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Thursday, October 22, 2009

कुछ तो करूँ

थी चाह्त उजालों की मुझको बहुत
अँधेरा जगत का मिटाना जो था ।
दिये तो जलाये थे मैने बहुत
एक शमा रौशनी की जला ना सकी ।
थी चाहत कि महकाऊँ सारा चमन
बहा दूँ एक खुशबू का दरिया यहाँ ।
बगीचे लगाये थे मैने बहुत
एक कली प्यार की भी खिला ना सकी ।
था रस्ता कठिन दूर मंज़िल बहुत
थी चाह्त कि तुम साथ देते मेरा
सदायें तो पहुँचीं बहुत दूर तक
एक तुम्हें पास ही से बुला ना सकी ।
मैं कुछ तो करूँ कि अन्धेरा मिटे
मेरे चार सूँ ज़िन्दगी मुस्कुराये ।
मिटे दिल की नफरत खिलें सुख की कलियाँ
मोहब्बत की खुशबू चमन को सजाये ।
हो दिल में सुकूँ और लबों पर तराने
खुशी की लहर से जहाँ जगमगाये ।
हर एक आँख में एक उजली किरन हो
हर एक लफ्ज़ उल्फत का पैग़ाम लाये ।
अकेली हूँ मैं तुम चलो साथ मेरे
है मुश्किल डगर अब चला भी ना जाये ।
है हसरत यही कि मैं जब भी पुकारूँ
मेरी एक सदा पर जहाँ साथ आये |

साधना वैद