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Monday, April 13, 2009

बाल श्रमिक ! सिक्के का दूसरा पहलू

बच्चे देश का भविष्य हैं, आने वाले वक़्तों में भारत के कर्णधार हैं और बदलते खुशहाल भारत की बहुत सुन्दर सी तस्वीर हैं ऐसे जुमले बाल दिवस पर या श्रमिक दिवस पर बहुत सुनने को मिल जाते हैं लेकिन यथार्थ के धरातल पर जब देश के इन्हीं ‘कर्णधारों’ को भूख से बिलखते और चोरी उठाईगीरी जैसे अपराधों में लिप्त पाते हैं तो ऐसी बातें अपना महत्व और विश्वसनीयता खोती हुई प्रतीत होती हैं ।
अपने दो दिन पहले के अनुभव से पाठकों को अवगत कराना चाहती हूँ । मेरे घर में कुछ निर्माण कार्य चल रहा है । सुबह नौ बजे से शाम पाँच बजे तक श्रमिक काम करते हैं । दिन में तीन बजे के करीब एक श्रमिक थक कर बैठ गया । क़ारण पूछा तो बोला पेट में दर्द हो रहा है । मैने दवा देनी चाही तो उसने बताया कि सुबह से खाना नहीं खाया है सिर्फ पानी पीकर काम कर रहा है । मुझे दुख हुआ । सबसे पहले तो उसको भरपेट खाना खिलाया फिर कारण पूछा तो उसने बताया कि घर में आटा ही नहीं था इसलिये खाना नहीं लाया था । मेरा दिल करुणा से भर गया । पूछने पर उसने बताया कि घर में एक बीमार पिता हैं , बूढी माँ है, एक बहन है शादी के लायक और दो छोटे भाई हैं । घर में आटा ना होने से सभी का उपवास हो गया था । मैंने कहा भाइयों को भी क्यों नहीं ले आते हो काम पर साथ में ? बोला कैसे लायें दोनों चौदह् बरस से छोटे हैं साथ में ले आवें तो टोले वाले शिकायत की धमकी देते हैं क्योंकि छोटे बच्चों से काम कराना जुर्म है । उसके जवाब ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया । क़्या यही भूखी, लाचार और दुर्बल पीढी देश की बागडोर अपने कमज़ोर हाथों में थामने वाली है ? क़ुछ विशिष्ट दिवसों पर बस्तियों में मिठाई वितरत कर देने से या पाँच सितारा होटलों के वातानुकूलित सभागारों में सम्मेलन और गोष्ठियाँ आयोजित कर बड़ी-बड़ी घोषणायें करने से हालात नहीं बदलने वाले हैं । उसके लिये समस्याओं की तह में जाकर उनके निवारण के लिये प्रयत्न करने होंगे तभी बदलाव की कोई उम्मीद दिखाई देगी । आज भी देश का बड़ा प्रतिशत ग़रीबी की रेखा के नीचे गुज़र बसर करता है । आज भी उनके यहाँ दो वक़्त की रोटी जुटाने की समस्या विकराल रूप से उन्हें जकड़े हुए है ऐसे में एक व्यक्ति की कमाई से सबका पेट भरना असम्भव है वह भी तब जब साल में कई दिन उसे बेरोज़गार घर में बैठना पड़्ता है । इतनी मँहगाई के समय में अच्छे अच्छे लोगों को दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है तो ग़रीबों का तो भगवान ही मालिक है । पेट में जब भूख की आग सुलग रही हो तो आदर्शों की बातें बड़ी बेमानी लगती हैं । घर के वयस्क सदस्य काम की तलाश में निकल जाते हैं और नबालिग भाई बहन ऐसे ही गली मौहल्लों में निरुद्देश्य लवारिस भटकते रहते है । और अगर ग़लत सोहबत में पड़ जाते हैं तो चोरी, जुआ, लड़ाई झगड़ों में लिप्त हो अपना बचपन बिगाड़ लेते हैं जिसकी सम्भावनायें निश्चित रूप से कहीं अधिक हैं । बच्चे स्कूल गये या नहीं, उन्हें कुछ खाने को मिला या नहीं इसकी सुध लेने की फुर्सत किसी के पास नहीं है । ऐसे में इन बच्चों का भविष्य पूरी तरह से अंधकारमय दिखाई देता है । अगर ये किशोर बच्चे अपने माता पिता के साथ उनके कार्य स्थल पर जाकर उनके साथ काम करके उनका हाथ बटाते हैं और खुद भी कुछ कमा कर घर की आमदनी के संवर्धन में कुछ योगदान करते हैं तो उसमें हर्ज ही क्या है ? यही वह आयु होती है जब बच्चे एकाग्र चित्त से किसी हुनर को मन लगा कर सीख सकते हैं । समाज के अन्य वर्गों के बच्चे क्या इस आयु में पढ़ाई के अलावा अपनी रुचि के अनुसार विविध प्रकार की कलायें नहीं सीखते ? फिर अगर ये बच्चे अपने माता पिता के साथ कारखानों में जाकर उनकी निगरानी में रह कर उंनकी कारीगरी की बारीकियों को सीखते हैं तो क्या यह ग़लत है ? जब तक वे वयस्क होंगे अपने काम में पूरी तरह से दक्ष हो जायेंगे जो निश्चित रूप से यह उनके लिये फायदे का सौदा ही होगा । बच्चे श्रम की महिमा को समझेंगे और आत्मनिर्भरता का मधुर फल चख सकेंगे । बच्चे जब तक छोटे होते हैं तभी तक वे एकाग्रता से कुछ सीख सकते हैं । एक बार ध्यान भटक गया तो फिर कुछ सीखना असम्भव हो जाता है । कहते हैं खाली दिमाग शैतान का घर । जो बच्चे ना तो स्कूल में जाकर पढ़ाई कर रहे है और ना ही किसी किस्म का व्यावसायिक प्रशिक्षण ले रहे हैं उनका बचपन तो बर्बाद ही हो रहा है ना ? मैं बच्चों को काम के बोझ के तले पिसते कतई देखना नहीं चाहती लेकिन दिशाहीन भटकते बचपन को प्रतिदिन देखना भी उतना ही कष्टप्रद है । मेरा सामाजिक संस्थाओं से अनुरोध है कि वे इस विकराल समस्या का उचित निदान ढूढें । साल में दो चार दिन बस्तियों में जाकर बच्चों की सुध लेने से काम नहीं चलेगा । 365 दिन के साल में बाकी के 360 दिन वे क्या करते है, क्या खाते हैं, कैसी सोहबत में रहते हैं, उनका किस तरह का विकास हो रहा है, किस तरह की गतिविधियों में वे संलग्न रहते है और उनके परिवार की आर्थिक स्थिति क्या इतनी मजबूत है कि वह इन बच्चों का लालन पालन बिना किसी अतिरिक्त आमदनी के सुचारू रूप से कर सकते हैं इन बातों पर भी विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है । क्या समाजसेवी संस्थायें ईमानदारी से यह कर्तव्य निभाती हैं या उनकी निष्ठा सिर्फ साल के दो चार दिनों तक ही सीमित होती है ? मेरे विचार से यदि किसी की आर्थिक स्थिति अनुमति नहीं देती है तो बच्चों को काम पर जाने देने में कोई हर्ज नहीं है । ज़रूरत इस बात की है कि उनके लिये कार्यस्थल पर काम करने की शर्तें और स्थितियाँ अनुकूल और आसान हों, वहाँ सभी तरह की स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध हों, खाने पीने का उचित प्रबन्ध हो, उनसे उनकी क्षमता से अधिक काम ना लिया जाये और उनके लिये कुछ समय खेल कूद और मनोरंजन के लिये भी सुनिश्चित किया जाये । यदि इन बातों पर ध्यान दिया जायेगा तो निश्चित ही यह समाज अपराध मुक्त हो सकेगा और समाज का हर सदस्य आत्मसम्मान और आत्मविश्वास से भरा होगा । तब ही हम निश्चिंत होकर देश की बागडोर इस पीढ़ी को सौंप सकेंगे ।


साधना वैद