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Tuesday, February 4, 2014

मुझे बहते जाना है

 

मैं नदी
पर्वतों की अपनी
जन्मस्थली से निकल
चंचल चपल अल्हड़ नवयौवना सी
इठलाती बल खाती मदमाती
हवा में अपना आँचल लहराती
कभी ऊँचाइयों से झरने के रूप में
नीचे गिरती तो कभी ऊबड खाबड
पथरीले चट्टानी रास्तों में
अपनी राह बनाती बस
बहती ही जाती हूँ !
नहीं जानती
मेरा सफर कितना लंबा है ,
मेरी मंज़िल कहाँ है ,
सागर के किस भाग से कहाँ
कब और किस रूप में
मिलना मेरे भाग्य में बदा है !
वहाँ तक मैं कभी
पहुँच भी पाऊँगी या नहीं
या बीच राह में ही
मेरी धाराएं उपधाराएं काट
मुझे कई हिस्सों में
बाँट दिया जायेगा !
अभी तो मुझे इसी तरह
अनवरत कल-कल छल-छल
करते बस बहते ही जाना है !
मार्ग में चाहे टीले मिलें या मैदान
पत्थर मिलें या नर्म दूब
सारी बाधाओं से टक्कर लेते
अपनी राह खुद ही बनाते हुए
और मार्ग में जो भी मिले
उसे अपने अमल धवल
निर्मल, शीतल  जल से
प्लावित करते हुए मुझे
बस बहते ही जाना है !
क्योंकि यही मेरा धर्म है
और यही मेरी नियति !

साधना वैद