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Wednesday, September 4, 2013

चल रही हूँ


बाँध आँचल में सभी साधें अधूरी
मैं अकेली राह पर यूँ चल रही हूँ !
शुष्क वीराने में धर रंगीन चश्मा
खुशनुमां फूलों से खुद को छल रही हूँ !
क्या करोगे उर पटल के ज़ख्म गिन कर
मैं इन्हीं से सज सँवर कर खिल रही हूँ !
मत रखो मरहम कि अब दुखते नहीं ये
मैं इन्हें चूनर में अपनी सिल रही हूँ !
नेह का सौदा किया जब भास्कर से
ज्वाल के सायों में निस दिन पल रही हूँ !
चिलचिलाती धूप लगती छाँह सी अब   
स्निग्ध शीतल चाँदनी में जल रही हूँ !
मत छुओ आँसू बहुत अनमोल हैं ये
मैं इन्हें दामन में भर कर चल रही हूँ !
बाँध दी जो डोर तुमने दो सिरों से
साध कर खुद को उसी पर चल रही हूँ !
देख तो लेते किसी दिन पास आकर
किस तरह साँचों में पल-पल ढल रही हूँ ! 


साधना वैद