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Monday, April 11, 2016

एक अविस्मरणीय मुलाक़ात -- रश्मि रविजा जी के साथ



   कभी-कभी ऐसा भी होता है कि किसी घटना, किसी बात या मुलाक़ात पर व्यक्ति तुरंत प्रतिक्रिया नहीं दे पाता ! इसके कई कारण हो सकते हैं ! उन कई कारणों में से एक कारण यह भी होता है कि व्यक्ति उस बात या मुलाक़ात से मिलने वाले आनंद और सुख को आत्मसात करने में इतना समय ले लेता है कि उसे अपनी प्रतिक्रिया देने में समय लग जाता है ! मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ जब दो दिन पूर्व रश्मि रविजा जी से मिलने का सुअवसर मिला ! जी हाँ, हमारी आपकी सबकी वही रश्मि रविजा जी जो वर्षों से अपने ब्लॉग, ‘अपनी, उनकी, सबकी बात’, पर अपने गंभीर और स्तरीय आलेख, कहानियों तथा लघु उपन्यासों से हम सबको प्रभावित करती आ रही हैं और अब फेसबुक पर भी विविध विषयों पर उनकी दिलचस्प पोस्ट्स और सामाजिक सरोकारों से जुड़े उनके स्टेटस सबको भरपूर पाथेय उपलब्ध कराते हैं ! ये स्टेटस कभी गंभीर, कभी चुटीले तो कभी हलके फुल्के मजाकिया भी होते हैं ! व्यक्तिगत प्रसंगों से जुड़े उनके स्टेटस अक्सर बड़े मनोरंजक होते हैं ! क्रिकेट से लेकर फिल्म समीक्षा तक और यात्रा संस्मरणों से लेकर अपने किचन में ज़रूरत से कहीं ज़्यादह बन गयी मटर की सब्जी के मज़ेदार ज़िक्र तक सब उनके लेखन का विषय बन जाते हैं ! बेटे के हाथ की बनी पहली बार की मसाला चाय की बात हो या बेटे की बनाई खूबसूरत रंगोली की चर्चा हो, अमलतास के फूल के इकलौते गुच्छे की तस्वीर हो या किसी साहित्यिक समागम की रिपोर्ट हो उनकी वाल पर हमेशा कुछ न कुछ अविस्मरणीय पढ़ने के लिये मिल ही जाता है ! अभी कुछ समय पूर्व उनका एक उपन्यास, ‘काँच के शामियाने’, भी प्रकाशित हुआ है जिसने कुछ ही दिनों में अच्छी खासी लोकप्रियता हासिल कर ली है !
रश्मि जी अपने भैया भाभी से मिलने आगरा आने वाली हैं यह बात मुझे फेसबुक पर उनके एक छोटे से लेकिन बेहद दिलचस्प स्टेटस से पता चली थी जो उन्होंने राजधानी एक्सप्रेस में यात्रियों को सर्व किये जाने वाले नाश्ते और खाने के मेनू को लेकर डाला था ! अपनी प्रिय आभासी मित्र से मिलने का यह अवसर मैं खोना नहीं चाहती थी सो मैंने उनसे फेसबुक पर ही अनुरोध किया कि वे यहाँ आ रही हैं तो मुझसे भी ज़रूर मिलें और मेरे इस अनुरोध को उन्होंने सहज ही स्वीकार कर लिया ! रश्मि जी के आगरा पहुँचने के बाद फोन पर हम लोगों की दो तीन बार बात हुई और ९ अप्रेल की सुबह मिलने का कार्यक्रम तय हो गया !
इंतज़ार खत्म हुआ ! अंतत: वह घड़ी भी आ ही गयी जब उनकी कार हमारे घर के सामने रुकी ! फेसबुक पर इतने सालों से जिस प्यारे से चहरे को देखती आ रही थी वह नज़रों में इतना समा चुका था कि उसे साक्षात अपने सामने देख पहचानने में मुझे एक पल भी नहीं लगा ! जैसे ही वो कार से बाहर आईं उन्हें देख कर मुझे वैसी ही आत्मीयता की अनुभूति हुई जैसे अपने किसी परम आत्मीय स्वजन को देख कर होती है ! सुबह घर में बिलकुल शान्ति रहती है ! बच्चे स्कूल जा चुके होते हैं ! परिवार के वयस्क सदस्य भी अपने–अपने काम से चले जाते हैं ! रश्मि जी जब घर आईं तो उनका स्वागत करने के लिये मैं, मेरे पतिदेव और मेरा प्रिय डॉगी ‘सम्राट’ उपस्थित थे ! पति देव रश्मि जी से रस्मी मुलाक़ात कर कम्प्यूटर पर अपने काम में व्यस्त हो गये ! सम्राट हमारे घर का बेहद चंचल और अति उत्साही सदस्य है ! अगर हम लोगों से पहले वह मेहमान को देख लेता है तो मेहमान का स्वागत करने के लिये वह इतना आतुर और अधीर हो जाता है कि हमें तो वह नमस्ते करने का अवसर भी नहीं देता ! उसे काबू में लाने के लिये अच्छी खासी मशक्कत करनी पड़ जाती है और बिस्किट्स की अच्छी खासी रिश्वत भी देनी पड़ती है ! इस स्थिति से बचने के लिये मैंने उसे पहले ही अपने कमरे में बंद कर दिया था ! घर में परम शान्ति थी, हम दोनों थे, दुनिया जहान की ढेर सारी बातें थीं और थी परम सुख की अनुभूति जो मुझे उनके साथ इस तरह मिल कर हो रही थी ! ब्लॉग जगत की बातें, कई कॉमन पढ़े हुए उपन्यासों की बातें, कई साहित्यकारों की बातें, घर परिवार की बातें और भी बहुत सारी बातें ही बातें ! बहुत मज़ा आया ! यह तो सर्व विदित है ही कि दो महिलायें साथ हों तो चुप नहीं रह सकतीं ! फिर हमें तो बहुत कुछ शेयर करना था एक दूसरे के साथ ! इसीलिए मैं जब चाय बनाने के लिये उठी तो उन्हें भी अपने साथ हमारे किचिन कम डाईनिंग रूम में ले गयी ! यह और बात है कि इसी बीच मौक़ा पाते ही सम्राट बाहर आ गया और फिर उसने पूरी शिद्दत के साथ रश्मि जी का स्वागत सत्कार किया ! यह तो अच्छा है कि रश्मि जी कुत्तों से डरती नहीं हैं और उनसे कतराती भी नहीं हैं इसलिए कोई विशेष परेशानी नहीं हुई ! तब तक हमारी बातों का पहला दौर भी निबट चुका था ! चाय बनने के दौरान और पीने के दौरान भी हम लोगों की बातों का सिलसिला जारी रहा !
  रश्मि जी मेरे लिये मन्नू भंडारी जी द्वारा रचित उनका अत्यंत लोकप्रिय उपन्यास ‘आपका बंटी’ लेकर आई थीं ! यह मेरा वैसे भी बहुत ही पसंदीदा उपन्यास है ! इसकी रिपीट वैल्यू भी बहुत है ! जितनी बार भी पढ़ा जाये हर बार हृदय को विगलित कर देता है ! मुझे बहुत अच्छा लगा ! पुस्तक के अलावा बहुत ही स्वादिष्ट कुकीज़ का पैकेट भी था जिसका रसास्वादन मैं नव रात्रि के व्रत समाप्त होने के बाद करूँगी ! रश्मि जी के प्रभावशाली व्यक्तित्व और मिलनसार व्यवहार ने घर में सबका दिल जीत लिया ! तब तक बच्चे भी स्कूल से आ गये थे ! वाणी ने हम लोगों के स्नैप्स लिये उनके और मेरे मोबाइल से ! रश्मि जी का ड्राइवर उन्हे लेने के लिये आ चुका था ! भेंट का समय समाप्त होने को आ गया था लेकिन मन तृप्त नहीं हुआ था ! रश्मि जी से अपने घर में इस तरह से मिलना इतना सुखद अनुभव था कि इसके बारे में मैं जितना लिखूँ कम ही रहेगा ! यही कामना है कि ऐसे अवसर बार-बार आयें और मेरे जीवन में इसी तरह मिठास घुलती रहे ! मुझे तो बस मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर याद आ रहा है ---
  
 वो आये घर में हमारे, खुदा की कुदरत है
 कभी हम उन्हें कभी अपने घर को देखते हैं !


साधना वैद