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Thursday, October 1, 2009

सोचती हूँ

सोचती हूँ
जो आँसू तुमने मुझे दिये
उन्हें एक दिन में बहा देना तो सम्भव नहीं
इसलिये एक सागर अपने मन में ही
क्यों ना रच लूँ ।
सोचती हूँ
जो दु:ख तुमने मुझे दिये
उन्हें एक पल में उतार फेंकना तो मुमकिन नहीं
इसलिये एक हिमालय अपने अंतर में ही
क्यों ना समेट लूँ ।
सोचती हूँ
जो यादें तुमने मुझे दीं
उन्हें पल भर में फूँक मार कर बुझा देना तो आसाँ नहीं
इसलिये एक ज्वालामुखी अपने हृदय में ही
क्यों ना प्रज्ज्वलित कर लूँ ।
सोचती हूँ
जो दंश तुमने मुझे दिये
उनकी चुभन से मुक्ति मिलना तो सम्भव नहीं
इसलिये पैने कैक्टसों का एक बागीचा अपने दिल में ही
क्यों ना खिला लूँ ।
चाहती हूँ
काश तुम जान पाते
तुमसे मिली इन छोटी छोटी दौलतों ने
मुझे कितना समृद्ध कर दिया है
कि मैं इस सारी कायनात को अपने अंतर में समेटे
जन्म जन्मांतर तक ऐसे ही जीती रहूँगी ।
काश तुम भी तो कभी पीछे मुड़ कर देखते
कि इस तरह से दौलतमन्द होने का अहसास
कैसा होता है ।


साधना वैद