Followers

Wednesday, September 11, 2013

हर लम्हा हर पल ......


हालात की पेचीदगियों ने
वक्त की पेशानी पर
हर रोज़ जो नयी सिलवटें डालीं हैं
उन ज़िद्दी सिलवटों को  
मिटाते-मिटाते
पूरी एक उम्र मैंने
यूँ ही नहीं गुज़ार दी है
हर लम्हा हर पल
खुद को भी मिटाया है ! 

ज़िंदगी की स्लेट पर
तुमने जो मुश्किल सवाल
मेरे हल करने को
लिख दिये थे
उन्हें हल करते-करते
पूरी एक उम्र मैंने
यूँ ही नहीं गुज़ार दी है
हर लम्हा हर पल
खुद भी एक अनसुलझी पहेली
बन कर रह गयी हूँ ! 

यह जानते हुए भी कि
मुझे तैरना नहीं आता
जिस आग के दरिया में
मुझे धकेल कर सब
घर को लौट गये थे
उस आग के सैलाब में
जलते झुलसते
डूबते उतराते
तैरना सीखने में
पूरी एक उम्र मैंने
यूँ ही नहीं गुज़ार दी है
हर लम्हा हर पल
उस आँच में तप कर
कुंदन की तरह
निखरना भी मैंने
सीख लिया है !

साधना वैद


चित्र गूगल से साभार