुक्त और अपराध मुक्त समाज की परिकल्पना को यदि साकार रूप देना चाहते हैं तो सबसे पहले मुकदमों के त्वरित निपटान की दिशा में ठोस कदम उठाये जाने की सख्त ज़रूरत है । आये दिन समाचार पत्र दिल दहला देने वाली लोमहर्षक घटनाओं के समाचारों से भरे होते हैं । पाठकों के दिल दिमाग़ पर उनका गहरा असर होता है । लोग प्रतिदिन कौतुहल और उत्सुकता से उनकी जाँच की प्रगति जानने के लिये अख़बारों और टी. वी. के समाचार चैनलों से चिपके रहते हैं लेकिन पुलिस और अन्य जाँच एजेंसियों की जाँच प्रक्रिया इतनी धीमी और दोषपूर्ण होती है कि लम्बा वक़्त गुज़र जाने पर भी उसमें कोई प्रगति नज़र नहीं आती । धीरे धीरे लोगों के दिमाग से उसका प्रभाव घटने लगता है । तब तक कोई नयी घटना घट जाती है और लोगों का ध्यान उस तरफ भटक जाता है । फिर जैसे तैसे मुकदमा अदालत में पहुँच भी जाये तो फैसला आने में इतना समय लग जाता है कि लोगों के दिमाग से उसका असर पूरी तरह से समाप्त हो जाता है और अपराधियों का हौसला बढ जाता है । आम आदमी समाज में भयमुक्त हो या न हो लेकिन यह तो निश्चित है कि अपराधी पूर्णत: भयमुक्त हैं और आये दिन अपने क्रूर और खतरनाक इरादों को अंजाम देते रहते हैं । य़दि हमारी न्याय प्रणाली त्वरित और सख्त हो तो समाज में इसका अच्छा संदेश जायेगा और अपराधियों के हौसलों पर लगाम लगेगी । गिरगिट की तरह बयान बदलने वाले गवाहों पर भी अंकुश लगेगा और अपराधियों को सबूत और साक्ष्यों को मिटाने और गवाहों को खरीद कर , उन्हें लालच देकर मुकदमे का स्वरूप बदलने का वक़्त भी नहीं मिलेगा । कहते हैं जब लोहा गर्म हो तब ही हथौड़ा मारना चाहिये । समाज में अनुशासन और मूल्यों की स्थापना के लिये कुछ तो कड़े कदम उठाने ही होंगे । त्वरित और कठोर दण्ड के प्रावधान से अपराधियों की पैदावार पर अंकुश लगेगा और शौकिया अपराध करने वालों की हिम्मत टूट जायेगी ।
इसके लिये आवश्यक है कि न्यायालयों में सालों से चल रहे चोरी या इसी तरह के छोटे मोटे अपराधों वाले विचाराधीन मुकदमों को या तो बन्द कर दिया जाये या जल्दी से जल्दी निपटाया जाये । ऐसे मुकदमों के निपटान के लिये समय सीमा निर्धारित कर दी जाये और भविष्य में और तारीखें ना दी जायें । न्यायाधीशों की वेतनवृद्धि और पदोन्नति उनके द्वारा निपटाये गये मुकदमों के आधार पर तय की जाये । अनावश्यक और अनुपयोगी कानूनों को निरस्त किया जाये ताकि अदालतों में मुकदमों की संख्या को नियंत्रित किया जा सके और उनके कारण व्यवस्था में व्याप्त पुलिस और वकीलों के मकड़्जाल से आम आदमी को निजात मिल सके । न्यायालयों की संख्या बढ़ायी जाये और क्षुद्र प्रकृति के मुकदमों का निपटान निचली अदालतों में ही हो जाये । अपील का प्रावधान सिर्फ गम्भीर प्रकृति के मुकदमों के लिये ही हो ।
इसी तरह से कुछ कदम यदि उठाये जायेंगे तो निश्चित रूप से समाज में बदलाव की भीनी भीनी बयार बहने लगेगी और आम आदमी चैन की साँस ले सकेगा।

साधना वैद