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Thursday, January 27, 2011

दिव्यदृष्टि


वह बैठा है एक आलीशान होटल के बाहर
पेड़ के ऊँचे गहरे कोटर में .
सजग, सतर्क, खामोश, विरक्त
और देख रहा है साँस रोके
बेरहम दुनिया को पूर्णत: निरावृत
बिना किसी मुखौटे के
उसके अपने असली रूप रंग में !
जहाँ होटल के अंदर कुछ लोग
तेज संगीत की ताल पर
जाम पर जाम चढ़ा तीव्र गति से
डांस फ्लोर पर थिरक रहे हैं,
और होटल के बाहर दरबान मुस्तैदी से
उनकी रखवाली कर रहे हैं !
वहीं कुछ लोग दिन भर की बदन तोड़
मेहनत मजदूरी के बाद फुटपाथ पर
ज़रा सा सुस्ताने के लिये बैठ गये हैं
तो सिपाही उन्हें दुत्कार कर खदेड़ रहे हैं !
जहाँ होटल के अंदर तरह-तरह के
पकवानों से सजी मेजें दूर-दूर तक फ़ैली हैं
और जूठन से भरी भराई
अनगिनत प्लेटें बास्केट में भरी पड़ी हैं,
वहीं होटल के बाहर
सूखे होंठ,खाली पेट और निस्तेज आँखों वाले
चंद बच्चों का हुजूम लालायित नज़रों से
जूठन से भरी इन प्लेटों को
हसरत से देख रहा है !
पार्टी समाप्त हुई है
और जगर मगर कीमती वस्त्रों में सजे लोग
हाथों में हाथ डाले डगमगाते कदमों से
चमचमाती शानदार कारों में बैठ जा रहे हैं
और अधनंगे भूखे बच्चों का झुण्ड
चंद सिक्कों की आस में
हाथ फैलाए कारों के पीछे
एक निष्फल निरर्थक दौड़ लगा रहा है
और दुत्कारा जा रहा है उन तथाकथित
अमीर लोगों के द्वारा जिन्हें शायद
इस समाज का रहनुमां समझा जाता है !
वह यह सब देखता है हर रात !
यह विषमता, यह वर्ग भेद
यह विकृति, यह विरूपता
और उसका मन भर उठता है एक
गहन अकथनीय पीड़ा और वितृष्णा से !
ऐसी दुनिया उसे नहीं भाती
और पौ फटते ही वह अपनी आँखें मूँद
घुस जाता है अपने कोटर में
दिन भर के लिये !
शायद आने वाली अगली रात के लिये
जब उसे पुन: चाहे अनचाहे
यही सब कुछ फिर देखना पड़ेगा
क्योंकि वह एक उल्लू है और
कदाचित इसीलिये पश्चिमी मान्यता के अनुसार
वह मूर्खता का नहीं वरन्
विद्वता का प्रतीक है !

साधना वैद