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Saturday, November 1, 2014

बीज




क्षितिज तक पसरी विशाल धरा का

एक लघु सा कण

अथाह असीम रत्नाकर की

एक छोटी सी बूँद

अपार सृष्टि के अनंत विस्तार का

एक नन्हा सा अणु

बृह्माण्ड में अवस्थित कोटिश: सितारों में

एक नन्हा सा सितारा

हाँ ! है वजूद मेरा

कदाचित सबसे छोटा

सबसे नगण्य

शायद ना के बराबर

लेकिन हुंकार है मेरी 

उतनी ही घनघोर

हौसला है मेरा

उतना ही बुलंद

पहचान है मेरी

उतनी ही पुख्ता

चमक है मेरी

उतनी ही प्रखर क्योंकि

हर विराट का बीज

मुझमें ही निहित है

मुझसे ही जन्म लेता है

और अंत में

मुझमें ही समाहित

हो जाता है

मैं हूँ

हर महान

हर विराट का

हर अनंत

हर अथाह का

हर असीम

हर अपार का

एक नन्हा सा बीज

और मुझमें ही

विकसित होता है

वह सभी कुछ जो

इस समस्त जगत को

अनादि काल से

विस्मित, हर्षित 

पुलकित, चमत्कृत

और कभी-कभी

भयभीत भी

 करता आ रहा है !



साधना वैद