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Wednesday, May 27, 2009

तुम आओगे ना !

रात ने अपनी अधमुँदी आँखे खोली हैं
सुबह ने अपने डैने पसार अँगड़ाई ली है ।
नन्हे से सूरज ने प्रकृति माँ के आँचल से मुँह घुमा
संसार को अपनी उजली आँखों से देखा है ।

दूर पर्वत शिखरों पर देवताओं की रसोई में
सुर्ख लाल अँगीठी सुलग चुकी है ।
कल कल बहते झरनों का आल्हादमय संगीत
सबको आनंद और स्फूर्ति से भर गया है ।

सुदूर गगन में पंछियों की टोली पंख पसार
अनजाने अनचीन्हे लक्ष्य की ओर उड़ चली है ।
फूलों ने अपनी पाँखुरियों से ओस के मोती ढुलका
बाल अरुण को अपना मौन अर्घ्य दिया है ।

मेरे मन में भी एक मीठी सी आशा अकुलाई है
मेरे मन में भी उजालों ने धीरे से दस्तक दी है ।
मेरे मन ने भी पंख पसार आसमान में उड़ना चाहा है
मेरे कण्ठ में भी मीठी सी तान ने आकार लिया है ।

मेरी करुणा के स्वर तुम तक पहुँच तो जायेंगे ना !
झर झर बहते अश्रुबिन्दु का अर्घ्य तुम्हें स्वीकृत तो होगा !
मैंने अंतर की ज्वाला पर जो नैवेद्य बनाया है प्रियतम
उसे ग्रहण करने को तो तुम आओगे ना !

साधना वैद

15 comments :

  1. आदरणीया साधना जी बहुत ही सुन्दर कल्पना है आपकी बहुत खूब लिखा है

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  2. आशा का संचार लिए रचना अच्छी है।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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  3. मेरी करुणा के स्वर तुम तक पहुँच तो जायेंगे ना !
    झर झर बहते अश्रुबिन्दु का अर्घ्य तुम्हें स्वीकृत तो होगा !
    मैंने अंतर की ज्वाला पर जो नैवेद्य बनाया है प्रियतम
    उसे ग्रहण करने को तो तुम आओगे ना !

    Waah Waah Waah !!!

    Atisundar ! Anyatam !!

    Jitne sundar bhaav utni hi prakhar abhivyakti waah !
    Aanand aa gaya padhkar ...aabhaar aapka.

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  4. साधनाजी खूब अच्छा लिखा आपने॥पर क्या हमेशा इंतजार करना और उस इंतजार मेंजिन्दगी गुजार देना कोइ सार्थक हल तोनहींहैंनाओवेस्सर्

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  5. साधनाजी खूब अच्छा लिखा आपने॥पर क्या हमेशा इंतजार करना और उस इंतजार मेंजिन्दगी गुजार देना कोइ सार्थक हल तोनहींहैंनाे्

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  6. फूलों ने अपनी पाँखुरियों से ओस के मोती ढुलका
    बाल अरुण को अपना मौन अर्घ्य दिया है ।

    ख़ूबसूरत अहसास, बहुत सुन्दर !

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  7. मैंने अंतर की ज्वाला पर जो नैवेद्य बनाया है प्रियतम
    उसे ग्रहण करने को तो तुम आओगे ना !
    बहुत सुन्दर और बेहतरीन

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  8. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 02-02 -20 12 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज...गम भुलाने के बहाने कुछ न कुछ पीते हैं सब .

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  9. बहुत सुन्दर भाव सम्प्रेषण |
    आशा

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  10. बहुत सुन्दर कोमल भाव..
    सादर.

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  11. प्रकृति के खूबसूरत बिम्बो के साथ सकारात्मक संतुलन बनाती हुई रचना..बहुत सुन्दर.

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  12. कल्पना के रंग में डूबी पोस्ट

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  13. अनुपम भाव संयोजन लिए बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

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  14. रहस्यवाद की सारी मधुरिमा कविता में उतर आई है .

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